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Indian Polity
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भारत के राष्ट्रपति की विधाई, कार्यकारी और विशेष शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 85 के खंड (1) के अनुसार राष्ट्रपति समय-समय पर संसद के प्रत्येक सदन को ऐसे समय और स्थान पर जो वह ठीक समझे, सत्र के लिए आहूत करता है, किंतु यह अनिवार्य है कि संसद के दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए, और राष्ट्रपति को लोकसभा को विघटित करने की शक्ति भी इसी अनुच्छेद के तहत प्राप्त है।
- 2. संविधान के अनुच्छेद 123 के अंतर्गत प्रदत्त अध्यादेश प्रख्यापित करने की राष्ट्रपति की शक्ति स्वविवेक की शक्ति (Discretionary Power) है, जिसका अर्थ यह है कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना भी राष्ट्रीय हित में किसी भी समय अध्यादेश जारी कर सकते हैं, और इस अध्यादेश की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) किसी भी न्यायालय में नहीं की जा सकती है।
- 3. राष्ट्रपति को किसी भी ऐसे व्यक्ति को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश का निलंबन, परिहार या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है जिसे किसी ऐसे विषय से संबंधित विधि के विरुद्ध अपराध के लिए दंडित किया गया है जिस पर संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, किंतु मृत्युदंड के मामलों में क्षमादान की शक्ति केवल और केवल राज्यपाल के पास होती है, राष्ट्रपति के पास नहीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 85 के अनुसार राष्ट्रपति संसद के प्रत्येक सदन को सत्र के लिए आहूत करते हैं और दो सत्रों के बीच अधिकतम 6 महीने का अंतराल हो सकता है। साथ ही, राष्ट्रपति को लोकसभा भंग करने का अधिकार भी प्राप्त है। कथन 2 गलत है: राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति (अनुच्छेद 123) कोई स्वविवेक की शक्ति नहीं है, बल्कि वे इसका प्रयोग केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह (Aid and Advice) पर ही करते हैं। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट (जैसे 'एस.आर. बोम्मई वाद' और 'कृष्ण कुमार सिंह वाद') ने स्पष्ट किया है कि अध्यादेश निर्माण की शक्ति न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती है। कथन 3 गलत है: राष्ट्रपति को संघ सूची के विषयों और मृत्युदंड (Death Sentence) के मामलों में क्षमादान की विशेष शक्ति प्राप्त होती है, जबकि राज्यपाल को मृत्युदंड के मामलों में क्षमादान देने की शक्ति प्राप्त नहीं होती है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति के निर्वाचन, प्रधानमंत्री की नियुक्ति और केंद्रीय मंत्रिपरिषद की कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 66 के अनुसार उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सभी सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचकगण द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है, जिसमें संसद के मनोनीत सदस्य भी शामिल होते हैं, किंतु इसमें राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित या मनोनीत सदस्य किसी भी रूप में भाग नहीं लेते हैं।
2. संविधान के अनुच्छेद 75 के अंतर्गत प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर करता है, और मंत्रिपरिषद में कुल मंत्रियों की संख्या (प्रधानमंत्री सहित) लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती है, जिसे 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा जोड़ा गया था।
3. अनुच्छेद 78 के अनुसार प्रधानमंत्री का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह संघ के प्रशासन के संबंध में और मंत्रिपरिषद के निर्णयों से संबंधित प्रस्तावों के सभी मामलों की जानकारी राष्ट्रपति को दे, तथा यदि राष्ट्रपति ऐसी कोई अपेक्षा करे, तो वह किसी ऐसे विषय को जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर लिया है, किंतु मंत्रिपरिषद ने विचार नहीं किया है, परिषद के समक्ष विचार के लिए रखे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) और केंद्र-राज्य वित्तीय व प्रशासनिक संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 263 के तहत राष्ट्रपति को अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना करने की शक्ति प्राप्त है, और इस परिषद् का मुख्य कार्य राज्यों के बीच उत्पन्न विवादों की जाँच करना, ऐसे विषयों पर सलाह देना जिन पर राज्यों के सामान्य हित हों, तथा बेहतर नीतिगत समन्वय के लिए संस्तुतियां करना है, किंतु इसके द्वारा दिए गए निर्णय और परामर्श न्यायालय के डिक्री के समान बाध्यकारी होते हैं।
2. सरकारी आयोग (Sarkaria Commission, 1983-88) ने अपनी संस्तुति में यह सिफारिश की थी कि अंतर-राज्यीय परिषद् को एक स्थायी निकाय (Permanent Body) के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए, जिसे राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 263 के तहत औपचारिक रूप से वर्ष 1990 में गठित किया गया था।
3. अंतर-राज्यीय परिषद् की संरचना के अंतर्गत प्रधानमंत्री इस परिषद् के अध्यक्ष होते हैं, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और जिन केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभाएँ हैं उनके मुख्यमंत्री तथा बिना विधानसभा वाले संघ राज्य क्षेत्रों के प्रशासक इसके सदस्य होते हैं, इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिमंडल के कुछ कैबिनेट मंत्री भी इसके सदस्य के रूप में शामिल होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और विशेष उपकरणों (जैसे कि विभिन्न प्रस्तावों और कटौतियों) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 107 के अनुसार, धन विधेयक (Money Bill) के अतिरिक्त किसी भी अन्य साधारण विधेयक को संसद के किसी भी सदन में पुनः स्थापित किया जा सकता है, तथा यदि कोई साधारण विधेयक संसद के दोनों सदनों के बीच गतिरोध के कारण संयुक्त बैठक (Joint Sitting) में पारित किया जाता है, तो राष्ट्रपति द्वारा बुलाई गई इस संयुक्त बैठक की अध्यक्षता अनिवार्य रूप से लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है, और यदि वह अनुपस्थित हो तो लोकसभा का उपाध्यक्ष इसकी अध्यक्षता करता है।
2. बजट प्रक्रिया के दौरान अनुदानों की मांगों पर चर्चा के समय विपक्षी सदस्यों द्वारा 'नीतिगत कटौती प्रस्ताव' (Policy Cut Motion) प्रस्तुत किया जाता है, जिसका उद्देश्य मांग की राशि को घटाकर 1 रुपये करना होता है, और यह प्रस्ताव सरकार की नीतियों के प्रति पूर्ण असहमति को व्यक्त करता है, जबकि 'मितव्ययिता कटौती प्रस्ताव' (Economy Cut Motion) के तहत मांग की राशि में एक निश्चित विशिष्ट राशि की कटौती करने का प्रस्ताव किया जाता है।
3. 'ध्यानाकर्षण प्रस्ताव' (Calling Attention Motion) और 'अल्पकालिक चर्चा' (Short Duration Discussion) दोनों ही भारतीय संसदीय प्रक्रिया के अ-संवैधानिक और परंपरा-आधारित उपकरण हैं, जिनमें ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से किसी सदस्य द्वारा लोक-महत्व के अति-आवश्यक मामले पर मंत्री का ध्यान आकर्षित किया जाता है और इस पर कोई औपचारिक मतदान नहीं होता है, किंतु अल्पकालिक चर्चा के विपरीत ध्यानाकर्षण प्रस्ताव की पूर्व अनुमति राज्यसभा के सभापति या लोकसभा के अध्यक्ष से प्राप्त करना आवश्यक नहीं होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत राज्य पूरे भारत के राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा, और यह निर्देश उन विशिष्ट नीति निर्देशक तत्वों में शामिल है जिन्हें मूल संविधान में नहीं जोड़ा गया था, बल्कि बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा अंतःस्थापित किया गया था।
2. अनुच्छेद 45 में मूल रूप से यह प्रावधान था कि राज्य इस संविधान के प्रारंभ से दस वर्ष की अवधि के भीतर सभी बालकों के लिए चौदह वर्ष की आयु पूरी होने तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेगा, जिसे बाद में 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा संशोधित करके प्रारंभिक शिक्षा को अनुच्छेद 21क के तहत एक मौलिक अधिकार बना दिया गया।
3. अनुच्छेद 50 के अंतर्गत राज्य की लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक् करने के लिए राज्य कदम उठाएगा, और यह सिद्धांत शक्ति के पृथक्करण (Separation of Powers) के प्रशासनिक दर्शन पर आधारित है जो देश की शासन प्रणाली को अधिक पारदर्शी और स्वतंत्र बनाता है।
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भारतीय संविधान के निर्माण और संविधान सभा की समितियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान सभा के कुल सदस्यों में से ब्रिटिश प्रांतों के 293 प्रतिनिधि और देशी रियासतें के 93 प्रतिनिधि शामिल थे, तथा प्रत्येक प्रांत की सीटों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में तीन प्रमुख समुदायों- मुस्लिम, सिख और सामान्य (Muslim, Sikh and General) में विभाजित किया गया था।
2. संविधान के निर्माण के लिए संविधान सभा द्वारा कई समितियों का गठन किया गया था, जिनमें संघ संविधान समिति और प्रांतीय संविधान समिति दोनों के अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू थे।
3. प्रारूप समिति (Drafting Committee), जिसे संविधान का प्रारूप तैयार करने का सबसे महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया था, में अध्यक्ष सहित कुल 7 सदस्य थे और इसका गठन 29 अगस्त 1947 को किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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