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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग-IVक के अंतर्गत उल्लिखित 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties) और उनके न्यायिक प्रवर्तन (Judicial Enforceability) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. मूल कर्तव्यों को सरदार स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति के आधार पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में अंतःस्थापित किया गया था, और यह प्रावधान केवल भारतीय नागरिकों पर ही लागू होते हैं, विदेशी नागरिकों पर नहीं।
- 2. मूल कर्तव्यों की प्रकृति न्यायोचित (Justiciable) है, जिसका तात्पर्य यह है कि यदि कोई नागरिक अपने किसी मूल कर्तव्य का उल्लंघन करता है, तो सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय अनुच्छेद 32 या 226 के तहत उसे सीधे दंडित करने के लिए रिट (Writ) जारी कर सकते हैं।
- 3. सर्वोच्च न्यायालय ने कई मामलों (जैसे 'रंगनाथ मिश्र वाद' और 'एमसी मेहता वाद') में यह स्पष्ट किया है कि चूँकि संविधान के कई मूल कर्तव्य अंततः पर्यावरण संरक्षण, राष्ट्रीय प्रतीकों के आदर और सामाजिक समरसता जैसी संवैधानिक नैतिकता और विधायी मंशा को दर्शाते हैं, इसलिए संसद और कार्यपालिका इनका पालन सुनिश्चित करने के लिए उचित विधियाँ और कार्यकारी निर्देश बना सकती हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: मूल कर्तव्यों को सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के अनुच्छेद 51क (भाग-IVक) के तहत जोड़ा गया था। ये कर्तव्य केवल भारतीय नागरिकों पर लागू होते हैं, विदेशी नागरिकों पर नहीं।
कथन 2 गलत है: मूल कर्तव्यों की प्रकृति न्यायोचित (Justiciable) **नहीं** है, बल्कि ये गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) हैं। संविधान में इनके सीधे उल्लंघन पर किसी विशेष दंड या कानूनी कार्रवाई का प्रावधान नहीं है, जब तक कि संसद द्वारा इसके लिए कोई पृथक दंडनीय विधि (जैसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम या राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम) न बनाई गई हो।
कथन 3 सही है: सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न न्यायिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि मूल कर्तव्यों का उद्देश्य नागरिकों को उनके अधिकारों के प्रति सचेत करने के साथ-साथ उनके सामाजिक दायित्वों का बोध कराना है। न्यायपालिका आवश्यकता पड़ने पर वैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करते समय इन कर्तव्यों का संज्ञान ले सकती है।
भारतीय संविधान के इन प्रावधानों के बारे में और अधिक विस्तृत अध्ययन के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
कथन 2 गलत है: मूल कर्तव्यों की प्रकृति न्यायोचित (Justiciable) **नहीं** है, बल्कि ये गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) हैं। संविधान में इनके सीधे उल्लंघन पर किसी विशेष दंड या कानूनी कार्रवाई का प्रावधान नहीं है, जब तक कि संसद द्वारा इसके लिए कोई पृथक दंडनीय विधि (जैसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम या राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम) न बनाई गई हो।
कथन 3 सही है: सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न न्यायिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि मूल कर्तव्यों का उद्देश्य नागरिकों को उनके अधिकारों के प्रति सचेत करने के साथ-साथ उनके सामाजिक दायित्वों का बोध कराना है। न्यायपालिका आवश्यकता पड़ने पर वैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करते समय इन कर्तव्यों का संज्ञान ले सकती है।
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Related Questions
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टायफाइड और कालरा (हैजा) किसके विशिष्ट उदाहरण हैं?
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) और उसके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में प्रस्तुत 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objectives Resolution) को ही कुछ संशोधनों के पश्चात भारतीय संविधान की प्रस्तावना के रूप में स्वीकार किया गया था, और यह प्रस्तावना अमेरिकी संविधान से प्रेरित होकर सबसे पहले लिखित संविधान में प्रस्तावना को शामिल करने की परंपरा का अनुसरण करती है।
2. 'बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया था कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है, और संसद द्वारा अनुच्छेद 368 के तहत इसमें संशोधन किया जा सकता है, बशर्ते संविधान का मूल ढांचा प्रभावित न हो।
3. केशवानंद भारती वाद (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्व के निर्णय को बदलते हुए यह प्रतिपादित किया कि प्रस्तावना संविधान का अंग है और इसमें संशोधन किया जा सकता है, जिसके परिणामस्वरूप 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द जोड़े गए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की संरचना, शक्तियों और चुनावी सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण के साथ-साथ राज्यों की पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनावों का अधीक्षण भी करता है।
2. वर्ष 1989 तक निर्वाचन आयोग मुख्य रूप से एक एकल-सदस्यीय (Single-member) निकाय था, किंतु अक्टूबर 1989 में राष्ट्रपति ने पहली बार दो अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति करके इसे बहु-सदस्यीय निकाय बनाया, जिसे बाद में 1993 में वैधानिक रूप से स्थायी बहु-सदस्यीय आयोग बना दिया गया।
3. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 के अनुसार, चुनाव प्रचार का कार्य मतदान समाप्त होने के लिए निर्धारित समय से ठीक 48 घंटे पूर्व समाप्त हो जाता है, जिसके दौरान सार्वजनिक बैठकों या जुलूसों पर प्रतिबंध रहता है, जिसे 'मौन अवधि' (Silence Period) कहा जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की अधिकारिता, शक्तियों तथा न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत उच्चतम न्यायालय की मूल (Original) अधिकारिता के अंतर्गत केंद्र और एक या अधिक राज्यों के बीच अथवा दो या अधिक राज्यों के बीच उत्पन्न होने वाले किसी कानूनी विवाद का निर्णय शामिल है, जिसमें संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी विधि की संवैधानिक वैधता से जुड़े विवाद भी पूर्ण रूप से शामिल होते हैं।
2. अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त है कि वह विधि या तथ्य के किसी ऐसे प्रश्न पर, जो सार्वजनिक महत्व का हो, उच्चतम न्यायालय से परामर्श मांग सकता है, और उच्चतम न्यायालय के लिए यह अनिवार्य होता है कि वह ऐसे प्रत्येक संदर्भ (Reference) पर अपनी राय राष्ट्रपति को प्रेषित करे।
3. उच्चतम न्यायालय के 'अभिलेख न्यायालय' (Court of Record) होने के नाते, इसके सभी निर्णय, अभिलेख और कार्रवाइयां साक्ष्य के रूप में सुरक्षित रखी जाती हैं, तथा इसे अपनी अवमानना (Contempt of Court) के लिए, जिसमें संसद की अवमानना का अधिकार भी सम्मिलित है, दंड देने की शक्ति प्राप्त है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के निर्माण और संविधान सभा की प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. केबिनेट मिशन योजना (1946) के तहत संविधान सभा के निर्वाचन में ब्रिटिश प्रांतों को आवंटित 292 सीटों के अतिरिक्त मुख्य आयुक्तों के 4 क्षेत्रों (दिल्ली, अजमेर-मारवाड़, कुर्ग और ब्रिटिश बलूचिस्तान) से भी प्रतिनिधियों का चयन किया गया था, तथा देशी रियासतों को कुल 93 सीटें आवंटित की गईं जिनके सदस्यों का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा किया जाना था।
2. संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई, जिसमें मुस्लिम लीग ने हिस्सा नहीं लिया, और इस बैठक में फ्रांसिसी प्रथा का अनुसरण करते हुए सभा के सबसे वरिष्ठ सदस्य डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को अस्थायी अध्यक्ष चुना गया, जबकि डॉ. राजेंद्र प्रसाद को स्थायी अध्यक्ष 11 दिसंबर 1946 को चुना गया।
3. संविधान सभा द्वारा संविधान निर्माण के कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए कई समितियों का गठन किया गया था, जिनमें से संघ शक्ति समिति और संघीय संविधान समिति के अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू थे, तथा प्रांतीय संविधान समिति के अध्यक्ष सरदार वल्लभभाई पटेल थे।
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