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History of India
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उन्नीसवीं शताब्दी के सुधार आंदोलनों के संदर्भ में ब्रह्म समाज, आर्य समाज और प्रार्थना समाज की वैचारिक एवं संस्थागत स्थापना के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित ब्रह्म समाज ने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद और पैतृक पुरोहिती व्यवस्था का खंडन किया, किंतु साथ ही इसने वेदों की अचूकता (Infallibility of Vedas) के सिद्धांत को पूर्णतः स्वीकार करते हुए वेदों को ही अपने धार्मिक सुधारों का एकमात्र आधार माना।
- 2. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित 'आर्य समाज' ने 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया और पाखंड खंडिनी पताका फहराते हुए मूर्तिपूजा, अवतारवाद, बाल विवाह तथा जाति-प्रथा का कड़ा विरोध किया, जबकि इसकी स्थापना सर्वप्रथम वर्ष 1875 में बॉम्बे (मुंबई) में की गई थी।
- 3. न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानड़े और आत्माराम पांडुरंग द्वारा स्थापित 'प्रार्थना समाज' ने महाराष्ट्र में सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाया, जिसका मुख्य फोकस अंतर-जातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह, स्त्री शिक्षा और दलितोद्धार जैसे व्यावहारिक सुधारों पर था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है, क्योंकि राजा राममोहन राय और उनके ब्रह्म समाज ने वेदों की अचूकता के सिद्धांत को कभी स्वीकार नहीं किया था; राजा राममोहन राय का मानना था कि किसी भी एक पुस्तक या ग्रंथ को त्रुटिहीन या अंतिम प्रामाणिकता नहीं माना जा सकता। इसके विपरीत, स्वामी दयानंद सरस्वती और उनके 'आर्य समाज' ने वेदों को अपौरुषेय और अचूक माना तथा 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया। कथन 2 सत्य है, क्योंकि स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में बॉम्बे में आर्य समाज की स्थापना की थी और यह संगठन मूर्तिपूजा, बहुदेववाद तथा जन्म-आधारित जाति व्यवस्था का विरोधी था। कथन 3 भी सत्य है, क्योंकि केशव चंद्र सेन की प्रेरणा से बंबई में स्थापित 'प्रार्थना समाज' (संस्थापक आत्माराम पांडुरंग एवं एम.जी. रानड़े) का मुख्य उद्देश्य धार्मिक आडंबरों के बजाय अंतर-जातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह और दलितों के उत्थान जैसे व्यावहारिक सामाजिक सुधारों पर बल देना था। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देखें।
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ब्रिटिश भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों — स्थाई बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी — के वैधानिक, भौगोलिक तथा आर्थिक प्रभावों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. स्थाई बंदोबस्त प्रणाली के अंतर्गत लॉर्ड कार्नवालिस ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा में भू-राजस्व की मांग को जमींदारों के लिए हमेशा के लिए निश्चित कर दिया था, किंतु इसके साथ ही जमींदारों की समय पर लगान अदायगी सुनिश्चित करने के लिए 'सूर्यास्त कानून' (Sunset Law) लागू किया गया था।
2. थॉमस मुनरो और कैप्टन रीड द्वारा मुख्य रूप से मद्रास और बॉम्बे प्रेसीडेंसी में लागू की गई रयतवारी व्यवस्था में भूमि का स्वामित्व सीधे किसानों (रयत) को सौंपा गया था, तथा सरकार और किसानों के बीच सीधा अनुबंध होता था, जिसमें लगान की दरें पूरी तरह से स्थाई थीं और अकाल या सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं में भी उनमें कभी कोई संशोधन नहीं किया जाता था।
3. हॉल्ट मैकेंज़ी और विलियम बेंटिंक द्वारा उत्तर-पश्चिम प्रांत, मध्य भारत और पंजाब के कुछ हिस्सों में विकसित महालवारी व्यवस्था के अंतर्गत भू-राजस्व का निर्धारण व्यक्तिगत किसान के स्तर पर न करके संपूर्ण ग्राम या ग्राम समुदाय (महाल) के स्तर पर किया जाता था, और इसके भुगतान के लिए पूरा गाँव सामूहिक रूप से उत्तरदायी था।
4. इन तीनों भू-राजस्व प्रणालियों के दीर्घकालिक प्रभाव के परिणामस्वरूप भारतीय कृषि का तेजी से वाणिज्यीकरण हुआ और पारंपरिक निर्वाह कृषि की जगह नकदी फसलों (जैसे अफीम, कपास, नील और जूट) के उत्पादन को बढ़ावा मिला, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह से औपनिवेशिक शोषण और महाजनों के ऋणजाल में जकड़ गई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में बौद्ध धर्म और जैन धर्म के दार्शनिक तथा ऐतिहासिक विकास के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के अनुसार तीर्थंकर मल्लिनाथ एक स्त्री थीं, जबकि दिगंबर संप्रदाय इस मान्यता को पूर्णतः अस्वीकार करता है और उनका मानना है कि स्त्री शरीर से मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं है।
2. बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय के उदय के साथ ही बोधिसत्वों की अवधारणा लोकप्रिय हुई, जिसमें अवलोकितेश्वर (पद्मपाणि) को सबसे दयालु बोधिसत्व माना गया है जिनका मुख्य कार्य दुखी मानवता की सहायता करना है।
3. जैन दर्शन के 'स्यादवाद' (अनेकांतवाद) के सिद्धांत के अनुसार सत्य के अनेक पहलू होते हैं और ज्ञान की सापेक्षता को दर्शाने के लिए प्रत्येक कथन के आगे 'स्यात्' शब्द का प्रयोग किया जाता है।
4. बौद्ध धर्म की प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन वैशाली में महाकस्सप की अध्यक्षता में अजातशत्रु के शासनकाल में हुआ था, जिसमें बुद्ध के उपदेशों को 'सुत्तपिटक' और 'विनयपिटक' के रूप में संकलित किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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शिवाजी महाराज ने मात्र 16 वर्ष की आयु में 1646 ई. में किस प्रथम किले पर विजय प्राप्त की थी?
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