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Indian Polity
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान की प्रस्तावना में अब तक केवल एक बार वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संशोधन किया गया है, जिसके माध्यम से इसमें 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द जोड़े गए थे, और इन शब्दों को जोड़ने से प्रस्तावना के मूल ढांचे (Basic Structure) में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।
  2. 2. सर्वोच्च न्यायालय के 'बेरुबारी यूनियन वाद (1960)' में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया था कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है, और संसद को अनुच्छेद 368 के तहत प्रस्तावना में संशोधन करने की पूर्ण शक्ति प्राप्त है, बशर्ते वह संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन न करे।
  3. 3. 'केशवानंद भारती वाद (1973)' के ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्व के मत को बदलते हुए यह स्वीकार किया कि प्रस्तावना संविधान का भाग है तथा इसमें संशोधन किया जा सकता है, किंतु प्रस्तावना में उल्लेखित 'प्रभुत्व संपन्न', 'लोकतांत्रिक' और 'गणराज्य' जैसे शब्द इसके मूल ढांचे का हिस्सा हैं जिन्हें सामान्य संवैधानिक संशोधनों द्वारा भी समाप्त नहीं किया जा सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में अब तक केवल एक बार 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द जोड़े गए हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि 'बेरुबारी यूनियन वाद (1960)' में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा था कि प्रस्तावना संविधान का अंग **नहीं** है। कथन 3 गलत है क्योंकि केशवानंद भारती वाद (1973) में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि प्रस्तावना संविधान का भाग है और इसमें संशोधन हो सकता है, लेकिन 'प्रभुत्व संपन्न, लोकतांत्रिक और गणराज्य' आदि को विशिष्ट रूप से इस प्रकार परिभाषित नहीं किया गया है कि उन्हें बदला ही न जा सके, बल्कि मूल ढांचे के सिद्धांत के तहत संसद अनुच्छेद 368 के तहत इसमें संशोधन कर सकती है बशर्ते मूल ढांचे का हनन न हो। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पढ़ें।
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