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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5-11) के अंतर्गत प्रदत्त नागरिकता के प्रावधानों और नागरिकता संशोधन अधिनियमों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 9 के अनुसार यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त (Termination) हो जाएगी, और यह नियम युद्ध काल या शांति काल दोनों ही परिस्थितियों में समान रूप से प्रभावी होता है।
- 2. नागरिकता अधिनियम, 1957 (मूल रूप से 1955) के अंतर्गत भारत में जन्म से (By Birth) नागरिकता प्राप्त करने के नियम में समय-समय पर संशोधन किए गए हैं, जिसके तहत 1 जुलाई 1987 के पश्चात भारत में जन्मे किसी भी व्यक्ति को अब स्वचालित रूप से भारत की नागरिकता प्राप्त हो जाती है, भले ही उसके माता-पिता में से कोई एक उस समय भारत का अवैध प्रवासी (Illegal Migrant) ही क्यों न हो।
- 3. संविधान का अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में विधि बनाने की संपूर्ण शक्ति प्रदान करता है, और संसद द्वारा इसी शक्ति का प्रयोग करते हुए नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 (CAA) पारित किया गया था, जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए छह विशिष्ट अल्पसंख्यकों को लक्षित करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 9 के अनुसार, यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी देश की नागरिकता ग्रहण कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है। कथन 2 गलत है: नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 1986 के अनुसार 1 जुलाई 1987 या उसके बाद भारत में जन्मे व्यक्ति को तभी भारत का नागरिक माना जाएगा जब उसके जन्म के समय उसके माता-पिता में से कम से कम एक भारत का नागरिक हो तथा दूसरा अवैध प्रवासी न हो। अतः अवैध प्रवासी माता-पिता की संतान को स्वचालित रूप से जन्म से नागरिकता नहीं मिलती। कथन 3 सही है: संविधान के अनुच्छेद 11 के तहत संसद को नागरिकता के अर्जन और समाप्ति से संबंधित विधि बनाने का अनन्य अधिकार प्राप्त है। इसी शक्ति के अंतर्गत संसद ने नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधन किए हैं। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था को पढ़ें।
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भारतीय संविधान के भाग III (मूल अधिकार) के अंतर्गत 'धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध' (अनुच्छेद 15) और 'लोक emplement के विषयों में अवसर की समता' (अनुच्छेद 16) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 15(5) के अनुसार, राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के वर्गों की उन्नति के लिए अथवा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए शैक्षणिक संस्थानों (अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को छोड़कर) में प्रवेश से संबंधित कोई विशेष उपबंध करने की शक्ति प्राप्त है, और यह उपबंध निजी शिक्षण संस्थानों पर भी लागू होता है।
2. अनुच्छेद 16(4) के तहत राज्य को किसी भी पिछड़े वर्ग के पक्ष में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने की शक्ति दी गई है, बशर्ते राज्य की राय में उस वर्ग का प्रतिनिधित्व राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, और यह आरक्षण का अधिकार न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय एक मौलिक अधिकार के रूप में नागरिकों को स्वतः प्राप्त होता है।
3. अनुच्छेद 16(5) के तहत यह उपबंध किया गया है कि किसी ऐसे विधि के संचालन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा जो यह उपबंध करती है कि किसी धार्मिक या साम्प्रदायिक संस्था के मामलों से संबंधित पदाधिकार या उसका कोई सदस्य किसी विशिष्ट धर्म को मानने वाला या संप्रदाय से संबंधित होना चाहिए।
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