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History of India
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मध्यकालीन भारत के इतिहास में भक्ति और सूफी आंदोलनों के प्रसार तथा उनके दार्शनिक स्वरूप के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन को लोकप्रिय बनाने वाले नयनार (शिव भक्त) और आलवार (विष्णु भक्त) संतों ने जातिगत कठोरताओं का तीव्र विरोध करते हुए अपनी रचनाओं में संस्कृत के स्थान पर तमिल भाषा को प्राथमिकता दी, जिससे यह आंदोलन जनसाधारण तक पहुँच सका।
  2. 2. सूफी मत के 'चिश्ती सिलसिला' के संस्थापकों में शामिल ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने भारत में इस संप्रदाय की नींव रखी, और इस सिलसिले के संतों ने राज्य के राजसी संरक्षण (Royal Patronage) तथा राजकीय पदों को सहर्ष स्वीकार करते हुए सुल्तानों के दरबार में सक्रिय राजनीति में भाग लिया।
  3. 3. उत्तर भारत में रामभक्ति शाखा के प्रमुख संत तुलसीदास ने तत्कालीन समाज में समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए 'रामचरितमानस' की रचना अवधी भाषा में की, जो लोक-संस्कृति और लोक-धर्म के बीच सेतु का कार्य करने में सफल रही।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि दक्षिण भारत के आलवार और नयनार संतों ने संस्कृत भाषा के वर्चस्व को चुनौती देते हुए स्थानीय तमिल भाषा में अपनी भक्ति रचनाओं का प्रसार किया, जिससे आम जनता आसानी से इनसे जुड़ सकी। कथन 2 गलत है क्योंकि चिश्ती सिलसिले के संतों ने जानबूझकर राज्य के राजसी संरक्षण, शाही अनुदान और राजकीय पदों से दूरी बनाए रखी तथा सादगी पूर्ण जीवन बिताते हुए राजनीति से तटस्थ रहे। इसके विपरीत, सुहरवर्दी सिलसिले के संतों ने राजकीय संरक्षण और सरकारी पदों को स्वीकार किया था। कथन 3 सही है क्योंकि तुलसीदास जी ने लोकभाषा अवधी में 'रामचरितमानस' की रचना कर समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने का महान कार्य किया। सूफीवाद और भक्ति परंपराओं के बारे में अधिक जानने के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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