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History of India
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भक्ति आंदोलन और सूफी सिलसिले के दार्शनिक विकास, उनके प्रमुख संतों तथा उनके संप्रदायों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. दक्षिण भारत के वैष्णव संत निम्बार्काचार्य ने 'द्वैताद्वैतवाद' (भेदाभेदवाद) दर्शन का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार जीव, जगत और ब्रह्म न तो पूरी तरह भिन्न हैं और न ही पूरी तरह अभिन्न हैं, बल्कि वे एक साथ भिन्न और अभिन्न दोनों हैं।
  2. 2. उत्तर भारत में चिश्ती सिलसिले के महान संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने अजमेर को अपना केंद्र बनाया, जहाँ उनके प्रमुख आध्यात्मिक उत्तराधिकारी शेख निजामुद्दीन औलिया हुए, जिन्होंने अपने जीवनकाल में दिल्ली के सात सुल्तानों का शासन देखा किंतु कभी भी किसी सुल्तान के दरबार में नहीं गए।
  3. 3. सूफी मत के 'सुहर्वादी सिलसिले' ने चिश्ती सिलसिले के विपरीत राजकीय संरक्षण और वित्तीय अनुदान को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया, तथा भिक्षा मांगने और संगीत (समां) पर पूर्ण प्रतिबंध लगाते हुए अत्यंत कठोर तपस्या का मार्ग अपनाया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि दक्षिण भारत के संत निम्बार्काचार्य ने 'द्वैताद्वैतवाद' या 'भेदाभेदवाद' का प्रतिपादन किया था। कथन 2 आंशिक रूप से गलत है; ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी अजमेर में शेख कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी और दिल्ली में शेख निजामुद्दीन औलिया थे, किंतु शेख निजामुद्दीन औलिया ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के सीधे उत्तराधिकारी नहीं बल्कि बाबा फरीद के शिष्य थे (और चिश्ती परंपरा में मोइनुद्दीन चिश्ती मुख्य संस्थापक थे)। हालांकि निजामुद्दीन औलिया ने सात सुल्तानों का शासन देखा और दरबार में नहीं गए, यह कथन 2 में वंशावली के संदर्भ में तथ्यात्मक त्रुटि पैदा करता है (निजामुद्दीन औलिया मोइनुद्दीन के सीधे उत्तराधिकारी नहीं थे)। कथन 3 बिल्कुल गलत है क्योंकि सूहर्वादी सिलसिले ने राजकीय संरक्षण और जागीर/धन को स्वीकार किया था, जबकि चिश्ती सिलसिले ने राजकीय संरक्षण को अस्वीकार किया था और संगीत (समां) को अपनाया था। सूहर्वादियों ने राजकीय धन लेने से परहेज नहीं किया। इस विषय की विस्तृत जानकारी के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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