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History of India
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वैदिक साहित्य और समाज के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. ऋग्वैदिक काल में 'गोत्र' शब्द का मूल अर्थ 'गोष्ठ' या वह स्थान था जहाँ कुल विशेष का मवेशी पाला जाता था, और इस काल में वर्ण व्यवस्था मुख्य रूप से जन्म पर आधारित न होकर कर्म और व्यवसाय पर आधारित थी।
  2. 2. उत्तर वैदिक काल में आते-आते यज्ञों का अनुष्ठान अत्यंत जटिल हो गया और ब्राह्मण ग्रंथों में 'पुरोहित' वर्ग का वर्चस्व स्थापित हो गया, जहाँ राजसूय और वाजपेय जैसे बड़े यज्ञ राजा के राजनीतिक अधिकार और संप्रभुता को सुदृढ़ करने के लिए किए जाते थे।
  3. 3. उपनिषद काल तक पहुँचते-पहुंचते भौतिकवादी कर्मकांडों और यज्ञीय संस्कृति के विरुद्ध वैचारिक प्रतिक्रिया स्वरूप 'आण्विक दर्शन' और 'श्रमण परंपरा' का बीजारोपण हुआ, तथा उपनिषदों में आत्मा (आत्मन्) और ब्रह्मांड (ब्रह्मन्) की एकता पर बल दिया गया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

दिए गए तीनों कथन वैदिक सभ्यता एवं साहित्य के संदर्भ में पूर्णतः सत्य हैं। ऋग्वैदिक काल में 'गोत्र' का अर्थ गोष्ठ या मवेशियों का बाड़ा था और वर्ण व्यवस्था लचीली थी जो कर्म पर आधारित थी। उत्तर वैदिक काल में यज्ञों की जटिलता बढ़ी और राजसूय, वाजपेय तथा अश्वमेध जैसे महायज्ञ राजा की संप्रभुता के प्रतीक बने। उपनिषदों ने कर्मकांडों के स्थान पर ज्ञान, मोक्ष, आत्मा और ब्रह्म के दार्शनिक स्वरूप को स्थापित किया। इस काल और साहित्य के विस्तृत अध्ययन के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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