BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

History of India
1 views

ब्रिटिश भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों — स्थाई बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी — के आर्थिक प्रभावों और उनकी प्रशासनिक विशेषताओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. स्थाई बंदोबस्त (Permanent Settlement) के तहत जमींदारों को भूमि का स्थायी स्वामी मान लिया गया था, जिससे किसानों की स्थिति पट्टेदार या किराएदार बनकर रह गई और कृषि में कोई दीर्घकालिक पूंजी निवेश नहीं हुआ, जिसे 'कृषि का वाणिज्यीकरण' कहा जाता है।
  2. 2. थॉमस मुनरो द्वारा मुख्य रूप से मद्रास प्रेसीडेंसी में लागू की गई रयतवारी व्यवस्था (Ryotwari System) में ब्रिटिश सरकार और व्यक्तिगत किसानों (रयतों) के मध्य सीधा संबंध था, किंतु अत्यधिक उच्च लगान दरों और अकाल या सूखे के समय भी राजस्व की कठोर वसूली के कारण किसान भारी ऋणजाल (Debt trap) में फंस गए थे।
  3. 3. महालवारी व्यवस्था (Mahalwari System) के अंतर्गत भू-राजस्व निर्धारण और भुगतान की इकाई व्यक्तिगत किसान न होकर संपूर्ण गाँव या महलों (ग्राम समूह) होता था, जहाँ पूरा ग्रामीण समुदाय सामूहिक रूप से राजस्व अदायगी के लिए उत्तरदायी था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है क्योंकि स्थाई बंदोबस्त के कारण कृषि में ठहराव और बर्बादी आई थी, न कि कृषि का वाणिज्यीकरण। कृषि का वाणिज्यीकरण (Commercialization of Agriculture) मुख्यतः बाद के दशकों में नकदी फसलों के जबरन उत्पादन और बाजार के दबाव से जुड़ा था। कथन 2 और 3 पूर्णतः सही हैं; रयतवारी व्यवस्था में सरकार और रयतों के बीच सीधा समझौता हुआ था लेकिन अत्यधिक लगान ने किसानों को साहूकारों के चंगुल में फंसा दिया, जबकि महालवारी व्यवस्था में संपूर्ण गाँव (महाल) को राजस्व भुगतान की इकाई बनाया गया था। अधिक जानकारी के लिए देखें विकिपीडिया संदर्भ
Share:

Related Questions

गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था, प्रशासनिक संरचना और भूमि अनुदान व्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. गुप्त काल में 'अग्रहार' भूमि वह भूमि होती थी जो मंदिरों और ब्राह्मणों को कर-मुक्त रूप से दान दी जाती थी, जिस पर स्थानीय प्रशासकों का कोई हस्तक्षेप नहीं होता था। 2. गुप्त सम्राटों द्वारा जारी किए गए स्वर्ण सिक्के (जिसे 'दीनार' कहा जाता था) कुषाणों के स्वर्ण सिक्कों की तुलना में अधिक शुद्धता और कलात्मक सुंदरता प्रदर्शित करते थे, विशेष रूप से कुमारगुप्त प्रथम के मयूर प्रकार के सिक्के। 3. इस काल में व्यापारिक गतिविधियों में गिरावट आने के कारण श्रेणी (Guilds) व्यवस्था पूरी तरह समाप्त हो गई थी और मुद्रा अर्थव्यवस्था का स्थान पूर्णतः वस्तु-विनिमय प्रणाली (Barter System) ने ले लिया था। 4. गुप्त प्रशासन में प्रांत को 'भुक्ति' कहा जाता था, जिसके प्रमुख को 'उपरिक' कहा जाता था, तथा भुक्तियों का विभाजन 'विषय' (जिला) में होता था, जिसके प्रशासनिक अधिकारी को 'विषयपति' कहा जाता था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? बौद्ध धर्म और जैन धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों तथा उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. बौद्ध धर्म के 'प्रतीत्यसमुत्पाद' (कारण-कार्य सिद्धांत) के अनुसार संसार की प्रत्येक वस्तु किसी न किसी कारण से उत्पन्न हुई है और यह शून्यवाद के अत्यधिक निकट है, जबकि जैन धर्म का 'स्यादवाद' (अनेकांतवाद) यह प्रतिपादित करता है कि ज्ञान सापेक्ष होता है और किसी भी वस्तु के सत्य का पूर्ण निर्धारण एकांगी दृष्टिकोण से नहीं किया जा सकता। 2. बौद्ध संघ में प्रविष्ट होने के लिए 'प्रव्रज्या' संस्कार अनिवार्य था, जिसके उपरांत नवदीक्षित भिक्षु को दस शिक्षापदों का पालन करना होता था, जबकि जैन संघ में महावीर स्वामी ने गृहस्थ जीवन त्यागने वाले व्यक्तियों के लिए संलेखना (संतारा) विधि के अलावा पांच महाव्रतों का कठोरता से पालन करना अनिवार्य किया था। 3. बौद्ध धर्म के हीनयान संप्रदाय ने बुद्ध को भगवान मानकर उनकी मूर्तियों की पूजा शुरू की और बोधगया में महाबोधि मंदिर का निर्माण कराया, जबकि महायान संप्रदाय बुद्ध को एक महापुरुष और मार्गदर्शक मानकर उनके मूल उपदेशों (अष्टम मार्ग) पर टिके रहने का समर्थन करता रहा। 4. जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के अनुयायी मोक्ष प्राप्ति के लिए नग्न रहने (वस्त्र त्यागने) को अनिवार्य मानते हैं, जबकि दिगंबर संप्रदाय के अनुयायी श्वेत वस्त्र धारण करने की अनुमति देते हैं और स्त्री मुक्ति को संभव मानते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? मुगलकालीन प्रशासनिक व्यवस्था और राजस्व सुधारों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राजा टोडरमल द्वारा अकबर के शासनकाल में लागू की गई 'दहशाला' (या आयन-ए-दहशाला) व्यवस्था में पिछले दस वर्षों के औसत उत्पादन और कृषि जिंसों के औसत प्रचलित मूल्यों के आधार पर मालगुजारी का निर्धारण किया जाता था। 2. जहांगीर के शासनकाल में मनसबदारी व्यवस्था में 'दुस्पा-सिंहस्पा' (दो और तीन घोड़े वाले) प्रणाली की शुरुआत की गई थी, जिसके अंतर्गत मनसबदारों को अपने मूल सवार पद से अतिरिक्त घोड़े रखने की अनुमति दी जाती थी, जिसके लिए उन्हें कोई अतिरिक्त वेतन नहीं मिलता था। 3. शाहजहां के काल में भू-राजस्व निर्धारण के लिए 'जमा' (आकलित राजस्व) और 'हासिल' (वास्तविक वसूल किया गया राजस्व) के बीच का अंतर काफी बढ़ गया था, जिसके कारण जागीरों की कमी की समस्या ('जागीर संकट') और गंभीर हो गई। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? हुमायूँ का मकबरा कहाँ स्थित है? महात्मा गांधी के भारत के प्रारंभिक सत्याग्रहों—चंपारण (1917) और खेड़ा (1918)—तथा असहयोग आंदोलन (1920-22) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. चंपारण सत्याग्रह के दौरान यूरोपीय बागान मालिकों द्वारा किसानों पर 'तीनकथा पद्धति' थोपी गई थी, जिसके तहत किसानों को अपनी कुल भूमि के 3/20वें हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य था, और इस समस्या के समाधान के लिए गठित 'चंपारण कृषि समिति' में गांधीजी को भी एक सदस्य के रूप में शामिल किया गया था। 2. वर्ष 1918 के खेड़ा सत्याग्रह में गांधीजी ने पाटीदार किसानों का नेतृत्व करते हुए सरकार से लगान में पूर्ण छूट की मांग की थी, और इसी आंदोलन के दौरान वल्लभभाई पटेल पहली बार गांधीजी के संपर्क में आए तथा उनके अत्यंत निष्ठावान अनुयायी बन गए। 3. फरवरी 1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के कारण महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को अचानक वापस ले लिया, जिससे क्षुब्ध होकर चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस के गया अधिवेशन (1922) के पश्चात कांग्रेस से अलग होकर 'स्वराज पार्टी' की स्थापना की थी। 4. असहयोग आंदोलन के दौरान ही कलकत्ता के विशेष अधिवेशन (सितंबर 1920) में पहली बार ब्रिटिश वस्त्रों और संस्थानों के बहिष्कार के प्रस्ताव पर भारी विरोध हुआ था, क्योंकि सीआर दास और विपिन चंद्र पाल जैसे नेताओं का मानना था कि नए विधानमंडलों के बहिष्कार से रचनात्मक राजनीति को नुकसान पहुंचेगा। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.