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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग IV में अंतर्विष्ट राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) और उनसे संबंधित संवैधानिक संशोधनों तथा न्यायिक प्रवृत्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 43 के अंतर्गत राज्य, उपयुक्त विधान या आर्थिक संगठन द्वारा या किसी अन्य रीति से, कृषि के आधुनिकीकरण और वैज्ञानिक प्रणालियों से संचालन के लिए प्रयास करेगा, तथा विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक मवेशियों की नस्लों के सुधार और उनके वध पर प्रतिबंध लगाने के लिए कदम उठाएगा।
- 2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में जोड़े गए अनुच्छेद 39A के तहत यह प्रावधान किया गया है कि राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि आर्थिक या अन्य किसी विवशता के कारण कोई भी नागरिक न्याय पाने के अवसर से वंचित न रहे, और राज्य यह सुनिश्चित करने के लिए कि सभी को समान न्याय मिले, निःशुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा।
- 3. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे 'मिनर्वा मिल्स वाद') में यह स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया है कि यद्यपि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि निर्माण में इन्हें लागू करना राज्य का कर्तव्य है, तथापि अनुच्छेद 31C के दायरे के बाहर के मामलों में नीति निर्देशक तत्वों को मूल अधिकारों (विशेषकर अनुच्छेद 14 और 19) पर पूर्ण प्राथमिकता दी जा सकती है, बशर्ते ऐसा कानून समाज के कमजोर वर्गों के कल्याण के लिए बनाया गया हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि कृषि और पशुपालन से संबंधित आधुनिकीकरण तथा गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू मवेशियों के वध पर प्रतिबंध लगाने संबंधी उपबंध अनुच्छेद 48 के अंतर्गत आते हैं, न कि अनुच्छेद 43 के अंतर्गत (अनुच्छेद 43 उद्योगों में कामगारों के लिए निर्वाह मजदूरी आदि से संबंधित है)। कथन 2 सत्य है, क्योंकि 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा अनुच्छेद 39A को जोड़ा गया था जो समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता का प्रावधान करता है। कथन 3 असत्य है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने 'मिनर्वा मिल्स वाद' (1980) में यह स्पष्ट किया था कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और मूल अधिकारों (विशेषकर अनुच्छेद 14 और 19) पर अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अलावा अन्य सभी नीति निर्देशक तत्वों को अनियंत्रित प्राथमिकता नहीं दी जा सकती; सामंजस्यपूर्ण निर्माण (Harmonious Construction) का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। अधिक विस्तृत अध्ययन के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर विजिट करें।
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भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस अधिनियम द्वारा संविधान में भाग IX जोड़ा गया है जिसका शीर्षक 'पंचायते' है, और इसके अनुच्छेद 243-G के अंतर्गत पंचायतों की शक्तियां, प्राधिकार और उत्तरदायित्व निर्धारित किए गए हैं जिसके तहत उन्हें आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार करने का कार्य सौंपा गया है।
2. अधिनियम के अनुसार प्रत्येक राज्य में पंचायतों के सभी स्तरों पर सीटों का आरक्षण अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में अनिवार्य रूप से किया जाता है, तथा महिलाओं के लिए सभी स्तरों पर कुल सीटों का कम से कम एक-तिहाई (33%) भाग आरक्षित होना अनिवार्य है, जिसमें महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें SCs और STs के लिए आरक्षित सीटों के भीतर भी उप-आरक्षित हो सकती हैं।
3. पंचायतों के कार्यकाल के संदर्भ में यह प्रावधान किया गया है कि प्रत्येक पंचायत का कार्यकाल अपनी पहली बैठक के लिए नियत तारीख से पांच वर्ष का होता है, और यदि किसी पंचायत को समय से पूर्व विघटित कर दिया जाता है, तो विघटन की तिथि से छह महीने की अवधि के भीतर चुनाव कराया जाना अनिवार्य है, किंतु यदि बची हुई अवधि छह महीने से कम है, तो नई पंचायत का गठन करना आवश्यक नहीं होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के प्रथम भाग के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) तथा राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के तहत संसद को यह अनन्य शक्ति प्राप्त है कि वह विधि द्वारा संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सकेगी जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 संसद को किसी भी मौजूदा राज्य के क्षेत्र में परिवर्तन, उसकी सीमाओं या नाम बदलने की शक्ति प्रदान करता है।
2. अनुच्छेद 3 के अंतर्गत किसी नए राज्य के निर्माण या उसके क्षेत्रफल व नाम में परिवर्तन से संबंधित कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बाद ही संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है, तथा राष्ट्रपति के लिए यह अनिवार्य है कि वह ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसके विचार जानने के लिए भेजे, और राज्य विधानमंडल द्वारा व्यक्त किया गया मत संसद के लिए पूर्णतः बाध्यकारी होता है।
3. 'बेरुबारी यूनियन वाद' (1960) में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए परामर्श के उपरांत, भारत के किसी भू-भाग को किसी अन्य विदेशी देश को सौंपने (Cession of territory) के लिए अनुच्छेद 3 के अंतर्गत साधारण बहुमत से विधि बनाना पर्याप्त नहीं माना गया, बल्कि इसके लिए संविधान संशोधन अधिनियम (अनुच्छेद 368) की आवश्यकता को अनिवार्य कर दिया गया।
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भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों और आपातकालीन उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 38वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1975 द्वारा यह उपबंधित किया गया कि राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) की घोषणा को किसी भी न्यायालय में न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा जाएगा, जिसे बाद में 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा समाप्त कर दिया गया।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रपति संपूर्ण देश में या उसके किसी विशिष्ट भाग में एक साथ राष्ट्रीय आपातकाल लागू कर सकता है, तथा देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग आधारों पर एक साथ एकाधिक राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणाएँ भी प्रख्यापित कर सकता है।
3. अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा उसकी घोषणा की तारीख से दो महीने के भीतर साधारण बहुमत से अनुमोदित किया जाना अनिवार्य होता है, और एक बार अनुमोदित होने के पश्चात यह अधिकतम तीन वर्ष तक जारी रह सकता है, बशर्ते हर छह महीने पर संसद का पुनः अनुमोदन प्राप्त किया जाए।
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भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों और आपातकालीन उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 38वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1975 द्वारा यह उपबंध किया गया था कि राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की उद्घोषणा को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है, जिसे बाद में 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा निरस्त कर दिया गया।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल को संपूर्ण देश या उसके किसी विशिष्ट भाग पर एक साथ लागू करने की व्यवस्था की गई, तथा आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों का स्वतः निलंबन केवल 'युद्ध' और 'बाह्य आक्रमण' के आधार पर ही संभव बनाया गया, 'सशस्त्र विद्रोह' के आधार पर नहीं।
3. राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 359 के अंतर्गत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह आदेश द्वारा भाग III द्वारा प्रदत्त किसी भी मूल अधिकार के प्रवर्तन को निलंबित कर सकता है, किंतु 44वें संशोधन के पश्चात अनुच्छेद 20 और 21 के प्रवर्तन को निलंबित करने की शक्ति किसी भी परिस्थिति में नहीं दी जा सकती है।
4. वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360) की उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा उसकी तिथि से दो महीने के भीतर अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है, और एक बार अनुमोदित होने के बाद यह वित्तीय आपातकाल अनिश्चित काल तक तब तक प्रवृत्त रहता है जब तक कि राष्ट्रपति द्वारा इसे वापस (Revoke) नहीं ले लिया जाता।
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