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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग IV में वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - अनुच्छेद 36-51) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के तहत अंतर्विष्ट सामाजिक-आर्थिक न्याय के सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए यदि संसद या राज्य विधानमंडल कोई ऐसा कानून बनाते हैं जो अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो अनुच्छेद 31C के अनुसार उस कानून को इस आधार पर अमान्य घोषित नहीं किया जा सकता कि वह उक्त मूल अधिकारों का असंगत है।
  2. 2. संविधान के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत राज्य पूरे भारत के राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code) को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा, और यह उपबंध केवल केंद्र सरकार की विधायी शक्ति के अंतर्गत आता है, जिसके क्रियान्वयन में राज्य विधानमंडलों की कोई भूमिका नहीं होती है।
  3. 3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि नीति निर्देशक तत्व प्रकृति से गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) होने के बावजूद, मौलिक अधिकारों के पूरक हैं और न्यायालय किसी वैधानिक प्रावधान की संवैधानिकता का परीक्षण करते समय यह देख सकता है कि क्या वह कानून DPSP के लक्ष्यों को आगे बढ़ाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 31C के अनुसार, यदि कोई कानून अनुच्छेद 39(b) और (c) [भौतिक संसाधनों के स्वामित्व का वितरण तथा धन का संकेंद्रण रोकना] को लागू करने के लिए बनाया जाता है, तो उसे अनुच्छेद 14 और 19 के उल्लंघन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती। भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के विस्तृत अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि DPSP और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन का यह एक महत्वपूर्ण आयाम है। कथन 2 गलत है क्योंकि 'समान नागरिक संहिता' (अनुच्छेद 44) को लागू करने के लिए केंद्र और राज्य दोनों ही अपनी विधायी क्षमता के अनुसार कानून बना सकते हैं (यह समवर्ती सूची का विषय है)। कथन 3 सही है, न्यायालयों ने माना है कि मौलिक अधिकार और DPSP एक-दूसरे के पूरक हैं और संवैधानिक सामंजस्य के सिद्धांत के तहत कानून की वैधता तय करते समय DPSP को भी आधार बनाया जा सकता है।
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