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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका, विशेष रूप से राज्यपाल की अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति (अनुच्छेद 213) और मुख्यमंत्री तथा मंत्रिपरिषद की स्थिति के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 213 के अनुसार, राज्यपाल को राज्य विधानमंडल के विश్రాंतकाल (Recess) के दौरान अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु वह राष्ट्रपति के निर्देशों के बिना ऐसा कोई अध्यादेश प्रख्यापित नहीं कर सकता यदि उस विषय से संबंधित विधेयक को राज्य विधानसभा में पुनः स्थापित करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति (Previous Sanction) की आवश्यकता होती।
  2. 2. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'डी.सी. वाधवा वाद (1987)' में यह स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया गया था कि अध्यादेशों का लगातार पुनर्गठन या बार-बार पुनः प्रख्यापन करना (Re-promulgation) संविधान की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का उल्लंघन और एक छद्म विधि निर्माण (Fraud on the Constitution) है, जिसे न्यायपालिका द्वारा निरस्त किया जा सकता है।
  3. 3. संविधान के अनुच्छेद 164 के अंतर्गत मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है, और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर करता है, तथा इस संबंध में यदि किसी व्यक्ति को विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य न होने के बावजूद मंत्री नियुक्त किया जाता है, तो उसे अधिकतम छह महीने के भीतर किसी एक सदन का सदस्य बनना अनिवार्य होता है, अन्यथा उसका मंत्री पद स्वतः समाप्त हो जाता है, और इस अवधि के भीतर यदि वह एक बार चुनाव हार जाता है, तो उसे उसी कार्यकाल में दोबारा उसी पद पर पुनः नियुक्त नहीं किया जा सकता।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 213 के तहत राज्यपाल को अध्यादेश जारी करने की शक्ति है, लेकिन यदि किसी विषय पर कानून बनाने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति या निर्देश आवश्यक हो, तो राज्यपाल राष्ट्रपति के निर्देशों के बिना अध्यादेश जारी नहीं कर सकता। कथन 2 भी सही है; 'डी.सी. वाधवा वाद (1987)' में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि बार-बार अध्यादेशों का पुनर्गठन करना असंवैधानिक है और यह कार्यपालिका की मनमानी को दर्शाता है। कथन 3 आंशिक रूप से गलत है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के 'एस.आर. चौधरी वाद (2001)' के अनुसार, विधानमंडल का सदस्य बने बिना कोई व्यक्ति अधिकतम 6 महीने तक मंत्री रह सकता है, किंतु यदि वह चुनाव हार जाता है, तो उसी विधानसभा/परिषद के कार्यकाल में उसे पुनः मंत्री नियुक्त नहीं किया जा सकता—यह संवैधानिक परंपरा और नैतिकता का हिस्सा है, लेकिन इस प्रश्न के संदर्भ में केवल कथन 1 और 2 पूरी तरह से सही हैं, इसलिए विकल्प (a) सही उत्तर है। विस्तृत अध्ययन के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर जा सकते हैं।
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भारतीय संविधान के निर्माण और संविधान सभा की कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान सभा के गठन का आधार कैबिनेट मिशन योजना, 1946 था, जिसके तहत संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या 389 निर्धारित की गई थी, जिसमें ब्रिटिश भारत के प्रांतों को 293 सीटें और देशी रियासतों को 93 सीटें आवंटित की गई थीं। 2. संविधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से हुआ था, और इसमें देशी रियासतों के प्रतिनिधियों का चयन रियासतों के प्रमुखों द्वारा नामित किया जाना था, जिसके कारण संविधान सभा एक आंशिक रूप से निर्वाचित और आंशिक रूप से मनोनीत निकाय थी। 3. संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसंबर 1946 को आयोजित की गई थी, जिसका मुस्लिम लीग ने बहिष्कार किया था, और इस अवसर पर सभा के सबसे वरिष्ठ सदस्य डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को फ्रांस की परंपरा के अनुसार सभा का अस्थायी अध्यक्ष (Interim President) चुना गया था, जबकि बाद में 11 दिसंबर 1946 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को स्थायी अध्यक्ष निर्वाचित किया गया। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के अंतर्गत 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties) के प्रावधानों, उनकी प्रकृति तथा उनके संवैधानिक विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर वर्ष 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान के भाग IV-A के अनुच्छेद 51A के तहत जोड़ा गया, जिसके अंतर्गत प्रारंभ में 10 मूल कर्तव्य थे। 2. ये मूल कर्तव्य प्रकृति से न्यायोचित (Justiciable) हैं, अर्थात यदि कोई नागरिक इनका उल्लंघन करता है, तो संसद या राज्य विधानमंडल इन्हें लागू करने के लिए सीधे उच्चतम न्यायालय के माध्यम से संवैधानिक और कानूनी दंड का प्रावधान कर सकती है। 3. वर्ष 2002 में पारित 86वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से ग्यारहवें मूल कर्तव्य को जोड़ा गया, जिसके तहत छह से चौदह वर्ष की आयु के बीच के अपने बच्चे को शिक्षा के अवसर प्रदान करने का कर्तव्य उस माता-पिता या संरक्षक का होगा। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत 'नगरपालिकाओं' के गठन, संरचना और वार्ड समितियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान में नया भाग IX-A जोड़ा गया, जिसका शीर्षक 'नगरपालिकाएँ' है और इसके अंतर्गत अनुच्छेद 243-P से 243-ZG तक के प्रावधान शामिल किए गए हैं, जिसमें प्रत्येक राज्य में तीन प्रकार की नगरपालिकाओं (नगर पंचायत, नगर परिषद और नगर निगम) के गठन का उपबंध है। 2. दस लाख या उससे अधिक की जनसंख्या वाले महानगर क्षेत्र में एक या एक से अधिक वार्डों को मिलाकर 'वार्ड समितियों' (Ward Committees) के गठन का संवैधानिक प्रावधान है, तथा इन समितियों की संरचना और गठन से संबंधित विधि बनाने की शक्ति राज्य के राज्यपाल में निहित है। 3. नगरपालिकाओं के सभी स्थानों के लिए निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से राज्य के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से सीधे मतदाताओं द्वारा किया जाता है, किंतु महानगर क्षेत्र के लिए गठित 'महानगर योजना समिति' (Metropolitan Planning Committee) के कुल सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्य उस क्षेत्र के नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों और जिला पंचायतों के अध्यक्षों द्वारा अपने में से ही चुने जाते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (Pardoning Power - अनुच्छेद 72) और उसकी न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति कार्यपालिका की शक्ति का एक हिस्सा नहीं है, बल्कि यह एक स्वतंत्र संवैधानिक विशेषाधिकार है जिसका प्रयोग वह मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना अपने स्वविवेक से कर सकता है। 2. उच्चतम न्यायालय द्वारा 'ईपुरा सुधाकर बनाम आंध्र प्रदेश राज्य' (2006) और अन्य मामलों में यह प्रतिपादित किया गया है कि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का प्रयोग न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर है, क्योंकि यह एक संप्रभु कृत्य (Sovereign Act) है। 3. राष्ट्रपति मृत्युदंड (Death Sentence) को क्षमा करने की शक्ति रखता है, और इसके साथ ही कोर्ट मार्शल (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के मामलों में भी क्षमादान देने का अधिकार केवल राष्ट्रपति को ही प्राप्त होता है, राज्यपाल को नहीं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? किसी राज्य में 'राष्ट्रपति शासन' (President's Rule) किस अनुच्छेद के तहत लगाया जाता है?
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