BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

Indian Polity
1 views

भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और सदनों की कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 107 के अंतर्गत जब कोई विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित कर राष्ट्रपति की अनुमति के लिए प्रस्तुत किया जाता है, तो राष्ट्रपति यदि धन विधेयक नहीं है, तो वह विधेयक पर अपनी अनुमति रोक सकता है या उसे पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है, किंतु यदि दोनों सदन संशोधन सहित या रहित विधेयक को पुनः पारित कर देते हैं, तो राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति देने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य हो जाता है।
  2. 2. लोकसभा के विघटन के प्रभाव के संदर्भ में अनुच्छेद 107 यह प्रावधान करता है कि राज्यसभा में लंबित ऐसा विधेयक जिस पर लोकसभा ने विचार नहीं किया है, लोकसभा के विघटन पर व्यपगत (Lapse) नहीं होता है, और राष्ट्रपति द्वारा बुलाई जाने वाली दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) की स्थिति में भी यह विधेयक सुरक्षित रहता है।
  3. 3. अनुच्छेद 111 के अधीन राष्ट्रपति को 'जेता पॉकेट वीटो' (Pocket Veto) की शक्ति प्राप्त है, जिसका प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति किसी विधेयक पर न तो अनुमति देता है और न ही उसे पुनर्विचार के लिए वापस लौटाता है, और अनिश्चित काल के लिए अपने पास सुरक्षित रख लेता है, जिसका सबसे पहला और प्रसिद्ध प्रयोग वर्ष 1986 में राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह द्वारा 'भारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक' के संदर्भ में किया गया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और विध, विधेयकों की स्थिति तथा राष्ट्रपति की वीटो शक्तियों से संबंधित तीनों कथन पूर्णतः सत्य हैं। भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के अंतर्गत अनुच्छेद 107 और 111 संसद में विधियों के निर्माण और राष्ट्रपति की अनुमति की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हैं। कथन 1 के अनुसार, धन विधेयक को छोड़कर राष्ट्रपति साधारण विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है, लेकिन यदि सदन उसे दोबारा पारित कर दें तो राष्ट्रपति अनुमति देने के लिए बाध्य है। कथन 2 सही है क्योंकि राज्यसभा में लंबित विधेयक जो लोकसभा में पारित नहीं हुआ, लोकसभा के विघटन पर लैप्स नहीं होता। कथन 3 के अनुसार, राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह ने 1986 में पॉकेट वीटो का प्रयोग किया था।
Share:

Related Questions

संसद की लोक लेखा समिति (PAC) में लोकसभा से कितने सदस्य होते हैं? अनुच्छेद 50 किससे संबंधित है? भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य विधानमंडल (विधानसभा और विधान परिषद) के गठन, संरचना, और विधायी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 169 के अनुसार संसद किसी राज्य में विधान परिषद के सृजन या उत्सादन के लिए विधि बना सकती है, बशर्ते संबंधित राज्य की विधानसभा अपने कुल सदस्यों के बहुमत तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से इस आशय का संकल्प पारित कर दे, और ऐसा संकल्प पारित होने पर संसद के लिए उस राज्य में विधान परिषद का सृजन करना संवैधानिक रूप से अनिवार्य हो जाता है। 2. विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या उस राज्य की विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती है, किंतु किसी भी स्थिति में विधान परिषद में सदस्यों की न्यूनतम संख्या चालीस से कम नहीं होनी चाहिए (अपवाद स्वरूप जम्मू-कश्मीर का ऐतिहासिक संदर्भ)। 3. राज्य विधानसभा के विपरीत, विधान परिषद एक स्थायी सदन है जो कभी विघटित नहीं होता है, और इसके एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष की समाप्ति पर सेवानिवृत्त होते हैं, तथा विधान परिषद के सभापति और उपसभापति का निर्वाचन केवल परिषद के मनोनीत सदस्यों में से ही किया जाता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के प्रथम भाग के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) के प्रावधानों और उनकी संवैधानिक प्रक्रियाओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 2 के तहत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह विधि द्वारा ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना कर सकेगी, जबकि अनुच्छेद 3 संसद को किसी भी मौजूदा राज्य के क्षेत्रफल, सीमा या नाम में परिवर्तन करने की एकतरफा शक्ति प्रदान करता है। 2. अनुच्छेद 3 के अंतर्गत किसी नए राज्य के निर्माण या उसके क्षेत्र में परिवर्तन से संबंधित कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना संसद के किसी भी सदन में पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता है, तथा राष्ट्रपति के लिए यह अनिवार्य है कि वह ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसके विचार जानने के लिए भेजे, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा व्यक्त किया गया मत संसद के लिए किसी भी स्थिति में बाध्यकारी न हो। 3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'बेरुबारी यूनियन वाद' (1960) में दिए गए परामर्श के पश्चात, भारत के किसी भू-भाग को किसी अन्य देश को सौंपने (Cession of territory) के लिए अनुच्छेद 3 के तहत साधारण बहुमत से विधि बनाना पर्याप्त नहीं माना गया, बल्कि इसके लिए संविधान संशोधन अधिनियम (अनुच्छेद 368) की आवश्यकता को अनिवार्य कर दिया गया। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के अंतर्गत केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों, करों के अधिरोपण और अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) के प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 268 से 293 के बीच केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों का विस्तृत विवरण दिया गया है, जिसके तहत संसद को उन सभी करों पर कर लगाने की अनन्य शक्ति प्राप्त है जो संघ सूची में शामिल हैं, किंतु कुछ ऐसे कर भी हैं जिन्हें केंद्र लगाता और वसूलता है, लेकिन उनका पूरा आगम संबंधित राज्यों को ही सौंप दिया जाता है (जैसे अनुच्छेद 269 के अंतर्गत अंतर-राज्यीय व्यापार पर लगने वाले कर)। 2. संविधान के अनुच्छेद 263 के प्रावधानों के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा स्थापित अंतर-राज्यीय परिषद् का मुख्य कार्य राज्यों के बीच उत्पन्न विवादों की जाँच करना, उन पर बहस करना तथा ऐसे विषयों की जाँच करना जिनमें राज्यों के समान हित हों; किंतु अंतर-राज्यीय परिषद् द्वारा दी गई संस्तुतियाँ या निर्णय केंद्र सरकार या संबंधित राज्यों के लिए विधिक रूप से बाध्यकारी (Legally Binding) नहीं होते हैं, बल्कि वे केवल परामर्शकारी (Advisory) प्रकृति की होती हैं। 3. संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत गठित वित्त आयोग (Finance Commission) एक संवैधानिक निकाय है, जो केंद्र और राज्यों के बीच करों के शुद्ध आगमों के वितरण तथा राज्यों को समेकित निधि से सहायता अनुदान (Grants-in-Aid) देने वाले सिद्धांतों की सिफारिश राष्ट्रपति से करता है, और इस आयोग द्वारा दी गई सभी संस्तुतियाँ केंद्र सरकार के लिए मानना हमेशा अनिवार्य होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.