BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

Indian Polity
22 views

राज्य की कार्यपालिका के संदर्भ में राज्यपाल की शक्तियों, अध्यादेश निर्माण तथा मुख्यमंत्री की स्थिति के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 213 के तहत राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश की आयु राज्य विधानमंडल के पुनः समवेत होने की तिथि से छह सप्ताह की अवधि समाप्त होने पर स्वतः समाप्त हो जाती है, बशर्ते इस अवधि के भीतर विधानमंडल द्वारा उसे अस्वीकृत करने वाला संकल्प पारित न कर दिया गया हो, तथा राज्यपाल इस शक्ति का प्रयोग अपने स्वविवेक से बिना मंत्रिपरिषद की सलाह के कर सकता है।
  2. 2. संविधान के अनुच्छेद 164(1) के अनुसार राज्यों के मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या संबंधित राज्य की विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी, किंतु यदि किसी छोटे राज्य की विधानसभा की कुल सदस्य संख्या कम है, तो मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की न्यूनतम संख्या बारह से कम नहीं होनी चाहिए (मिजोरम और सिक्किम जैसे राज्यों को छोड़कर)।
  3. 3. अनुच्छेद 167 के अंतर्गत मुख्यमंत्री का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह राज्य के प्रशासन संबंधी और विधान के प्रस्तावों से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को संसूचित करे, और यदि राज्यपाल ऐसी अपेक्षा करे तो किसी ऐसे विषय को मंत्रिपरिषद के विचार के लिए प्रस्तुत करे जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर लिया है किन्तु मंत्रिपरिषद ने विचार नहीं किया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 213 के तहत राज्यपाल को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु वह इस शक्ति का प्रयोग केवल अपनी मंत्रिपरिषद की सलाह और सहायता से ही कर सकता है, न कि पूरी तरह से अपने स्वविवेक से (कुछ विशिष्ट मामलों को छोड़कर जहाँ राष्ट्रपति के निर्देश की आवश्यकता होती है)। इसके अलावा, अध्यादेश की अधिकतम अवधि छह सप्ताह होती है। कथन 2 सत्य है; 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के अनुसार राज्य मंत्रिपरिषद की अधिकतम संख्या 15% निर्धारित की गई है, तथा छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों में आदिवासी कल्याण मंत्री के लिए न्यूनतम संख्या 12 निश्चित की गई है। कथन 3 सत्य है; अनुच्छेद 167 मुख्यमंत्री के प्रशासनिक और विधायी दायित्वों को स्पष्ट करता है, जिसके तहत उन्हें राज्यपाल को सभी निर्णयों से अवगत कराना होता है। भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के विस्तृत अध्ययन के लिए इस पोर्टल का संदर्भ लें।
Share:

Related Questions

→ भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की अधिकारिता, शक्तियों और न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 131 के अनुसार उच्चतम न्यायालय की मूल (Original) अधिकारिता भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच अथवा दो या अधिक राज्यों के बीच किसी कानूनी विवाद में अनन्य रूप से लागू होती है, किंतु यदि ऐसा विवाद किसी ऐसी संधि, समझौते या प्रसंविदा से उत्पन्न होता है जो संविधान के लागू होने से पहले की गई थी और अभी भी प्रवृत्त है, तो ऐसी स्थिति में उच्चतम न्यायालय की यह मूल अधिकारिता उस विवाद पर लागू नहीं होगी। 2. संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से विधि या तथ्य के किसी ऐसे प्रश्न पर, जो सार्वजनिक महत्व का है, परामर्श मांगने की शक्ति प्राप्त है, और यदि इस प्रकार का कोई संदर्भ उच्चतम न्यायालय को भेजा जाता है, तो न्यायालय के लिए यह अनिवार्य है कि वह उस पर अपनी राय राष्ट्रपति को संसूचित करे तथा राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई उस सलाह को मानने के लिए पूर्ण रूप से बाध्य होता है। 3. संविधान के अनुच्छेद 137 के अधीन उच्चतम न्यायालय को संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि या संविधान के अनुच्छेद 145 के अधीन बनाए गए नियमों के अधीन रहते हुए, अपने द्वारा दिए गए किसी निर्णय या आदेश का पुनरावलोकन (Review) करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति देश के किसी भी अन्य न्यायालय को प्राप्त नहीं है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्यों के उच्च न्यायालयों (High Courts) और अधीनस्थ न्यायालयों की संरचना, शक्तियों और क्षेत्राधिकार के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर किसी भी व्यक्ति या प्राधिकारी को निर्देश, आदेश या रिट (जैसे बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, उत्प्रेषण, अधिकार पृच्छा और प्रतिषेध) जारी करने की शक्ति प्राप्त है, और यह रिट अधिकारिता सर्वोच्च न्यायालय की अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्रदत्त रिट अधिकारिता की तुलना में अधिक व्यापक है क्योंकि उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के अतिरिक्त सामान्य कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन के लिए भी रिट जारी कर सकता है। 2. अनुच्छेद 233 के अनुसार किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति उस राज्य के राज्यपाल द्वारा संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करके की जाती है, किंतु जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए व्यक्ति कम से कम सात वर्ष का अधिवक्ता होना चाहिए और वह केंद्र या राज्य सरकार की सेवा में पहले से सेवारत नहीं होना चाहिए। 3. अनुच्छेद 235 के तहत अधीनस्थ न्यायालयों (जिनमें जिला न्यायालय और उनके अधीनस्थ अन्य न्यायालय शामिल हैं) पर नियंत्रण का अधिकार, जिसमें उनकी पोस्टिंग, पदोन्नति और छुट्टियों का अनुदान शामिल है, पूरी तरह से संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय में निहित होता है, न कि राज्य सरकार के कार्यकारी विभागों में। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और चुनावी सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के खंड (2) के अनुसार निर्वाचन आयोग मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों (यदि कोई हों) से मिलकर बनेगा, और इनकी नियुक्ति संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, तथा आयोग को सहायता प्रदान करने के लिए क्षेत्रीय आयुक्तों की नियुक्ति का अधिकार भी संसद के पास सुरक्षित है। 2. वर्ष 1993 में सर्वोच्च न्यायालय ने 'इन्द्रजीत बरुवा बनाम भारत संघ' मामले के ऐतिहासिक निर्णय में यह स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग की बहु-सदस्यीय प्रकृति में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के पास मतदान के अधिकारों के मामले में समान शक्तियाँ होती हैं, और किसी भी मतभेद की स्थिति में निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है, न कि केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सहमति से। 3. निर्वाचन आयोग के व्यय भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) पर भारित (Charged) होते हैं, ठीक उसी तरह जैसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों और भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के वेतन व भत्ते होते हैं, ताकि आयोग की वित्तीय स्वायत्तता और निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान की अनुसूचियों, राजभाषाओं और राजनीतिक दलों की मान्यता से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान की आठवीं अनुसूची में मूल रूप से 14 भाषाएँ शामिल थीं, जिन्हें विभिन्न संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से जोड़कर वर्तमान में 22 कर दिया गया है, और इस अनुसूची में 'अंग्रेजी' और 'राजस्थानी' दोनों भाषाओं को अभी तक संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं हुआ है। 2. भारतीय संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 348 में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में तथा अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा का विशेष प्रावधान किया गया है, जिसके अनुसार संसद द्वारा विधि बनाकर जब तक अन्य उपबंध न किया जाए, तब तक सभी कार्यवाहियां केवल अंग्रेजी में ही होंगी। 3. निर्वाचन आयोग द्वारा किसी पंजीकृत राजनीतिक दल को 'राष्ट्रीय दल' (National Party) के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि वह कम से कम चार राज्यों में लोकसभा चुनावों या आम विधानसभा चुनावों में कुल वैध मतों का कम से कम 6 प्रतिशत मत प्राप्त करे और इसके अतिरिक्त कम से कम चार अलग-अलग राज्यों से लोकसभा में कुल 4 सीटें भी जीते। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति की पदावधि, प्रधानमंत्री की नियुक्ति और संघीय मंत्रिपरिषद की कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 67 के अनुसार उपराष्ट्रपति अपने पद ग्रहण करने की तारीख से पाँच वर्ष की अवधि तक पद धारण करता है, किंतु वह राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपने पद का त्याग कर सकता है, या उसे राज्य सभा के ऐसे प्रस्ताव द्वारा उसके पद से हटाया जा सकता है जिसे राज्य सभा के तत्कालिक सभी सदस्यों के बहुमत ने पारित किया हो और जिससे लोक सभा सहमत हो, जिसके लिए कम से कम चौदह दिन पूर्व की लिखित सूचना देना अनिवार्य होता है। 2. अनुच्छेद 75(1) के अंतर्गत प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर करता है, तथा संवैधानिक रूप से यह पूरी तरह अनिवार्य है कि प्रधानमंत्री या मंत्रिपरिषद का कोई भी अन्य मंत्री अपने पद की शपथ ग्रहण करने के समय संसद के किसी न किसी सदन (लोक सभा या राज्य सभा) का सदस्य अवश्य होना चाहिए, अन्यथा वह छह महीने के भीतर भी पद पर बने रहने का पात्र नहीं रहता है। 3. अनुच्छेद 75(3) के अनुसार केंद्रीय मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोक सभा के प्रति उत्तरदायी होती है, जिसका अर्थ यह है कि यदि लोक सभा में मंत्रिपरिषद के विरुद्ध कोई अविश्वास प्रस्ताव (No-confidence Motion) पारित हो जाता है, तो संपूर्ण मंत्रिपरिषद को अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ता है, और इस सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत यह भी सुनिश्चित करता है कि मंत्रिमंडल का कोई भी निर्णय यदि एक बार कैबिनेट द्वारा ले लिया जाए, तो प्रत्येक मंत्री उसके प्रति संसद के भीतर और बाहर एकजुट रूप से बाध्य होता है, भले ही आंतरिक बैठकों में उसका मतभेद क्यों न रहा हो। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.