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Indian Polity
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भारत के उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रिपरिषद से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 75 के अंतर्गत प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती है, तथा मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी, जिसे 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा जोड़ा गया था।
- 2. भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है और वह राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते समय या उसके कृत्यों का निर्वहन करते समय राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य नहीं करता है तथा उस अवधि में उसे राज्यसभा के सभापति के वेतन या भत्ते प्राप्त नहीं होते हैं।
- 3. अनुच्छेद 78 के अनुसार प्रधानमंत्री का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह संघ के प्रशासन संबंधी और विधान के प्रस्तावों से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राष्ट्रपति को संसूचित करे, और यदि राष्ट्रपति ऐसा अपेक्षा करे तो मंत्रिपरिषद के विचार के लिए किसी ऐसे विषय को प्रस्तुत करे जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर लिया है किन्तु मंत्रिपरिषद ने विचार नहीं किया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के द्वारा अनुच्छेद 75(1क) जोड़ा गया, जिसके तहत प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद के सदस्यों की कुल संख्या लोकसभा की कुल संख्या के 15% से अधिक नहीं हो सकती। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 64 और अनुच्छेद 89(1) के अनुसार उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। जब वह राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है, तो वह राज्यसभा के सभापति के कर्तव्यों का पालन नहीं करता और उसे राष्ट्रपति का वेतन मिलता है। कथन 3 सही है: अनुच्छेद 78 प्रधानमंत्री के राष्ट्रपतिकी प्रति उत्तरदायित्व और कर्तव्यों को स्पष्ट करता है, जिसके अंतर्गत शासन और विधान संबंधी निर्णय राष्ट्रपति तक पहुँचाना अनिवार्य है। परीक्षा के विस्तृत और गहन अध्ययन के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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भारतीय संविधान में आपातकालीन उपबंधों (Emergency Provisions) और उनसे संबंधित ऐतिहासिक संवैधानिक संशोधनों (विशेषकर 38वें, 42वें और 44वें संविधान संशोधन) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 38वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1975 के द्वारा राष्ट्रपति को यह शक्ति दी गई थी कि वह देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग आधारों पर एक साथ एक से अधिक राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणाएँ कर सकता है, और इस प्रकार की उद्घोषणा को किसी भी न्यायालय में चुनौती (Judicial Review) नहीं दी जा सकती थी।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से राष्ट्रीय आपातकाल के संचालन को सुगम बनाने के लिए यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल संपूर्ण भारत में लागू होगा या इसके किसी एक या कुछ विशिष्ट भागों में ही लागू होगा, इसका निर्णय राष्ट्रपति कर सकता है।
3. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा यह प्रावधान किया गया कि अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों के प्रवर्तन को निलंबित करने की शक्ति किसी भी परिस्थिति में आपातकाल के दौरान भी नहीं छीनी जा सकती है, तथा राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा के लिए मंत्रिमंडल (Cabinet) का लिखित अनुमोदन अनिवार्य कर दिया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं (भाग IX) के वित्तीय और संरचनात्मक प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस अधिनियम द्वारा अनुच्छेद 243-I के तहत प्रत्येक राज्य में एक 'राज्य वित्त आयोग' (State Finance Commission) के गठन का प्रावधान किया गया है, जो राज्यपाल द्वारा प्रत्येक पाँच वर्ष की समाप्ति पर गठित किया जाता है और यह आयोग पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने के साथ-साथ राज्यों द्वारा एकत्रित करों, शुल्कों और टोल टैक्स के शुद्ध प्राप्तियों के राज्यों और पंचायतों के बीच वितरण की संस्तुति राज्यपाल को करता है।
2. अधिनियम के अनुच्छेद 243-H के अनुसार, राज्य का विधानमंडल किसी पंचायत को ऐसी कर, शुल्क, टोल और फीस लगाने, वसूलने तथा विनियमित करने की शक्ति कानून द्वारा प्रदान कर सकता है, तथा राज्य की संचित निधि से पंचायतों को अनुदान (Grants-in-aid) देने का प्रावधान भी कर सकता है।
3. पंचायतों के खातों के लेखा-परीक्षण (Audit) से संबंधित मामलों के विनियमन के लिए संविधान में यह अनिवार्य किया गया है कि इसका नियंत्रण और निर्देशन सीधे भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के अधीन होगा, जो संघ और राज्यों की तर्ज पर स्थानीय निकायों का भी प्रत्यक्ष ऑडिट करेगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 262' के अंतर्गत अंतर-राज्यीय जल विवादों (Inter-State Water Disputes) के न्यायनिर्णयन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संसद को विधि द्वारा किसी अंतर-राज्यीय नदी या नदी घाटी के पानी के उपयोग, वितरण या नियंत्रण के संबंध में किसी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन के लिए उपबंध करने की शक्ति प्राप्त है।
2. संविधान का यह अनुच्छेद संसद को यह शक्ति भी देता है कि वह कानून बनाकर सर्वोच्च न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय को इस प्रकार के विवादों के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) का प्रयोग करने से रोक सकता है।
3. 'अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956' के तहत केंद्र सरकार द्वारा गठित न्यायाधिकरण (Tribunal) का निर्णय अंतिम होता है और इस निर्णय के विरुद्ध किसी भी अदालत, यहाँ तक कि उच्चतम न्यायालय में भी अपील करने का संवैधानिक अधिकार समाप्त कर दिया गया है (हालांकि 'संविधान (संशोधन)' और 'विशेष अनुमति याचिका' के संवैधानिक पहलुओं को छोड़कर)।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (भाग-I, अनुच्छेद 1-4) के प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के तहत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह विधि द्वारा 'ऐसे नियमों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे', संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना कर सकती है, जो कि उन विदेशी भू-भागों पर लागू होता है जो पहले से भारत का हिस्सा नहीं थे।
2. अनुच्छेद 3 के अंतर्गत किसी राज्य के क्षेत्रफल को बढ़ाने, घटाने, उसके नाम या सीमा में परिवर्तन करने संबंधी कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना संसद के किसी भी सदन में पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता है, तथा राष्ट्रपति को ऐसा विधेयक संसद में भेजने से पहले संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजना अनिवार्य होता है और राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई सिफारिश या राय को मानना संसद के लिए संवैधानिक रूप से बाध्यकारी होता है।
3. अनुच्छेद 4 के अनुसार अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के अधीन नए राज्यों का प्रवेश, गठन, सीमाओं या नामों में परिवर्तन से संबंधित विधियों को संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए 'संविधान संशोधन' नहीं माना जाएगा, जिसका अर्थ है कि ऐसे कानूनों को संसद द्वारा साधारण बहुमत (सामान्य विधायी प्रक्रिया) से पारित किया जा सकता है।
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और लोकसभा तथा राज्यसभा के विधाई विशेषाधिकारों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 107 के अंतर्गत संसद में पुनः स्थापित किए जाने वाले विधेयकों के संदर्भ में, लोकसभा के विघटन पर राज्यसभा में लंबित ऐसा विधेयक जो लोकसभा द्वारा पारित नहीं किया गया हो, वह व्यपगत (Lapse) नहीं होता है, किंतु यदि कोई विधेयक लोकसभा द्वारा पारित कर दिया गया है और वह राज्यसभा में विचारधीन है, तो लोकसभा के विघटन के साथ वह विधेयक स्वतः व्यपगत हो जाता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 100 के अनुसार संसद के दोनों सदनों की बैठकों में कोरम (गणपूर्ति) कुल सदस्य संख्या का दसवां हिस्सा (यानि 10 प्रतिशत) निर्धारित किया गया है, और यदि सदन की बैठक के दौरान कोरम पूरा नहीं होता है, तो पीठासीन अधिकारी का यह वैधानिक कर्तव्य है कि वह सदन को स्थगित कर दे या बैठक को तब तक के लिए निलंबित कर दे जब तक कोरम पूरा न हो जाए।
3. अनुच्छेद 105 के अंतर्गत संसद के दोनों सदनों को और उनके सदस्यों को मिलने वाले संसदीय विशेषाधिकारों के तहत, यदि कोई सदन अपने विशेषाधिकार हनन के मामले में किसी व्यक्ति को दंडित करता है, तो उस दंडात्मक कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा किसी भी परिस्थिति में नहीं की जा सकती है, क्योंकि आंतरिक विधायी कार्यवाहियाँ पूर्णतः न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार से बाहर होती हैं।
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