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History of India
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19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के संदर्भ में, सत्यशोधक समाज और प्रार्थना समाज के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. ज्योतिराव फुले द्वारा स्थापित 'सत्यशोधक समाज' (1873) का मुख्य उद्देश्य शूद्रों और अतिशूद्रों को बौद्धिक रूप से जाग्रत करना तथा ब्राह्मणवादी वर्चस्व एवं धार्मिक कर्मकांडों के पाखंड से उन्हें मुक्त कराना था।
  2. 2. आत्माराम पांडुरंग द्वारा वर्ष 1867 में स्थापित 'प्रार्थना समाज' ने महाराष्ट्र में धार्मिक सुधारों के साथ-साथ विधवा पुनर्विवाह, अंतर्जातीय विवाह, स्त्री शिक्षा और दलितोद्धार जैसे सामाजिक सुधारों पर विशेष बल दिया, किंतु इसकी विचारधारा आक्रामक रूप से रूढ़िवादी हिंदू धर्म के पूर्ण त्याग पर आधारित थी।
  3. 3. सत्यशोधक समाज ने अपनी वैचारिक स्थिति को स्पष्ट करने के लिए 'गुलामगिरी' जैसी कृतियों की रचना की, जिसमें अमेरिकी दास प्रथा के संदर्भ का उपयोग करते हुए भारतीय समाज में प्रचलित जातिगत उत्पीड़न की कड़ी आलोचना की गई थी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि ज्योतिराव फुले ने 24 सितंबर 1873 को 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की थी, जिसका उद्देश्य शूद्रों और अतिशूद्रों को ब्राह्मणों के धार्मिक और सामाजिक शोषण से मुक्त कराना तथा उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना था। कथन 2 गलत है क्योंकि प्रार्थना समाज ने हिंदू धर्म के भीतर रहकर ही सुधार लाने का प्रयास किया था, और इसने कभी भी आक्रामक रूप से हिंदू धर्म के पूर्ण त्याग की वकालत नहीं की, बल्कि यह महाराष्ट्र में धार्मिक और सामाजिक सुधारों का एक उदारवादी मंच था। कथन 3 सही है क्योंकि ज्योतिराव फुले द्वारा रचित 'गुलामगिरी' (1873) पुस्तक में अमेरिकी दासों की स्थिति की तुलना भारतीय समाज के शूद्रों और अतिशूद्रों की दयनीय स्थिति से की गई है। इस कालखंड के विस्तृत अध्ययन के लिए विकिपीडिया संदर्भ देखें।
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