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History of India
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मौर्य साम्राज्य की केंद्रीय प्रशासनिक व्यवस्था और राजस्व प्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में राज्य के 'सप्तांग सिद्धांत' का प्रतिपादन किया गया है, जिसके अनुसार 'स्वामी' (राजा) और 'अमात्य' (मंत्री/नागरिक अधिकारी) राज्य के शीर्ष अंग हैं, तथा केंद्रीय प्रशासन में 'समाहर्ता' समस्त आय का मुख्य संग्रहकर्ता और 'सन्निधातृ' राजकोष का मुख्य संरक्षक अधिकारी होता था।
  2. 2. मौर्य काल में राजकीय भूमि पर कार्य करने वाले किसानों को 'सीताकार' कहा जाता था, और इस भूमि से होने वाली आय को 'सीता' कहा जाता था, जिसका प्रबंधन 'सीताध्यक्ष' नामक अधिकारी द्वारा किया जाता था।
  3. 3. अशोक के लघु शिलालेखों और प्रमुख अभिलेखों में न्यायिक प्रशासन का विस्तृत विवरण मिलता है, जिसके अनुसार महामात्रों को प्रादेशिक नगरों में न्याय कार्य देखने का अधिकार था, और अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 26वें वर्ष में कैदियों की रिहाई और मृत्युदंड प्राप्त व्यक्तियों के लिए 3 दिन के स्थगन की 'जीवनदान' नामक व्यवस्था लागू की थी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

दिए गए सभी कथन मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था और अर्थव्यवस्था के संदर्भ में पूर्णतः सत्य हैं। कौटिल्य (चाणक्य) द्वारा रचित अर्थशास्त्र में राज्य के सप्तांग सिद्धांत का वर्णन मिलता है, जिसमें स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दण्ड और मित्र शामिल हैं। केंद्रीय राजस्व प्रशासन में 'समाहर्ता' कर निर्धारण और संग्रह के लिए उत्तरदायी था, जबकि 'सन्निधातृ' कोषाध्यक्ष था। मौर्य काल में कृषि योग्य राजकीय भूमि 'सीता' कहलाती थी और इसके अध्यक्ष को 'सीताध्यक्ष' कहा जाता था। अशोक के स्तंभ एवं शिलालेखों (विशेषकर चतुर्थ स्तंभ लेख) से उसके न्यायिक सुधारों और 'जीवनदान' (कैदियों के लिए क्षदान/स्थगन) की नीति का स्पष्ट प्रमाण मिलता है।
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