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History of India
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वैदिक सभ्यता और साहित्य के विकास क्रम के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. ऋग्वैदिक काल में लोहे का व्यापक उपयोग युद्धक अस्त्र-शस्त्रों और कृषि के भारी उपकरणों के निर्माण में किया जाता था, जिसे 'कृष्ण अयस' कहा गया है।
- 2. उत्तर वैदिक कालीन ग्रंथों में गोत्र प्रथा की स्थापना हुई, जिसका शाब्दिक अर्थ वह स्थान था जहाँ संपूर्ण कुल का गोधन एक साथ पाला जाता था, और इस काल में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित कर दिए गए।
- 3. शतपथ ब्राह्मण में विदेह माधव और गौतम राहुगण की कथा का उल्लेख है, जो आर्यों के पश्चिम से पूर्व की ओर (सरयू नदी के पार) भौगोलिक विस्तार और अग्नि के प्रसार को दर्शाती है।
- 4. वैदिक अनुष्ठानों और उनके शुद्ध संपादन को समझने के लिए रचे गए छह 'वेदांगों' में शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष शामिल हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि 'कृष्ण अयस' (लोहे) का ज्ञान एवं व्यापक उपयोग ऋग्वैदिक काल में नहीं, बल्कि उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000 ईसा पूर्व के बाद) में प्रारंभ हुआ था। ऋग्वैदिक लोग लोहे से परिचित नहीं थे, वे तांबे या कांस्य ('अयस') का प्रयोग करते थे। कथन 2, 3 और सही हैं। उत्तर वैदिक काल में गोत्र व्यवस्था संस्थागत हुई और शतपथ ब्राह्मण में विदेह माधव की कथा मिलती है जो आर्यों के सदाानीरा (गंडक) नदी तक के विस्तार को दर्शाती है। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देखें।
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लोदी वंश का सबसे सर्वश्रेष्ठ और शक्तिशाली सुल्तान कौन था?
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सिंधु घाटी सभ्यता (Harappan Civilization) की अर्थव्यवस्था, व्यापारिक गतिविधियों और समकालीन सभ्यताओं के साथ इसके संपर्कों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का मेसोपोटामिया की सभ्यता के साथ घनिष्ठ व्यापारिक संबंध था, जिसकी पुष्टि सुमेरियन अभिलेखों में प्रयुक्त 'मेलुहा' (Meluhha) शब्द से होती है, जिसे सामान्यतः सिंधु क्षेत्र के लिए ही संदर्भित किया जाता था।
2. लोथल और सुरकोतदा जैसे तटीय स्थलों के अतिरिक्त फारस की खाड़ी (Persian Gulf) की मुहरें (Gulf seals) लोथल से प्राप्त होना यह प्रमाणित करता है कि हड़प्पावासी समुद्री व्यापार में सक्रिय रूप से संलग्न थे और ओमान व बहरीन के साथ उनका सीधा संपर्क था।
3. यद्यपि हड़प्पा सभ्यता के लोग तांबा और कांसा बनाने की उन्नत तकनीकी जानते थे, तथापि इस काल में सोने और चाँदी जैसी बहुमूल्य धातुओं का कोई भी पुरातात्विक साक्ष्य सिंधु बस्तियों से प्राप्त नहीं हुआ है, जो यह दर्शाता है कि वे इन धातुओं से पूर्णतः अपरिचित थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में बौद्ध धर्म और जैन धर्म की दार्शनिक मान्यताओं एवं उनकी संगीतों/परिषदों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बौद्ध धर्म के विपरीत, जैन धर्म ने आत्मा (जीव) के अस्तित्व को स्वीकार किया और मोक्ष प्राप्ति के लिए 'कायाक्लेश' (शरीर को कष्ट देना) तथा संलेखना (अंथरा) पद्धति को अनिवार्य माना, जबकि महात्मा बुद्ध ने मध्यम मार्ग (अमध्याप्रपदा) का उपदेश दिया।
2. बौद्ध धर्म की प्रथम संगीति का आयोजन राजगृह (सप्तपर्णी गुफा) में महाकस्सप की अध्यक्षता में अजातशत्रु के शासनकाल में हुआ था, जिसमें बुद्ध के उपदेशों को 'सुत्त पिटक' और 'विनय पिटक' के रूप में संकलित किया गया।
3. जैन धर्म की प्रथम जैन संगीति पाटलिपुत्र में स्थूलभद्र की अध्यक्षता में हुई थी, जिसमें जैन ग्रंथों को बारह अंगों में विभाजित किया गया और भद्रबाहु के अनुयायी श्वेतांबरों ने इसका पूर्ण बहिष्कार किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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दिल्ली में 1857 के विद्रोह के नेतृत्व और मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की भूमिका के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यद्यपि विद्रोही सिपाहियों ने बहादुर शाह जफर को भारत का सम्राट (शहंशाह-ए-हिंदुस्तान) घोषित कर दिया था, किंतु जफर की इच्छा के विरुद्ध उन्हें यह नेतृत्व स्वीकार करने के लिए विवश किया गया था और उनकी भूमिका मुख्य रूप से एक प्रतीकात्मक एवं अनिच्छुक केंद्रबिंदु की थी।
2. दिल्ली में विद्रोहियों की वास्तविक सैन्य कमान जनरल बख्त खान के हाथों में थी, जो बरेली से आने वाली विद्रोही सेना का नेतृत्व कर रहे थे और जिन्हें जफर द्वारा 'साहिब-ए-आलम बहादुर' की उपाधि प्रदान की गई थी।
3. दिल्ली पर पुनः अधिकार प्राप्त करने के लिए ब्रिटिश सेना ने सितंबर 1857 में कश्मीरी गेट पर भीषण आक्रमण किया, जिसमें ब्रिटिश अधिकारी जॉन निकलसन गंभीर रूप से घायल हो गए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई।
4. हुमायूं के मकबरे से ब्रिटिश अधिकारी विलियम हडसन द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद बहादुर शाह जफर पर दिल्ली के लाल किले में मुकदमा चलाया गया और उन्हें निर्वासित कर रंगून भेज दिया गया, जहाँ उनकी मृत्यु हो गई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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ऋग्वैदिक काल एवं उत्तर वैदिक काल की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक संरचना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ऋग्वैदिक काल में 'सभा' और 'समिति' नामक संस्थाएँ अत्यधिक शक्तिशाली थीं और राजा की निरंकुशता पर नियंत्रण रखती थीं, किंतु उत्तर वैदिक काल में आते-आते इन संस्थाओं का राजनीतिक प्रभाव क्षीण होने लगा तथा महिलाओं के 'सभा' में भाग लेने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया।
2. ऋग्वैदिक समाज मुख्य रूप से एक समतावादी और कबीलाई समाज था जिसमें वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित थी, जबकि उत्तर वैदिक काल में लोहे (श्याम अयस) की व्यापक खोज के बाद कृषि आधारित अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हुई और वर्ण व्यवस्था जन्म पर आधारित होकर अत्यंत कठोर हो गई।
3. उत्तर वैदिक काल में गोत्र (Gotra) संस्था का उदय हुआ जिसका मूल शाब्दिक अर्थ 'गोहूति' या 'गोष्ठ' (वह स्थान जहाँ कुल विशेष का गोधन पाला जाता था) था, और इसी काल में पहली बार चार आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) का पूर्ण विधान 'जाबालोपनिषद' में देखने को मिलता है।
4. ऋग्वैदिक काल में राजा को 'गोपा जनस्य' कहा जाता था जिसे नियमित कर (बलि) देने की अनिवार्य व्यवस्था थी, जबकि उत्तर वैदिक काल में 'भागदुध' नामक अधिकारी कर संग्रह करने लगा और राजा की शक्ति में वृद्धि के साथ-साथ 'राजसूय', 'अश्वमेध' तथा 'वाजपेय' जैसे बड़े यज्ञों का प्रचलन बढ़ गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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