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History of India
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह की प्रकृति और उसके वैचारिक स्वरूप के संबंध में प्रसिद्ध इतिहासकारों द्वारा दिए गए कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. सर जॉन सीले ने 1857 के विद्रोह को 'पूरी तरह से देशभक्तिहीन और स्वार्थी सिपाही विद्रोह' करार दिया था, जिसका समर्थन करते हुए सर जॉन लॉरेنس ने इसे केवल एक सैनिक असंतोष माना।
- 2. बेंजामिन डिजरायली ने ब्रिटिश संसद में इस घटना को केवल एक साधारण सिपाही विद्रोह न मानकर इसे सुनियोजित 'राष्ट्रीय विद्रोह' (National Revolt) की संज्ञा दी थी।
- 3. वी.डी. सावरकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में इस घटना को 'भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' (The First War of Indian Independence) के रूप में विश्लेषित किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
वर्ष 1857 के महान विद्रोह की प्रकृति को लेकर ब्रिटिश और भारतीय इतिहासकारों के विचारों में भारी मतभेद रहा है। ब्रिटिश इतिहासकार सर जॉन सीले और सर जॉन लॉरेنس ने इसे एक संकीर्ण और स्वार्थी 'सिपाही विद्रोह' बताया, जिसमें जनता का समर्थन नहीं था। इसके विपरीत, कंजर्वेटिव नेता बेंजामिन डिजरायली ने इसे केवल सिपाही विद्रोह न कहकर एक 'राष्ट्रीय विद्रोह' माना। वहीं भारतीय राष्ट्रवादी दृष्टिकोण के तहत विनायक दामोदर सावरकर (वी.डी. सावरकर) ने अपनी पुस्तक 'द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857' में इसे सुनियोजित ढंग से लड़ा गया 'भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' बताया। इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देखा जा सकता है।
Related Questions
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बंगाल विभाजन (1905) और इसके विरोध में प्रारंभ किए गए स्वदेशी आंदोलन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बंगाल विभाजन के निर्णय की आधिकारिक घोषणा 20 जुलाई 1905 को की गई थी, जिसके विरोध में 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल में ऐतिहासिक बैठक हुई और 'स्वदेशी आंदोलन' का औपचारिक प्रस्ताव पारित किया गया।
2. लार्ड कर्ज़न ने प्रशासनिक सुविधा का तर्क देते हुए इस विभाजन का प्रस्ताव रखा था, किंतु इसका वास्तविक उद्देश्य बंगाली राष्ट्रीय चेतना के प्रभाव को कमजोर करना और सांप्रदायिक आधार पर बंगाल को विभाजित करना था।
3. 16 अक्टूबर 1905 को जिस दिन बंगाल विभाजन प्रभावी हुआ, उस दिन को पूरे बंगाल में 'शोकागार दिवस' के रूप में मनाया गया, जहाँ लोगों ने उपवास रखा, एक-दूसरे के हाथों पर राखियाँ बांधी और 'बंदे मातरम' गीत गाते हुए जुलूस निकाले।
4. स्वदेशी आंदोलन के दौरान आर्थिक बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय चेतना जगाने के लिए 'राष्ट्रीय शिक्षा परिषद' (National Council of Education) की स्थापना की गई थी, जिसके पहले अध्यक्ष रास बिहारी घोष बनाए गए थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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मुगलकालीन प्रशासनिक व्यवस्था और मनसबदारी प्रथा के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अकबर द्वारा प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के लिए शुरू की गई 'मनसबदारी प्रणाली' मूल रूप से मंगolियाई सैन्य संगठन की 'दशमलव पद्धति' पर आधारित थी, जिसमें प्रत्येक मनसबदार को 'जात' और 'सवार' के पद प्रदान किए जाते थे जहाँ 'जात' उसके व्यक्तिगत वेतन और पद को तथा 'सवार' उसके द्वारा रखे जाने वाले गुड़सवारों की संख्या को दर्शाता था।
2. जहांगीर के शासनकाल में मनसबदारी व्यवस्था के अंतर्गत 'दुअस्पा-सिंहअस्पा' (Du-aspa Sih-aspa) प्रणाली की शुरुआत की गई, जिसके तहत मनसबदारों को अपने मूल सवार पदों को बढ़ाए बिना अतिरिक्त घोड़े रखने की अनुमति दी जाती थी और इसके लिए उन्हें अतिरिक्त वेतन भी दिया जाता था।
3. शाहजहां के शासनकाल में मनसबदारी व्यवस्था में 'माहवार' (Month-scale) प्रणाली लागू की गई, जिसके अंतर्गत यदि जागीर से प्राप्त होने वाली आय (खर्च) पूरे वर्ष के वेतन के बराबर होती थी, तो उसे छह महीने या उससे कम के अनुपात में समायोजित किया जाता था ताकि राजकोष पर वित्तीय बोझ को नियंत्रित किया जा सके।
4. औरंगजेब के शासनकाल के उत्तरार्ध में मनसबदारों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि होने के कारण 'जागीर संकट' (Crisis of Jagirdars) उत्पन्न हो गया, क्योंकि उपलब्ध जागीरें (पाइबाफी भूमि) कम पड़ गईं और मनसबदारों को वास्तविक जागीर आवंटन (बे-जागीर) मिलने में भारी विलंब होने लगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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अकबर के काल में "नशक" (Nasaq) प्रणाली का संबंध किससे था?
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मध्यकालीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में भक्ति और सूफी आंदोलनों की दार्शनिक प्रवृत्तियों, उनके संतों तथा उनकी साधना पद्धतियों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. दक्षिण भारत के प्रसिद्ध संत रामानुजाचार्य द्वारा प्रतिपादित 'विशिष्टाद्वैत' दर्शन के अनुसार जीव और जगत ब्रह्म से भिन्न होने के बावजूद ब्रह्म का ही अंश हैं, जबकि मध्वाचार्य द्वारा प्रतिपादित 'द्वैतवाद' जीव, जगत और ईश्वर को पूर्णतः पृथक एवं स्वतंत्र मानता है।
2. सूफी संत शेख शहाबुद्दीन सुहरवर्दी द्वारा स्थापित 'सुहरवर्दी सिलसिले' ने भारत में चिश्ती संप्रदाय के विपरीत कठोर वैराग्य, उपवास और भिक्षाटन के जीवन को पूर्णतः अपनाया तथा राजकीय सत्ता से पूर्ण अलगाव रखते हुए किसी भी प्रकार के जागीर या सरकारी अनुदान को लेने से स्पष्ट मना कर दिया था।
3. निर्गुण भक्ति धारा के महान संत कबीर ने जहाँ जाति व्यवस्था, बाह्य आडंबरों और मूर्तिपूजा का कड़ा विरोध किया, वहीं सूफी संत मलिक मुहम्मद जायसी ने अपनी रचना 'पद्मावत' में प्रेमाभ्री (प्रेममार्गी) शाखा के अंतर्गत सूफी रहस्यावाद को लोकभाषा अवधी के माध्यम से प्रस्तुत किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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जियाउद्दीन बरनी ने "तारीख-ए-फिरोजशाही" में किस काल का विवरण दिया है?
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