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History of India
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मध्यकालीन भारत के इतिहास में भक्ति और सूफी आंदोलनों के वैचारिक विकास, दार्शनिक मान्यताओं तथा उनके ऐतिहासिक प्रभावों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन को लोकप्रिय बनाने का श्रेय मुख्य रूप से आलवार (वैष्णव) और नयनार (शैव) संतों को जाता है, जिन्होंने अपनी रचनाओं में जाति-पाति के कठोर बंधनों की आलोचना की तथा तमिल भाषा को भक्ति के प्रचार का माध्यम बनाया, जिससे अलवर संत आंदाल को 'दक्षिण की मीरा' के रूप में जाना गया।
  2. 2. उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन को प्रसारित करने वाले रामानंद ने जातिगत भेदभाव को अस्वीकार करते हुए अपने शिष्यों में रैदास (चमार), कबीर (जुलाहा), और सेना (नाई) जैसे समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को सम्मिलित किया, तथा उन्होंने संस्कृत के स्थान पर लोकभाषा (हिंदी/अवधी) को उपदेश का माध्यम बनाया।
  3. 3. सूफी मत (तसव्वुफ़) के चिश्ती सिलसिले की स्थापना भारत में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती द्वारा की गई थी, और इस सिलसिले के संतों ने राज्य के संरक्षण, शाही दरबारों के साथ निकट संबंध और भारी मात्रा में जागीरें स्वीकार करने की नीति का कड़ाई से पालन किया ताकि वे गरीबों की सेवा कर सकें।
  4. 4. महान सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के दरबार में समकालीन सात सुल्तानों का शासनकाल देखा गया, किंतु उन्होंने कभी भी किसी सुल्तान के दरबार में प्रवेश नहीं किया और 'सुल्तान-उल-मशाइख' की उपाधि से विभूषित हुए, जबकि उनके प्रिय शिष्य अमीर खुसू ने फारसी कविता में भारतीय शैली (सबक-ए-हिन्दी) का सूत्रपात किया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1, 2 और 4 सही हैं, जबकि कथन 3 असत्य है। चिश्ती सिलसिले के सूफी संत राज्य के संरक्षण, शाही दरबारों और राजनीतिक सत्ता से दूर रहने (दुनिया से अलगाव और सादगी) के अपने कड़े उसूलों के लिए जाने जाते थे; वे शाही जागीरें या बड़े अनुदान स्वीकार नहीं करते थे और अपनी आजीविका के लिए भिक्षा (फुतूह) या स्वयं श्रम पर निर्भर रहते थे। भक्ति और सूफी संतों ने भारतीय समाज में समन्वय और समरसता की संस्कृति को सुदृढ़ किया। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देखा जा सकता है।
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