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History of India
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वैदिक सभ्यता और वैदिक साहित्य के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. ऋग्वैदिक काल में लोहे के व्यापक ज्ञान (जिसे 'कृष्ण अयस' कहा गया है) के कारण कृषि अर्थव्यवस्था अत्यधिक उन्नत हो गई थी, जिसके फलस्वरूप स्थायी बस्तियों का तेजी से विकास हुआ।
  2. 2. उत्तर वैदिक काल में 'गोत्र' संस्था का प्रादुर्भाव हुआ, जिसका मूल अर्थ वह स्थान था जहाँ समूचे कुल का गोधन पाला जाता था, किंतु बाद में इसका संबंध एक ही मूल पुरुष से उत्पन्न लोगों के रक्त-संबंध से जुड़ गया।
  3. 3. ऋग्वैदिक काल में राजा की शक्ति पर नियंत्रण रखने के लिए 'सभा' और 'समिति' नामक संस्थाएँ सक्रिय थीं, जिनमें 'समिति' केंद्रीय राजनीतिक सभा थी जिसमें आम जनता (विश) भाग लेती थी और राजा के निर्वाचन में भी भूमिका निभाती थी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है क्योंकि ऋग्वैदिक काल के लोगों को लोहे ('कृष्ण अयस') का ज्ञान नहीं था; लोहे का व्यापक प्रयोग उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000 ईसा पूर्व के बाद) से प्रारंभ हुआ था, विशेषकर अतरंजीखेड़ा जैसे स्थलों से इसके साक्ष्य मिलते हैं। ऋग्वैदिक अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से पशुपालन पर आधारित थी। कथन 2 सही है; उत्तर वैदिक काल में 'गोत्र' व्यवस्था स्थापित हुई जिसका शाब्दिक अर्थ 'गोष्ठ' या वह स्थान था जहाँ कुल का गोधन रखा जाता था, जो आगे चलकर एक ही पूर्वज से जुड़े रक्त-संबंधी समूहों के रूप में मान्य हुआ। कथन 3 सही है; ऋग्वैदिक राजनीति में 'सभा' (वरिष्ठ व कुलीन लोगों की संस्था) और 'समिति' (आम जनता की केंद्रीय सभा) राजा की निरंकुशता पर अंकुश लगाती थीं और समिति राजा के चयन में भी भाग लेती थी। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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