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History of India
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भक्ति आंदोलन और सूफी सिलसिले के दार्शनिक विकास तथा उनके प्रमुख संतों के वैचारिक योगदान के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. दक्षिण भारत में वैष्णव संत रामानुजाचार्य ने 'विशिष्टाद्वैत' दर्शन का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार जीव और जगत ब्रह्म से भिन्न भी हैं और अभिन्न भी हैं, तथा मोक्ष का मार्ग केवल ज्ञान मार्ग न होकर 'प्रपत्ति' (पूर्ण आत्मसमर्पण) और भक्ति पर आधारित है।
- 2. उत्तर भारत में भक्ति को लोकप्रिय बनाने वाले रामानंद ने जातिगत बंधनों को नकारते हुए समाज के सभी वर्गों के लिए द्वार खोल दिए, और उनके शिष्यों में रैदास (जूता बनाने वाले), सेना (नाई) तथा कबीर (जुलाहा) जैसे विभिन्न जातियों और व्यवसायों के लोग शामिल थे।
- 3. सूफी मत के 'सुहर्वादी सिलसिले' ने चिश्ती सिलसिले के विपरीत राजकीय संरक्षण को अस्वीकार कर दिया और भिक्षा मांगने तथा संगीत (समां) पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया, जबकि निजामुद्दीन औलिया चिश्ती सिलसिले के सबसे प्रमुख संतों में से एक थे जिनके दरबार में कई सुल्तानों ने हाजिरी दी थी किंतु उन्होंने कभी सुल्तान का दरबार स्वीकार नहीं किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत वेदांत का प्रतिपादन किया, जिसमें जीव, जगत और ब्रह्म की वास्तविक सत्ता को स्वीकार करते हुए भक्ति और प्रपत्ति को मोक्ष का साधन बताया गया है। कथन 2 सही है क्योंकि रामानंद ने भक्ति आंदोलन को उत्तर भारत में प्रसारित किया और जाति-पाति के भेदभाव को दरकिनार करते हुए विभिन्न पृष्ठफ़ूमियों के लोगों को अपना शिष्य बनाया। कथन 3 गलत है क्योंकि सुहर्वादी सिलसिले ने चिश्ती सिलसिले के विपरीत राजकीय संरक्षण, जागीर और धन स्वीकार किया था, जबकि चिश्ती संतों ने शाही अनुदानों को ठुकराया और 'समां' (संगीत गोष्ठियों) को अपनाया था। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Related Questions
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1857 के महान विद्रोह के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजनीतिक कारणों के अंतर्गत लॉर्ड डलहौजी की 'व्यपगत सिद्धांत' (Doctrine of Lapse) नीति ने सतारा, नागपुर और झाँसी जैसी रियासत्यों के साथ-साथ अवध के अधिग्रहण को भी प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया, क्योंकि अवध का विलय कुशासन के आरोप में किया गया था जिससे वहाँ के सैनिकों और पारंपरिक अभिजात वर्ग में गहरा असंतोष फैल गया।
2. सामाजिक और धार्मिक कारणों में वर्ष 1850 में पारित 'धार्मिक अशक्तता अधिनियम' (Religious Disabilities Act) ने ईसाई धर्म अपनाने वाले व्यक्ति को पैतृक संपत्ति से वंचित करने के पुराने हिंदू कानून को बदल दिया, जिससे रूढ़िवादी भारतीयों में यह आशंका उत्पन्न हो गई कि ब्रिटिश सरकार जानबूझकर उनका धर्म परिवर्तन कराना चाहती है।
3. आर्थिक कारणों के तहत ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों और उद्योगों के वि-औद्योगीकरण (De-industrialisation) ने पारंपरिक हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योगों को पूरी तरह तबाह कर दिया, तथा किसानों पर अत्यधिक करों के बोझ ने उन्हें महाजनों के शिकंजे में फँसा दिया, जिससे समाज का हर वर्ग त्रस्त था।
4. सैन्य कारणों में वर्ष 1856 में लॉर्ड कैनिंग द्वारा पारित 'सामान्य सेवा enlistment अधिनियम' (General Service Enlistment Act) ने भारतीय सिपाहियों के लिए समुद्र पार (काला पानी) जाकर सेवा करना अनिवार्य कर दिया, जिसे तत्कालीन पारंपरिक समाज में जाति और धर्मभ्रष्ट होने का प्रतीक माना गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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दिल्ली सल्तनत के प्रशासनिक, आर्थिक और सैन्य सुधारों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अलाउद्दीन खिलजी ने सल्तनत काल में पहली बार समस्त कृषि योग्य भूमि की पैमाइश करवाकर भू-राजस्व को बढ़ाकर उपज का आधा (50%) भाग कर दिया था और बिचौलियों (खूत्, मुकद्दम और चौधरी) के विशेषाधिकारों को समाप्त कर उन पर सामान्य कृषकों की तरह कर आरोपित किए थे।
2. मुहम्मद बिन तुगलक ने दोआब क्षेत्र में कर वृद्धि के कुप्रभावों से निपटने और कृषि को पुनर्जीवित करने के लिए 'दीवान-ए-कोही' नामक एक नया कृषि विभाग स्थापित किया था, जिसके तहत किसानों को 'सोंधार' (कृषि ऋण) प्रदान किए गए थे।
3. फिरोजशाह तुगलक ने सल्तनत काल में सिंचाई व्यवस्था को उन्नत करने के लिए नहरों का एक विस्तृत जाल बिछाया, जिसमें यमुना से हिसार तक जाने वाली 'उलूग खानी' और सतलज से घग्गर तक जाने वाली नहरें शामिल थीं, और उसने किसानों से इन नहरों के उपयोग के बदले 'हक-ए-शर्ब' (सिंचाई कर) वसूल किया जो कुल उपज का 1/10 भाग था।
4. लोदी वंश के संस्थापक बहलोल लोदी ने सल्तनत की शक्ति को पुनर्गठन करने के लिए केंद्रीय राजतंत्र को अत्यधिक शक्तिशाली बनाया और सुल्तान के पद की गरिमा को सर्वोपरि रखते हुए अफगान सरदारों के साथ 'मस्नद-ए-आली' की सामंती समानता की नीति को पूर्णतः समाप्त कर दिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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मध्यकालीन भारत के इतिहास में 'भक्ति और सूफी आंदोलन' के विभिन्न पहलुओं, उनकी दार्शनिक मान्यताओं तथा सिलसिलों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. दक्षिण भारत के आलवार (वैष्णव संत) और नयनार (शैव संत) संतों ने तमिल भाषा के माध्यम से भक्ति का प्रसार किया और तत्कालीन समाज में प्रचलित जातिगत भेदभाव का कड़ा विरोध करते हुए स्त्री संतों (जैसे आंडाल और करैक्कालअम्मैयार) को भी अपने आंदोलन में सम्मिलित किया।
2. चिश्ती सिलसिले के प्रसिद्ध सूफी संत निजामुद्दीन औलिया ने योग क्रियाओं और संगीत (समां) को अपने आध्यात्मिक साधना का मुख्य अंग बनाया था, तथा उनके उदार दृष्टिकोण के कारण समकालीन लोगों द्वारा उन्हें 'महबूब-ए-इलाही' (ईश्वर के प्रिय) की उपाधि से सम्मानित किया गया था।
3. सूफी संतों के शुरुआती दौर में 'बा-शरा' (इस्लामी शरीयत कानूनों के नियमों का पालन करने वाले) और 'बे-शरा' (शरीयत के बंधन से मुक्त, जिन्हें 'कलंदर' या मस्त फकीर भी कहा जाता था) नामक दो प्रमुख धाराएं विकसित हुई थीं, जिनमें चिश्ती और सुहरावर्दी दोनों सिलसिले 'बे-शरा' श्रेणी के अंतर्गत आते थे।
4. भक्ति संत कबीर दास और रामानंद ने निर्गुण और सगुण दोनों धाराओं का समन्वय करते हुए रूढ़िवादी ब्राह्मणवाद और बाह्य आडंबरों (जैसे मूर्तिपूजा और तीर्थयात्रा) का खंडन किया, तथा कबीर के उपदेश उनके शिष्यों द्वारा 'बीजक' नामक ग्रंथ में संकलित किए गए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) और इसके क्रांतिकारी कार्यक्रमों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वर्ष 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HRA) का पुनर्गठन करके 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) की स्थापना की गई थी, जिसमें समाजवाद को संगठन का आधिकारिक उद्देश्य बनाया गया।
2. HSRA के सदस्यों ने सांडर्स हत्याकांड (लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए) और 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय विधान सभा (Central Legislative Assembly) में बम फेंकने जैसी सनसनीखेज घटनाओं को अंजाम दिया, जिसमें भगत सिंह के साथ बटुकेश्वर दत्त भी शामिल थे।
3. वर्ष 1930 में लाहौर षड्यंत्र केस के निर्णय के पश्चात भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई, जबकि चंद्रशेखर आजाद को फरवरी 1931 में इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश पुलिस के साथ हुई एक मुठभेड़ में गिरफ्तार कर लिया गया था और बाद में उन्हें फांसी की सजा दी गई थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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प्राचीन भारतीय इतिहास में बौद्ध धर्म और जैन धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों तथा उनके संप्रदायों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बौद्ध धर्म का 'प्रतीतसमुत्पाद' (Dependent Origination) का सिद्धांत यह बताता है कि संसार की प्रत्येक वस्तु और घटना किसी न किसी कारण से उत्पन्न होती है और यह सम्पूर्ण जगत क्षणिक, अनात्मवादी तथा निरंतर परिवर्तनशील है।
2. जैन धर्म के 'स्यादवाद' या 'अनेकांतवाद' के अनुसार सत्य के बहुआयामी दृष्टिकोण होते हैं, और चूँकि मानव ज्ञान सापेक्ष होता है, इसलिए किसी भी वस्तु के पूर्ण सत्य को 'स्यात्' (शायद/किसी दृष्टिकोण से) शब्द के माध्यम से ही समझा जा सकता है।
3. महायान बौद्ध संप्रदाय के अंतर्गत 'बोधिसत्त्व' की अवधारणा का विकास हुआ, जिसके अनुसार बोधिसत्त्व वे पुण्यात्मा व्यक्ति हैं जो स्वयं अपना निर्वाण प्राप्त करने के बाद भी अन्य सभी sentient beings (प्राणियों) के उद्धार और कल्याण के लिए संसार में ही बने रहते हैं।
4. जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के विपरीत दिगंबर संप्रदाय इस मान्यता का पूर्ण समर्थन करता है कि स्त्रियाँ अपने इसी शरीर के साथ कठोर साधना और मोक्ष मार्ग का पालन करके सर्वोच्च आध्यात्मिक मुक्ति (कैवल्य/मोक्ष) प्राप्त कर सकती हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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