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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्च न्यायालयों (High Courts) की अधिकारिता, स्वतंत्रता और अधीनस्थ न्यायालयों के नियंत्रण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction) सर्वोच्च न्यायालय की अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्रदत्त रिट अधिकारिता की तुलना में अधिक विस्तृत है, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी कर सकता है, जबकि उच्च न्यायालय मूल अधिकारों के साथ-साथ किसी अन्य प्रयोजन (जैसे सामान्य कानूनी अधिकारों के उल्लंघन पर) के लिए भी रिट जारी कर सकता है।
  2. 2. संविधान के अनुच्छेद 235 के तहत प्रत्येक राज्य के अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण, जिसमें जिला न्यायालयों और उनके नीचे के न्यायलयों के अधिकारियों की पोस्टिंग, पदोन्नति और छुट्टियों का अनुदान शामिल है, पूरी तरह से संबंधित राज्य के राज्यपाल के प्रशासनिक और विधिक नियंत्रण में निहित होता है, तथा इसमें उच्च न्यायालय की कोई परामर्शदात्री या निर्णायक भूमिका नहीं होती है।
  3. 3. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया (अनुच्छेद 124 के तहत) जैसी है, वैसी ही प्रक्रिया उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उसके पद से हटाने के लिए अनुच्छेद 217(1)(b) के अंतर्गत अपनाई जाती है, जिसमें संसद के प्रत्येक सदन द्वारा विशेष बहुमत से समावेदन पारित किया जाना आवश्यक होता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता सर्वोच्च न्यायालय की अनुच्छेद 32 के तहत अधिकारिता से अधिक व्यापक है। सर्वोच्च न्यायालय केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ही रिट जारी कर सकता है, जबकि उच्च न्यायालय मूल अधिकारों के साथ-साथ अन्य विधिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए भी रिट जारी कर सकता है। कथन 2 गलत है: संविधान के अनुच्छेद 235 के अनुसार, राज्य के अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण (जैसे पोस्टिंग, पदोन्नति, पदस्थापन आदि) संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय में निहित होता है, न कि सीधे राज्यपाल के विवेकधीन नियंत्रण में, हालांकि राज्यपाल उच्च न्यायालय के परामर्श से कार्य करता है। कथन 3 सही है: उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया भी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही होती है—यानी संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित प्रस्ताव और राष्ट्रपति के आदेश द्वारा। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था को पढ़ें।
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