त्वरित लिंक्स
Indian Polity
16 views
भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की शक्तियों, क्षेत्राधिकारों और न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत उच्चतम न्यायालय के आरंभिक क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction) के अंतर्गत केंद्र और एक या अधिक राज्यों के बीच या दो या अधिक राज्यों के बीच उत्पन्न होने वाला कोई भी विवाद शामिल है, किंतु यदि ऐसा विवाद किसी ऐसी संधि, करार या प्रसंविदा (Covenant) से उत्पन्न होता है जो संविधान के लागू होने से पहले की है और अभी भी लागू है, तो उच्चतम न्यायालय का यह आरंभिक क्षेत्राधिकार पूरी तरह वर्जित हो जाता है।
- 2. अनुच्छेद 143 के अनुसार राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की शक्ति प्राप्त है, और यदि इस परामर्श के तहत कोई मामला विधि या तथ्य के ऐसे सार्वजनिक महत्व के प्रश्न से जुड़ा हो जिस पर राष्ट्रपति की राय आवश्यक हो, तो उच्चतम न्यायालय के लिए यह अनिवार्य है कि वह उस पर अपनी राय राष्ट्रपति को संसूचित करे।
- 3. संविधान के अनुच्छेद 137 के प्रावधानों के तहत उच्चतम न्यायालय को अपने द्वारा सुनाए गए किसी निर्णय या आदेश का पुनरावलोकन (Review) करने की शक्ति प्राप्त है, और इसके अलावा 'अभिलेख न्यायालय' (Court of Record) होने के नाते उच्चतम न्यायालय को अपनी अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति भी प्राप्त है, जिसमें संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन छह मास तक का सादा कारावास या जुर्माना शामिल है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 131 के अनुसार उच्चतम न्यायालय का आरंभिक क्षेत्राधिकार केंद्र और राज्यों के बीच के विवादों तक विस्तृत है, परंतु इस पर कुछ अपवाद हैं, जैसे कि संविधान लागू होने से पहले की किसी संधि या करार से उत्पन्न विवाद (परंतु अपवादों के तहत अनुच्छेद 363 के अंतर्गत आने वाले मामले भी शामिल हैं)।
कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति द्वारा विधि या तथ्य के सार्वजनिक महत्व के प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय से परामर्श माँगे जाने पर, यदि मामला पूर्व-संवैधानिक संधि या समझौते से जुड़ा हो तो न्यायालय के लिए परामर्श देना 'विवेकशील' (Discretionary) है (अर्थात वह मना भी कर सकता है), जबकि अन्य मामलों में वह अपनी राय दे सकता है, किंतु राष्ट्रपति उस राय को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं।
कथन 3 सही है: अनुच्छेद 137 के तहत उच्चतम न्यायालय को अपने निर्णयों के पुनरावलोकन की शक्ति है और अनुच्छेद 129 के अनुसार वह एक 'अभिलेख न्यायालय' है जिसे अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति प्राप्त है।
अधिक जानकारी और विस्तृत अध्ययन के लिए विजिट करें: भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था.
कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति द्वारा विधि या तथ्य के सार्वजनिक महत्व के प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय से परामर्श माँगे जाने पर, यदि मामला पूर्व-संवैधानिक संधि या समझौते से जुड़ा हो तो न्यायालय के लिए परामर्श देना 'विवेकशील' (Discretionary) है (अर्थात वह मना भी कर सकता है), जबकि अन्य मामलों में वह अपनी राय दे सकता है, किंतु राष्ट्रपति उस राय को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं।
कथन 3 सही है: अनुच्छेद 137 के तहत उच्चतम न्यायालय को अपने निर्णयों के पुनरावलोकन की शक्ति है और अनुच्छेद 129 के अनुसार वह एक 'अभिलेख न्यायालय' है जिसे अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति प्राप्त है।
अधिक जानकारी और विस्तृत अध्ययन के लिए विजिट करें: भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था.
Related Questions
→
भारत के संविधान में 'राज्य के नीति निर्देशक तत्व' (DPSPs) किस अनुच्छेद से किस अनुच्छेद तक हैं?
→
भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की स्वतंत्रता, कार्यप्रणाली और चुनाव सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग एक स्थायी निकाय है, और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, किंतु 1993 के पश्चात से चुनाव आयोग द्वारा लिए जाने वाले निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं, जिसमें CEC और अन्य ECs के पास समान शक्तियां होती हैं।
2. निर्वाचन आयोग के सदस्यों की सेवा शर्तें और पदावधि राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती हैं, और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से हटाने की प्रक्रिया वही है जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की होती है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की लिखित सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा किसी भी परिस्थिति में नहीं हटाया जा सकता।
3. चुनाव सुधारों से संबंधित 'इंद्रजीत गुप्त समिति' (1998) ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए राज्य द्वारा वित्तीय सहायता (State Funding of Elections) के सिद्धांत का समर्थन किया था, बशर्ते यह सहायता केवल पंजीकृत राजनीतिक दलों को उनके चुनाव प्रदर्शन के आधार पर वस्तु के रूप में (in kind) दी जाए, न कि नगद रूप में।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद 'अंतर्राज्यीय परिषद' (Inter-State Council) के गठन से संबंधित है?
→
राज्य की कार्यपालिका के संदर्भ में राज्यपाल की शक्तियों, अध्यादेश प्रख्यापित करने की क्षमता और मुख्यमंत्री तथा मंत्रिपरिषद के संबंधों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 213 के अनुसार राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश की वही शक्ति और प्रभाव होता है जो राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किसी अधिनियम का होता है, किंतु राज्यपाल अपनी इस विधायी शक्ति का प्रयोग स्वतंत्र रूप से कर सकता है और इसके लिए राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह लेना अनिवार्य नहीं है।
2. राज्यपाल को संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत क्षमादान की शक्ति प्राप्त है, जिसके अंतर्गत वह किसी राज्य विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराए गए व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसका प्रहरण, विराम या परिहार कर सकता है, और मृत्युदंड के मामलों में भी उसकी यह शक्ति राष्ट्रपति के समान ही समवर्ती और व्यापक होती है।
3. अनुच्छेद 167 के अंतर्गत मुख्यमंत्री का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह राज्य के प्रशासन से संबंधित और विधानविषयक प्रस्तावों से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को संसूचित करे तथा राज्यपाल द्वारा माँगे जाने पर ऐसी सूचना प्रदान करे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
सर्वोच्च न्यायालय के मूल अधिकारिता (Original Jurisdiction) से संबंधित प्रावधान किस अनुच्छेद में है?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.