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History of India
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उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के वैचारिक आधार, संस्थागत विकास और उनके सुधारवादी एजेंडे के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. राजा राममोहन राय द्वारा 1815 में स्थापित 'आत्मीय सभा' और 1828 में स्थापित 'ब्रह्म समाज' का मूल उद्देश्य मूर्तिपूजा, बहुदेववाद और पुरोहितवाद का खंडन करते हुए एकेश्वरवाद की स्थापना करना था, तथा केशव चंद्र सेन के वैचारिक मतभेदों के कारण वर्ष 1866 में ब्रह्म समाज का विभाजन 'आदि ब्रह्म समाज' और 'भारतीय ब्रह्म समाज' के रूप में हो गया था।
- 2. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा 1875 में स्थापित 'आर्य समाज' ने 'वेदों की ओर लौटो' का नारा देते हुए वेदों को अपौरुषेय और अचूक माना, तथा रूढ़िवादी हिंदू समाज की रक्षा के लिए 'शुद्धि आंदोलन' का प्रारंभ किया, जिसका उद्देश्य उन हिंदुओं को पुनः हिंदू धर्म में वापस लाना था जिन्होंने किन्हीं कारणों से इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लिया था।
- 3. महाराष्ट्र में प्रार्थना समाज (स्थापना 1867) के संस्थापकों (जैसे आत्माराम पांडुरंग और महादेव गोविंद रानाडे) ने जातिगत कठोरता, बाल विवाह और अछूत प्रथा का कड़ा विरोध करते हुए विधवा पुनर्विवाह और महिला शिक्षा को बढ़ावा दिया, किंतु धार्मिक रूढ़िवादिता के कारण उन्होंने अपनी सामाजिक सुधार गतिविधियों को केवल दक्षिण भारत तक ही सीमित रखा और वे उत्तर भारतीय आंदोलनों से पूरी तरह पृथक् रहे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 और 2 पूर्णतः सत्य हैं। राजा राममोहन राय ने 1815 में आत्मीय सभा और 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की थी, जिसका उद्देश्य हिंदू धर्म की कुप्रथाओं का सुधार और एकेश्वरवाद का प्रचार करना था। केशव चंद्र सेन और देवेन्द्रनाथ टैगोर के बीच मतभेदों के कारण 1866 में ब्रह्म समाज का विभाजन हो गया था। दयानंद सरस्वती ने 1875 में आर्य समाज की स्थापना कर 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया और शुद्धि आंदोलन चलाया। कथन 3 असत्य है क्योंकि महादेव गोविंद रानाडे और प्रार्थना समाज के नेताओं का प्रभाव और कार्यक्षेत्र मुख्य रूप से पश्चिमी और दक्षिण भारत के साथ-साथ अखिल भारतीय स्तर पर सामाजिक सुधारों (जैसे दक्कन एजुकेशन सोसाइटी) से जुड़ा था, और उनका प्रभाव उत्तर भारत के सुधार आंदोलनों से भी परस्पर जुड़ा हुआ था। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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वर्ष 1857 के विद्रोह के तात्कालिक कारणों और चर्बी वाले कारतूस की घटना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ब्रिटिश सेना में पुरानी 'ब्राउन बेस' मस्कट बंदूक के स्थान पर शामिल की गई नई 'एनफील्ड राइफल' के कारतूस के आवरण को लोड करने से पहले दांतों से काटना पड़ता था, जिसमें गाय और सुअर की चर्बी होने की अफवाह ने भारतीय सैनिकों में भारी आक्रोश पैदा किया था।
2. 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री (34th Bengal Native Infantry) के सिपाही मंगल पांडे ने 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी में इस नई राइफल के कारतूसों के प्रयोग का पुरजोर विरोध करते हुए अपने वरिष्ठ अधिकारियों (लेफ्टिनेंट बॉग और सार्जेंट ह्यूसन) पर आक्रमण कर दिया था।
3. मंगल पांडे की इस बगावत के तुरंत बाद बैरकपुर छावनी में पूरी रेजीमेंट ने एक साथ विद्रोह कर दिया और ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ दिल्ली की ओर कूच कर दिया था।
4. इस घटना के उपरांत मंगल पांडे को गिरफ्तार कर लिया गया और सैन्य अदालत द्वारा मुकदमा चलाए जाने के पश्चात 8 अप्रैल 1857 को उन्हें फांसी दे दी गई थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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बौद्ध धर्म के दार्शनिक और संस्थागत विकास के संदर्भ में, 'सौत्रान्तिक' तथा 'वैभाषिक' संप्रदायों की मान्यताओं और उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 'वैभाषिक' संप्रదాయ के आचार्य बाह्य वस्तुओं के अस्तित्व को प्रत्यक्ष मानते हैं (प्रत्यक्षवादी), जबकि 'सौत्रान्तिक' संप्रदाय बाह्य वस्तुओं के अस्तित्व को केवल अनुमानगम्य (अनुमानवादी) मानता है।
2. महायान बौद्ध धर्म के अंतर्गत 'शून्यवाद' (माध्यमिक दर्शन) के प्रवर्तक आचार्य नागार्जुन थे, जिन्होंने प्रतीत्यसमुत्पाद को ही शून्यता का पर्याय माना है, जिसका अर्थ है कि सभी धर्म स्वसंभाव से रहित हैं।
3. बौद्ध धर्म के इतिहास में 'सर्वास्तिवाद' संप्रదాయ से ही वैभाषिक और सौत्रान्तिक दोनों उप-संप्रदाय विकसित हुए थे, जो सभी कालों (भूत, भविष्य और वर्तमान) में धर्मों के वास्तविक अस्तित्व में विश्वास करते थे।
4. तृतीय बौद्ध संगीति के उपरांत अशोक के काल में बौद्ध संघ में जो गंभीर मतभेद उत्पन्न हुए थे, उनके परिणामस्वरूप थेइवादियों (स्थविरवादियों) ने महायान मत की स्थापना की थी, जिसने आगे चलकर हीनयान को पूरी तरह समाप्त कर दिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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राजधानी परिवर्तन का मुख्य कारण इतिहासकारों ने क्या माना है?
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19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में स्थापित 'प्रार्थना समाज' और इसके संस्थापकों की कार्यप्रणाली के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. प्रार्थना समाज की स्थापना वर्ष 1867 में बंबई में आत्माराम पांडुरंग द्वारा केशव चंद्र सेन की प्रेरणा से की गई थी, और इसका मुख्य उद्देश्य अंतर-जातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह को बढ़ावा देना तथा महिला शिक्षा का प्रसार करना था।
2. महादेव गोविंद रानाडे इस समाज के सबसे प्रमुख नेता बने, जिन्होंने सामाजिक सुधारों को धार्मिक सुधारों से अधिक प्राथमिकता दी और समाज सुधार के लिए 'डेक्कन एजुकेशन सोसायटी' जैसी संस्थाओं के माध्यम से बौद्धिक आधार तैयार किया।
3. प्रार्थना समाज के संस्थापकों ने अपनी सामाजिक-सुधार की बैठकों में रूढ़िवादी हिंदू परंपराओं की अत्यधिक आलोचना की और मूर्तिपूजा, बहुदेववाद तथा जाति व्यवस्था का समर्थन करते हुए पूर्ण रूप से सनातन धर्म के सिद्धांतों को अपनाया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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छठी शताब्दी ईसा पूर्व के 'सोलह महाजनपदों' और मगध साम्राज्य के आरंभिक उत्कर्ष के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बौद्ध ग्रंथ 'अंगुत्तर निकाय' और जैन ग्रंथ 'भगवती सूत्र' में षोडश महाजनपदों की स्पष्ट सूची मिलती है, जिनमें अंग, मगध, काशी और कौशल पूर्वी भारत के सबसे प्रमुख महाजनपद थे।
2. मगध साम्राज्य की प्रारंभिक राजधानी राजगीर (गिरिव्रज) थी, जो पाँच पहाड़ियों से घिरी होने के कारण प्राकृतिक रूप से अत्यंत सुरक्षित थी और इसके उत्थान में यहाँ के प्रचुर मात्रा में उपलब्ध लौह भंडारों ने सामरिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
3. हर्यक वंश के संस्थापक बिम्बिसार ने अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए आक्रामक विजय और वैवाहिक संबंधों की नीति अपनाई, जिसके तहत उसने मल्ल, वज्जी और चेदि राजवंशों की राजकुमारियों के साथ सीधे विवाह कर अपनी स्थिति अत्यंत मजबूत की थी।
4. मगध के शासक अजातशत्रु ने अपने पिता बिम्बिसार की हत्या कर सत्ता प्राप्त की थी, तथा उसी के शासनकाल में वज्जी संघ के साथ लंबे संघर्ष के दौरान वैशाली को पराजित करने के लिए युद्ध में 'रथमूसल' और 'महाशिलाकंटक' जैसे उन्नत नवीन हथियारों का प्रयोग किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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