BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

Indian Polity
17 views

भारतीय संविधान के भाग-II (अनुच्छेद 5 से 11) के अंतर्गत नागरिकता के संवैधानिक उपबंधों और संसद की विधायी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 10 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति जो इस भाग के पूर्वगामी प्रावधानों के तहत भारत का नागरिक है या समझा जाता है, वह संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए नागरिक बना रहेगा, जिसका अर्थ यह है कि संसद साधारण कानून के माध्यम से भी किसी व्यक्ति की नागरिकता को बिना किसी विधायी प्रक्रिया के सीधे समाप्त कर सकती है।
  2. 2. अनुच्छेद 7 के प्रावधान के तहत जो व्यक्ति 1 मार्च 1947 के बाद भारत से पाकिस्तान के लिए प्र्रव्रजन (Migrate) कर गया था, वह भारत का नागरिक नहीं माना जाएगा, किंतु यदि वह व्यक्ति भारत में पुनर्वास (Resettlement) के लिए अनुज्ञापत्र (Permit) के आधार पर वापस लौट आता है, तो उसे अनुच्छेद 6 के तहत पंजीकरण के माध्यम से नागरिकता प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार मिल जाता है।
  3. 3. अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में विधि बनाने की संपूर्ण और अनन्य शक्ति प्रदान करता है, और इस शक्ति के अंतर्गत संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह भारत के राज्यक्षेत्र के बाहर के भू-भाग पर भी प्रभावी है (Extra-territorial operation)।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 10 के अनुसार नागरिकता का बना रहना संसद द्वारा बनाई गई विधि के अधीन तो है, किंतु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि संसद बिना किसी विधायी प्रक्रिया या मनमाने ढंग से किसी भी नागरिक की नागरिकता छीन सकती है; इसके लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत निर्धारित कानूनी और न्यायसंगत प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होता है। कथन 2 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 7 के तहत पाकिस्तान जाने वाले और वापस लौटने वाले व्यक्तियों के लिए पंजीकरण की शर्त अनुच्छेद 6 के अंतर्गत नहीं बल्कि अनुच्छेद 7 के अपने विशिष्ट प्रावधानों और परंतुक (Proviso) के तहत नियंत्रित होती है, जिसके लिए भारत में पुनर्वास के परंतुक के अधीन विशेष शर्तों को पूरा करना होता है। कथन 3 पूरी तरह सत्य है; अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता के संबंध में व्यापक अधिकार देता है और अनुच्छेद 245 के साथ पढ़ने पर संसद की विधायी शक्ति को 'एक्स्ट्रा-टेरिटोरियल ऑपरेशन' (राज्यक्षेत्रातीत प्रभाव) के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती। विषय की अधिक विस्तृत जानकारी के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल का अध्ययन कर सकते हैं।
Share:

Related Questions

→ रक्त का थक्का जमाने में किस विटामिन का योगदान होता है? → भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्च न्यायालयों (High Courts) की रिट अधिकारिता, अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण तथा प्रशासनिक न्यायाधिकरणों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के साथ-साथ किसी अन्य विधिक अधिकार (Legal Right) के प्रवर्तन के लिए भी प्रादेश (Writ) जारी करने की शक्ति प्राप्त है, और इस संदर्भ में उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता का क्षेत्र सर्वोच्च न्यायालय की तुलना में अधिक व्यापक है। 2. संविधान के अनुच्छेद 227 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने प्रादेशिक क्षेत्राधिकार के भीतर आने वाले सभी न्यायालयों और न्यायाधिकरणों (Tribunals) पर अधीक्षण की शक्ति प्राप्त है, और यह अधीक्षण शक्ति केवल प्रशासनिक मामलों तक ही सीमित है, इसका विस्तार किसी भी स्थिति में न्यायिक निर्णयों की समीक्षा या अपील तक नहीं हो सकता है। 3. अनुच्छेद 235 के अंतर्गत राज्य के अधीनस्थ न्यायालयों (जिला न्यायालयों और उनके अधीनस्थ न्यायालयों) पर नियंत्रण की शक्ति, जिसमें उनकी पोस्टिंग, पदोन्नति और छुट्टी का अनुदान शामिल है, पूर्णतः संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय में निहित होती है, न कि राज्य के राज्यपाल या कार्यपालिका के पास। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की संरचना, उसकी अधिकारिता और न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 143 के अंतर्गत राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की शक्ति प्राप्त है, और यदि कोई ऐसा विवाद जो किसी ऐसी संधि, समझौते, प्रसंविदा या अन्य पूर्ववर्ती लिखत से उत्पन्न होता है, जो संविधान लागू होने से पहले की गई थी, तो उच्चतम न्यायालय के लिए राष्ट्रपति को ऐसा परामर्श देना अनिवार्य (Mandatory) होता है। 2. संविधान के अनुच्छेद 137 के तहत उच्चतम न्यायालय को अपनी ही किसी पूर्व निर्णय या आदेश की पुनरावलोकन (Review) करने की शक्ति प्राप्त है, तथा संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि या अनुच्छेद 145 के अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए उच्चतम न्यायालय को अपने द्वारा दिए गए निर्णय या आदेश पर पुनर्विचार करने का पूर्ण अधिकार है। 3. जनहित याचिका (PIL) की अवधारणा को भारतीय न्यायपालिका में विकसित करने का श्रेय न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर को जाता है, जिसके तहत सर्वोच्च न्यायालय ने 'लोकस स्टैंडी' (Locus Standi) के पारंपरिक नियम को शिथिल करते हुए यह अनुमति दी कि किसी पीड़ित व्यक्ति के स्थान पर कोई भी लोक-हितैषी व्यक्ति या संस्था अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति की क्षमादान शक्तियों (Pardoning Powers) और वीटो शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को सैन्य न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के मामले में तथा सभी मामलों में जहाँ दंड या दंडादेश मृत्युदंड (Death Sentence) होता है, क्षमादान देने की पूर्ण शक्ति प्राप्त है, और इस शक्ति का प्रयोग करते समय राष्ट्रपति के लिए केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह मानना पूरी तरह अनिवार्य होता है, सिवाय उस स्थिति के जहाँ दया याचिका खारिज कर दी गई हो। 2. राष्ट्रपति की क्षमादान शक्तियों में 'परिहार' (Remission) का अर्थ दंड की प्रकृति को बदले बिना उसकी अवधि को कम करना है, जबकि 'विराम' (Respiration/Remission नहीं अपितु Reprieve/Remission) का अर्थ किसी विशेष परिस्थिति, जैसे कि अपराधी की शारीरिक अपंगता या महिला अपराधी के गर्भवती होने के कारण मूल दंड के स्थान पर कम कठोर दंड देना है। 3. अनुच्छेद 111 के अंतर्गत जब कोई साधारण विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित होने के पश्चात राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति रोक सकता है और अपनी 'जेब वीटो' (Pocket Veto) शक्ति का प्रयोग करते अनिश्चित काल के लिए विधेयक को अपने पास रख सकता है, क्योंकि संविधान में ऐसी स्थिति के लिए राष्ट्रपति द्वारा विधेयक पर निर्णय लेने हेतु किसी भी समय-सीमा (Time Limit) का निर्धारण नहीं किया गया है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) की स्वतंत्रता, प्रशासनिक शक्तियों तथा उनके सदस्यों के संवैधानिक उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 316 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है, और प्रत्येक आयोग के सदस्यों में से कम-से-कम आधे ऐसे व्यक्ति होने चाहिए जो नियुक्ति की तारीख तक भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन कम-से-कम दस वर्ष तक पद धारण कर चुके हों। 2. संविधान के अनुच्छेद 317 के उपबंधों के अंतर्गत संघ लोक सेवा आयोग या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य को केवल साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर ही राष्ट्रपति के आदेश से हटाया जा सकता है, जिसके लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई जाँच और प्रतिवेदन का होना अनिवार्य होता है, और इस जाँच के दौरान राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा संबंधित सदस्य को निलंबित करने की शक्ति केवल संघ आयोग के संदर्भ में राष्ट्रपति के पास होती है, राज्य आयोगों के सदस्यों के संबंध में राज्यपाल के पास नहीं। 3. संघ लोक सेवा आयोग या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य अपनी पदावधि की समाप्ति पर भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य रोजगार के पात्र नहीं होते हैं, किंतु संघ लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष अपनी पदावधि समाप्त होने पर किसी अन्य राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किए जाने की पात्रता रखता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.