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History of India
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19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में स्थापित 'प्रार्थना समाज' और इसके संस्थापकों की कार्यप्रणाली के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. प्रार्थना समाज की स्थापना वर्ष 1867 में बंबई में आत्माराम पांडुरंग द्वारा केशव चंद्र सेन की प्रेरणा से की गई थी, और इसका मुख्य उद्देश्य अंतर-जातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह को बढ़ावा देना तथा महिला शिक्षा का प्रसार करना था।
- 2. महादेव गोविंद रानाडे इस समाज के सबसे प्रमुख नेता बने, जिन्होंने सामाजिक सुधारों को धार्मिक सुधारों से अधिक प्राथमिकता दी और समाज सुधार के लिए 'डेक्कन एजुकेशन सोसायटी' जैसी संस्थाओं के माध्यम से बौद्धिक आधार तैयार किया।
- 3. प्रार्थना समाज के संस्थापकों ने अपनी सामाजिक-सुधार की बैठकों में रूढ़िवादी हिंदू परंपराओं की अत्यधिक आलोचना की और मूर्तिपूजा, बहुदेववाद तथा जाति व्यवस्था का समर्थन करते हुए पूर्ण रूप से सनातन धर्म के सिद्धांतों को अपनाया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 और 2 सही हैं। प्रार्थना समाज की स्थापना 1867 में बंबई में आत्माराम पांडुरंग ने केशव चंद्र सेन की प्रेरणा से की थी। महादेव गोविंद रानाडे (M.G. Ranade) ने इस संस्था को व्यापक रूप दिया और सामाजिक-सुधार के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य किए। इसके विपरीत, कथन 3 गलत है क्योंकि प्रार्थना समाज ने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद और जाति व्यवस्था का तीव्र विरोध किया था, न कि उनका समर्थन। उन्होंने एक ईश्वर की उपासना और सामाजिक समता पर बल दिया था। इस आंदोलन के बारे में अधिक जानने के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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बौद्ध धर्म और जैन धर्म के प्रारंभिक दार्शनिक विकास, संघ की संरचना तथा उनके अनुष्ठानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बौद्ध संघ में प्रवेश के लिए न्यूनतम आयु सीमा 15 वर्ष निर्धारित की गई थी, जबकि जैन संघ (निर्ग्रंथ) में दिगंबर और श्वेतांबर दोनों संप्रदायों के अंतर्गत महिलाओं के लिए दीक्षा का द्वार प्रारंभ से ही पूर्ण रूप से खुला हुआ था और उन्हें मोक्ष प्राप्ति का समान अधिकार था।
2. बौद्ध धर्म के विपरीत, जैन धर्म ने जीवन की उत्पत्ति और कर्म सिद्धांत में कठोर तपस्या तथा संलेखना (संथारा) पद्धति को सर्वोच्च स्थान दिया, जिसके माध्यम से शरीर का अंत करना जैन दर्शन में आत्मकल्याण का एक वैध मार्ग माना गया है।
3. बौद्ध धर्म के 'प्रतिमार्ग' (मध्यम मार्ग) में वेदों की प्रामाणिकता को पूर्णतः अस्वीकार किया गया, किंतु महात्मा बुद्ध ने आत्मा (अत्ता/आत्मन्) के अस्तित्व को सिरे से नकारते हुए अनात्मवाद का सिद्धांत प्रतिपादित किया, जबकि जैन धर्म आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान झांसी और ग्वालियर में रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे के सैन्य अभियानों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मार्च 1858 में ब्रिटिश जनरल ह्यूरोज़ की सेना द्वारा झांसी की घेराबंदी किए जाने पर रानी लक्ष्मीबाई ने अत्यंत साहस के साथ किले की रक्षा की, और किले के पतन के बाद तात्या टोपे की सहायता से कालपी की ओर प्रस्थान किया जहाँ दोनों की संयुक्त सेना अंग्रेजों से पराजित हुई।
2. कालपी की पराراج के बाद रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने ग्वालियर की ओर कूच किया, जहाँ सिंधिया राजवंश के शासक जयाजीराव सिंधिया ने उनका खुलकर समर्थन किया और ग्वालियर के किले पर अधिकार करने में अपनी सेना उनके साथ मिला दी।
3. ग्वालियर पर अधिकार करने के पश्चात तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई ने संयुक्त रूप से ब्रिटिश सेना का सामना किया, और 18 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा-की-सराय में लड़ते हुए रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं।
4. रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु के पश्चात तात्या टोपे ने मध्य भारत के जंगलों में अंग्रेजों के विरुद्ध छापामार (गुरिल्ला) युद्ध जारी रखा, किंतु उनके एक विश्वासघाती जमींदार मानसिंह के विश्वासघात के कारण उन्हें अंग्रेजों ने पकड़ लिया और अप्रैल 1859 में शिवपुरी में फांसी दे दी गई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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