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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका, विशेष रूप से राज्यपाल की शक्तियों, अध्यादेश निर्माण और मुख्यमंत्री की संवैधानिक स्थिति के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 163 के अनुसार, राज्यपाल को अपनी कृत्यों का निर्वहन करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रमुख मुख्यमंत्री होगा, तथा यह उपबंध स्पष्ट करता है कि राज्यपाल द्वारा अपने विवेक का प्रयोग करने की शक्ति केवल उन्हीं मामलों तक सीमित है जहाँ संविधान द्वारा या उसके अधीन उसे स्वविवेक से कार्य करने की स्पष्ट छूट दी गई है, और यदि इस बात पर कोई विवाद उत्पन्न होता है कि कोई मामला राज्यपाल के विवेक का विषय है या नहीं, तो राज्यपाल का इस संबंध में किया गया निर्णय अंतिम होगा और किसी भी न्यायालय में उसकी न्यायसमीक्षा (Judicial Review) नहीं की जा सकती है।
- 2. संविधान के अनुच्छेद 213 के अधीन राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश की वही शक्ति और प्रभाव होता है जो राज्य विधानमंडल के किसी अधिनियम का होता है, किंतु राज्यपाल द्वारा ऐसा कोई भी अध्यादेश राष्ट्रपति के निर्देशों के बिना प्रख्यापित नहीं किया जा सकता यदि उस विषय से संबंधित विधेयक को राज्य विधानसभा में पुनः स्थापित करने के लिए संविधान के अनुसार राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी की आवश्यकता होती।
- 3. संविधान के अनुच्छेद 164(1) के अंतर्गत मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर करता है, तथा छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा राज्यों में जनजातियों के कल्याण के लिए एक पृथक मंत्री का होना अनिवार्य किया गया है, जिसके प्रभार के अंतर्गत बिहार राज्य को भी 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा शामिल कर लिया गया था, जबकि झारखंड को इस अनिवार्यता से मुक्त रखा गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 163(2) के अनुसार यदि यह प्रश्न उठता है कि कोई विषय राज्यपाल के विवेक का मामला है या नहीं, तो राज्यपाल का इस संबंध में निर्णय अंतिम होता है, किंतु इसके साथ ही यह नियम है कि राज्यपाल का स्वविवेक पूरी तरह अनियंत्रित नहीं है और इसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है (जैसा कि एस.बी. सामंत मामला और नबम रेबिया मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा स्पष्ट किया गया है)। कथन 2 सत्य है; अनुच्छेद 213 के अनुसार राज्यपाल विधानमंडल के विश्रांतकाल में अध्यादेश जारी कर सकता है, परंतु यदि उस विषय पर विधेयक लाने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति आवश्यक हो, तो राज्यपाल राष्ट्रपति के निर्देश के बिना अध्यादेश प्रख्यापित नहीं कर सकता। कथन 3 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 164(1) के परंतुुक (Proviso) के अनुसार छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा राज्यों में जनजातियों के कल्याण के लिए एक पृथक मंत्री होगा; मूल रूप से इस प्रावधान में बिहार शामिल था जिसे 94वें (न कि 91वें) संविधान संशोधन अधिनियम, 2006 द्वारा इस अनिवार्यता से बाहर कर दिया गया तथा झारखंड एवं छत्तीसगढ़ को जोड़ा गया था। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पढ़ें।
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भारत के संविधान में 'लोक कल्याणकारी राज्य' (Welfare State) का विचार कहाँ है?
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) और उससे संबंधित विभिन्न आयामों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान की प्रस्तावना में 'गणराज्य' (Republic) शब्द का तात्पर्य यह है कि भारत का राज्याध्यक्ष (राष्ट्रपति) वंशानुगत नहीं होता है, बल्कि वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक निश्चित अवधि के लिए जनता द्वारा निर्वाचित होता है।
2. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'बेरूबारी यूनियन वाद (1960)' में यह स्पष्ट निर्णय दिया गया था कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है और इसमें संसद द्वारा अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संशोधन किया जा सकता है।
3. प्रस्तावना में अभी तक केवल एक बार वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्दों को जोड़ा गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत के प्रधानमंत्री की नियुक्ति संविधान के किस अनुच्छेद के तहत होती है?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) और केंद्र-राज्यीय प्रशासनिक व वित्तीय संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 263 के प्रावधानों के तहत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह जनहित में अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना कर सकता है, और इस परिषद् के निर्णयों या सिफारिशों का देश के सभी राज्यों और केंद्र सरकार पर पूर्ण रूप से विधिक और बाध्यकारी (Legally Binding) प्रभाव होता है।
2. पुंछी आयोग (Punchhi Commission, 2007-2010) ने अपनी रिपोर्ट में यह सिफारिश की थी कि अंतर-राज्यीय परिषद् की बैठक वर्ष में कम से कम तीन बार अनिवार्य रूप से आयोजित की जानी चाहिए ताकि केंद्र और राज्यों के बीच प्रभावी समन्वय और नीतिगत संवाद सुनिश्चित हो सके।
3. अनुच्छेद 280 के तहत गठित वित्त आयोग (Finance Commission) भी एक प्रकार का सांविधिक निकाय है जो केंद्र और राज्यों के बीच करों के शुद्ध आगमों के वितरण तथा राज्यों को दी जाने वाली सहायता अनुदान के सिद्धांतों पर राष्ट्रपति को संस्तुतियां देता है।
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भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की स्वतंत्रता, कार्यप्रणाली और चुनाव सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग एक स्थायी निकाय है, और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, किंतु 1993 के पश्चात से चुनाव आयोग द्वारा लिए जाने वाले निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं, जिसमें CEC और अन्य ECs के पास समान शक्तियां होती हैं।
2. निर्वाचन आयोग के सदस्यों की सेवा शर्तें और पदावधि राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती हैं, और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से हटाने की प्रक्रिया वही है जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की होती है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की लिखित सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा किसी भी परिस्थिति में नहीं हटाया जा सकता।
3. चुनाव सुधारों से संबंधित 'इंद्रजीत गुप्त समिति' (1998) ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए राज्य द्वारा वित्तीय सहायता (State Funding of Elections) के सिद्धांत का समर्थन किया था, बशर्ते यह सहायता केवल पंजीकृत राजनीतिक दलों को उनके चुनाव प्रदर्शन के आधार पर वस्तु के रूप में (in kind) दी जाए, न कि नगद रूप में।
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