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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य विधानमंडल—विधानसभा और विधान परिषद—की संरचना, गठन और विधायी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 169 के अंतर्गत संसद किसी राज्य में विधान परिषद के सृजन या उत्सादन के लिए कानून बना सकती है, बशर्ते संबंधित राज्य की विधानसभा ने उस राज्य के कुल सदस्यों के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से इस आशय का एक संकल्प पारित कर दिया हो, और ऐसा संकल्प पारित होने पर संसद के लिए उस राज्य में विधान परिषद का गठन करना संवैधानिक रूप से अनिवार्य हो जाता है।
- 2. विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या उस राज्य की विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती है, किंतु किसी भी परिस्थिति में विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या चालीस से कम नहीं होनी चाहिए (अपवादस्वरूप जम्मू-कश्मीर के समय स्थिति भिन्न थी)।
- 3. विधान परिषद के सदस्यों के निर्वाचन और मनोनयन के संबंध में, इसके कुल सदस्यों का 1/12 भाग ऐसे स्नातकों द्वारा चुना जाता है जो उस राज्य के भीतर कम से कम तीन वर्ष पूर्व ग्रेजुएट हो चुके हैं, तथा 1/6 भाग राज्यपाल द्वारा साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्तियों में से मनोनीत किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 169 के तहत संसद राज्य विधानसभा के संकल्प के आधार पर विधान परिषद का सृजन या उत्सादन कर सकती है, किंतु संसद ऐसी विधि बनाने के लिए बाध्य (Compelled) नहीं है; यह संसद की स्वविवेक शक्ति है। कथन 2 सत्य है क्योंकि अनुच्छेद 171(1) के अनुसार विधान परिषद की अधिकतम संख्या विधानसभा की 1/3 और न्यूनतम संख्या 40 निर्धारित की गई है। कथन 3 असत्य है क्योंकि स्नातकों (Graduates) द्वारा चुने जाने वाले सदस्यों का भाग 1/12 नहीं बल्कि 1/6 होता है, और 3 वर्ष का स्थान पर कम से कम 3 वर्ष पूर्व स्नातक होना चाहिए, किंतु सहकारिता आंदोलन को राज्यपाल द्वारा मनोनयन (अनुच्छेद 171(5)) के दायरे में विशेष रूप से शामिल नहीं किया गया है (मनोनयन के 5 आधार: साहित्य, विज्ञान, कला, समाज सेवा और सहकारिता नहीं बल्कि सहकारी आंदोलन के स्थान पर सामान्यतः अन्य प्रावधान हैं; मुख्य रूप से मनोनयन में कला, साहित्य, विज्ञान, समाज सेवा और सहकारिता शामिल है, परंतु स्नातक निर्वाचन 1/6 होता है जो यहाँ गलत दिया गया है)। विस्तृत अध्ययन के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर जा सकते हैं।
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भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं के प्रावधानों और उनकी संरचना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस अधिनियम द्वारा संविधान में जोड़े गए भाग IX के अनुच्छेद 243-B के तहत देश के सभी राज्यों में त्रि-स्तरीय (ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तर) पंचायती राज प्रणाली का गठन अनिवार्य किया गया है, किंतु जिन राज्यों की कुल जनसंख्या बीस लाख से कम है, उन्हें मध्यवर्ती स्तर की पंचायत का गठन न करने की छूट दी गई है।
2. अनुच्छेद 243-C के अनुसार पंचायतों के सभी स्तरों के सदस्यों का प्रत्यक्ष निर्वाचन संबंधित प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से सीधे जनता द्वारा किया जाता है, जबकि मध्यवर्ती और जिला स्तरों पर पंचायतों के अध्यक्षों का निर्वाचन उन स्तरों की पंचायतों के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से ही अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है।
3. अनुच्छेद 243-G के अंतर्गत राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा पंचायतों को ऐसी शक्तियाँ और प्राधिकार प्रदान कर सकता है जो आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएँ तैयार करने तथा उन्हें लागू करने के लिए आवश्यक हों, जिसमें ग्यारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध 29 कार्यात्मक विषयों से संबंधित मामले शामिल हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राजभाषा, राजनीतिक दलों की मान्यता तथा संविधान की अनुसूचियों और भागों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के भाग XVII के अनुच्छेद 348 के अनुसार उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्रवाइयां और याचिकाएं अनिवार्य रूप से केवल अंग्रेजी भाषा में ही होंगी, किंतु राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से राज्यपाल किसी भी राज्य के उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों में हिंदी या राज्य की अन्य राजभाषा के प्रयोग को प्राधिकृत कर सकता है, बशर्ते उच्च न्यायालय के निर्णय अंग्रेजी में ही दिए जाएं जब तक संसद अन्यथा प्रावधान न करे।
2. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के प्रावधानों के तहत किसी राजनीतिक दल का निर्वाचन आयोग के पास पंजीकरण कराना अनिवार्य होता है, किंतु यह पंजीकरण दल को राष्ट्रीय या राज्य स्तर के 'मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल' (Recognized Political Party) का दर्जा स्वतः प्रदान नहीं करता है, जिसके लिए निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित विशिष्ट मत प्रतिशत या सीटों की संख्या के मानदंडों को पूरा करना आवश्यक होता है।
3. संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किए जाने वाले कानूनों को न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से पूर्णतः मुक्त रखने का प्रावधान मूल संविधान में था, जिसे 1973 के 'केशवानंद भारती मामले' के पश्चात अद्यतन करते हुए उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 24 अप्रैल 1973 के बाद इस अनुसूची में जोड़े गए सभी विधानों की न्यायिक समीक्षा इस आधार पर की जा सकती है कि वे संविधान के मूलभूत ढांचे (Basic Structure) का उल्लंघन करते हैं या नहीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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अविश्वास प्रस्ताव कहाँ लाया जाता है?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य विधानमंडल की विधाई शक्तियों, विधानसभा और विधान परिषद के अंतर्संबंधों तथा धन विधेयक के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 197 के अनुसार, यदि विधान परिषद द्वारा किसी साधारण विधेयक को अस्वीकार कर दिया जाता है या विधान परिषद के संशोधनों से विधानसभा सहमत नहीं होती है, तो विधानसभा उस विधेयक को दोबारा पारित कर सकती है, और विधान परिषद इस विधेयक को अधिकतम चार महीने (प्रथम बार तीन महीने और पुनः भेजने पर एक महीना) तक ही रोक सकती है।
2. धन विधेयक (Money Bill) के संबंध में विधान परिषद की शक्ति अत्यंत सीमित होती है; विधानसभा द्वारा पारित धन विधेयक जब विधान परिषद के पास भेजा जाता है, तो विधान परिषद को उसे बिना किसी संशोधन या अपनी सिफारिश के अधिकतम 14 दिनों के भीतर विधानसभा को लौटाना होता है, और यदि वह ऐसा नहीं करती है, तो उस अवधि की समाप्ति पर वह विधेयक दोनों सदनों द्वारा उसी रूप में पारित मान लिया जाता है जिस रूप में वह विधानसभा द्वारा पारित किया गया था।
3. अनुच्छेद 169 के अंतर्गत किसी राज्य में विधान परिषद के सृजन या उत्सादन के लिए संसद द्वारा विधि बनाई जाती है, जिसके लिए यह अनिवार्य है कि संबंधित राज्य की विधानसभा अपने कुल सदस्यों के बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से इस आशय का संकल्प पारित करे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की विभिन्न शक्तियों, प्रक्रिया और संविधान के निर्वचन से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित किया गया विधि भारत के राज्य क्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर आबद्धकर (Binding) होता है, किंतु स्वयं उच्चतम न्यायालय अपने पूर्ववर्ती निर्णयों या आदेशों से पूर्णतः बाध्य नहीं होता है और वह न्यायिक समीक्षा या पुनरावलोकन के माध्यम से अपने पिछले निर्णयों को पलट सकता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 144 के तहत भारत के राज्य क्षेत्र के सभी सिविल और न्यायिक प्राधिकारी उच्चतम न्यायालय की सहायता में कार्य करेंगे, जिसका अर्थ है कि कार्यपालिका और विधायिका के साथ-साथ राज्य के सभी प्रशासनिक निकाय सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों को लागू करने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य हैं।
3. संविधान के अनुच्छेद 145(3) के अनुसार किसी मामले में जो संविधान के निर्वचन (Interpretation of Constitution) से संबंधित कोई सारवान प्रश्न अंतर्ग्रस्त है, उसकी सुनवाई करने के लिए बैठने वाले न्यायमूर्तियों की न्यूनतम संख्या (कोरम) पाँच से कम नहीं होनी चाहिए, जिसे संविधान पीठ (Constitution Bench) कहा जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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