BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

History of India
18 views

मध्यकालीन भारत के इतिहास में भक्ति और सूफी आंदोलनों के प्रसार तथा उनके दार्शनिक स्वरूप के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित 'अद्वैत वेदांत' के विपरीत, दक्षिण भारत में वैष्णव संतों (आलवारों) और शैव संतों (नयनारों) ने भक्ति आंदोलन की नींव रखी, जिसमें रामानुजाचार्य ने 'विशिष्टाद्वैत' दर्शन का प्रतिपादन करते हुए ईश्वर और जीव के बीच तादात्म्य के साथ-साथ भेद को भी स्वीकार किया।
  2. 2. सूफी सिलसिले मुख्य रूप से दो प्रमुख धाराओं—'बा-शरा' (इस्लामी शरीयत के बंधनों से बंधे हुए) और 'बे-शरा' (शरीयत के कठोर नियमों से स्वतंत्र या मस्त कलंदर)—में विभाजित थे, जिनमें भारत में चिश्ती और सुहरावर्दी सिलसिले 'बा-शरा' परंपरा के अंतर्गत आते थे।
  3. 3. उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन को लोकप्रिय बनाने वाले रामानंद ने जातिगत भेदभाव को दरकिनार करते हुए अपने शिष्यों में रैदास (चमार), कबीर (जुलाहा), सेना (नाई) और पीपा (राजपूत शासक) जैसे समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को शामिल किया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

दिए गए तीनों कथन पूर्णतः सत्य हैं। दक्षिण भारत में आलवार और नयनार संतों ने भक्ति आंदोलन की शुरुआत की, जिसे बाद में रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत दर्शन के माध्यम से दार्शनिक आधार प्रदान किया। सूफीवाद में भी 'बा-शरा' (शरीयत का पालन करने वाले जैसे चिश्ती और सुहरावर्दी) तथा 'बे-शरा' (मदारी, कलंदर आदि) शैलियों का स्पष्ट विभाजन मिलता है। इसके अतिरिक्त, रामानंद ने उत्तर भारत में भक्ति को जन-जन तक पहुँचाते हुए समाज के विभिन्न वर्गों से अपने शिष्य बनाए, जिससे इस आंदोलन का दायरा अत्यंत व्यापक हो गया। विकिपीडिया संदर्भ
Share:

Related Questions

→ वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान झाँसी और ग्वालियर में रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे के सैन्य अभियानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. मार्च 1858 में मेजर जनरल ह्यूरोज़ की ब्रिटिश सेना द्वारा झाँसी के किले की घेराबंदी किए जाने पर, रानी लक्ष्मीबाई ने अत्यंत वीरतापूर्वक रक्षा की और कालपी की ओर प्रस्थान किया, जहाँ तात्या टोपे की सेना ने उनके साथ मिलकर ब्रिटिश सेना के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बनाया। 2. कालपी के युद्ध में पराजित होने के पश्चात रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने अचूक सैन्य रणनीति का परिचय देते हुए ग्वालियर के सिंधिया शासक (जयाजीराव सिंधिया) को पराजित किया और ग्वालियर के किले पर अधिकार कर लिया, जहाँ सिंधिया शासक ने अंग्रेजों की शरण ली। 3. ग्वालियर में ब्रिटिश सेना के पुनः आक्रमण (जून 1858) के दौरान रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं, जबकि तात्या टोपे वहाँ से बच निकलने में सफल रहे और बाद में उन्हें एक स्थानीय जमींदार मानसिंह के विश्वासघात के कारण अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। 4. ग्वालियर के पतन के उपरांत तात्या टोपे ने मध्य भारत और राजस्थान के जंगलों में अंग्रेजों के विरुद्ध छापामार युद्ध (Guerrilla warfare) का नेतृत्व किया, और ब्रिटिश रिकॉर्ड के अनुसार उन्हें अंग्रेजों द्वारा कभी भी पकड़ा नहीं जा सका तथा वे नेपाल में सुरक्षित आश्रय पाने में सफल रहे थे। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → छठी शताब्दी ईसा पूर्व के 'सोलह महाजनपदों' और उनके प्रारंभिक राजनीतिक स्वरूप के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. अंगुत्तर निकाय और जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में सोलह महाजनपदों की सूची मिलती है, जिनमें केवल राजतांत्रिक प्रणालियों का ही उल्लेख है और किसी भी प्रकार की गणतंत्रात्मक व्यवस्था का अस्तित्व नहीं था। 2. मगध महाजनपद के उत्कर्ष में उसकी आरंभिक राजधानी राजगृह (गिरिव्रज) की सामरिक स्थिति का बड़ा योगदान था, क्योंकि यह पाँच पहाड़ियों से घिरी हुई एक प्राकृतिक रूप से सुरक्षित राजधानी थी। 3. वज्जी महाजनपद आठ कुलों (कुलों का संघ) का एक प्रसिद्ध संघ था, जिसमें लिच्छवि और विदेह सबसे शक्तिशाली कुल थे, तथा इसकी राजधानी वैशाली थी। 4. वत्स महाजनपद की राजधानी कौशाम्बी थी, जो यमुना नदी के तट पर स्थित होने के कारण उत्तर भारत के प्रमुख व्यापारिक मार्गों के नियंत्रण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थी। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → वर्धन राजवंश एवं दक्षिण भारत के राजवंशों (चोल, पल्लव, चालुक्य) के प्रशासनिक, कलात्मक एवं राजनीतिक विकास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. हर्षवर्धन के शासनकाल के दौरान कन्नौज सभा का मुख्य उद्देश्य महायान बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करना तथा चीनी यात्री ह्वेनसांग के सम्मान में एक भव्य धार्मिक अनुष्ठान आयोजित करना था, जिसमें बीस राजाओं और विभिन्न संप्रदायों के विद्वानों ने भाग लिया था। 2. पल्लव शासक महेंद्रवमन् प्रथम ने अपने प्रारंभिक जीवन में जैन धर्म का अनुयायी होने के बाद शैव संत अप्पर के प्रभाव में आकर शैव धर्म स्वीकार किया था, तथा उन्होंने महाबलीपुरम में प्रसिद्ध एकश्म (Monolithic) रथ मंदिरों का निर्माण कार्य शुरू करवाया था। 3. वातापी के चालुक्य वंश के महान शासक पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्धन को पराजित किया था, जिसका सजीव और विस्तृत विवरण ऐहोल प्रशस्ति में मिलता है, जिसकी रचना रवि कीर्ति ने की थी। 4. चोल साम्राज्य की स्थानीय स्वशासन प्रणाली (विशेषकर उत्तरमेरूर शिलालेखों में वर्णित) के अनुसार, ग्राम सभाओं के सदस्यों का चयन 'कुदोलवराय' (पर्ची निकालकर मतदान) नामक एक पारदर्शी लाटरी प्रणाली के माध्यम से किया जाता था, और इसके लिए उम्मीदवारों की न्यूनतम और अधिकतम आयु सीमा के साथ-साथ वेद-वेदांगों का ज्ञान अनिवार्य था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → मुगलकालीन प्रशासनिक व्यवस्था, मनसबदारी प्रथा और भू-राजस्व प्रणालियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. अकबर द्वारा प्रशासनिक सुधारों के तहत शुरू की गई 'मनसबदारी प्रथा' पूरी तरह से वंशानुगत थी, जिसमें किसी मनसबदार की मृत्यु के बाद उसके पुत्र को स्वतः ही उसके पिता का मनसब और जागीर प्राप्त हो जाती थी। 2. राजा टोडरमल द्वारा लागू की गई 'दहसाला' (जब्ती) प्रणाली के अंतर्गत पिछले दस वर्षों के दौरान विभिन्न फसलों के औसत उत्पादन और उनके प्रचलित बाजार मूल्यों का आकलन कर मालगुजारी का निर्धारण किया जाता था। 3. शाहजहां के शासनकाल में मनसबदारी व्यवस्था में 'दुस्पा-सिंहस्पा' (दो घोड़े या तीन घोड़े वाले सैनिक रखने का नियम) नामक एक नया प्रावधान जोड़ा गया था, जिससे बिना मनसब बढ़ाए सैनिकों की संख्या बढ़ाई जा सकती थी। 4. औरंगजेब के शासनकाल के उत्तरार्ध में जागीरों की भारी कमी ('जागीरदारी संकट') उत्पन्न हो गई थी, क्योंकि उपलब्ध जागीरों की आय मनसबदारों के कुल वेतन के मुकाबले बहुत कम हो गई थी, जिसे नियंत्रित करने के लिए 'पैबाकी' भूमि को जागीर में बदलने का दबाव बढ़ गया था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शुरुआती चरणों, नरम दल और गरम दल के वैचारिक संघर्ष तथा संबंधित ऐतिहासिक घटनाओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. कांग्रेस के प्रारंभिक चरण (1885-1905) में नरमपंथियों का मुख्य विश्वास ब्रिटिश न्यायप्रियता में था और वे 'प्रार्थना, याचिका और प्रतिवेदन' की पद्धति का अनुसरण करते थे, जबकि गरमपंथियों ने 'स्वदेशी', 'बहिष्कार', 'राष्ट्रीय शिक्षा' और 'निष्क्रिय प्रतिरोध' को राजनीतिक संघर्ष का मुख्य हथियार बनाया। 2. वर्ष 1905 के बनारस अधिवेशन में, जिसकी अध्यक्षता गोपाल कृष्ण गोखले ने की थी, बंगाल विभाजन के विरोध में चलाए जा रहे स्वदेशी आंदोलन को पूरे देश में फैलाने का औपचारिक प्रस्ताव पारित किया गया तथा नरमपंथियों और गरमपंथियों के संयुक्त समझौते के तहत 'पूर्ण स्वराज' का लक्ष्य स्वीकार किया गया। 3. वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में नरम दल और गरम दल के बीच अध्यक्ष पद के चुनाव तथा आंदोलन के दायरे को लेकर हुए तीव्र मतभेद के कारण कांग्रेस का विभाजन हो गया, जिसमें नरमपंथियों ने रास बिहारी घोष को अध्यक्ष चुना, जबकि गरमपंथियों की ओर से लाला लाजपत राय या बाल गंगाधर तिलक को अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव था। 4. सूरत विभाजन के पश्चात ब्रिटिश सरकार ने दमनकारी नीतियों का सहारा लेते हुए गरमपंथी नेताओं के खिलाफ कठोर कार्रवाई की, जिसके तहत बाल गंगाधर तिलक को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर छह वर्ष के कारावास के लिए म्यांमार की मांडले जेल भेज दिया गया था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.