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History of India
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19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'ब्रह्म समाज' ने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद और जन्म आधारित जाति व्यवस्था का पुरजोर विरोध किया तथा वेदों की अचूकता और उनके दिव्य ज्ञान को स्वीकार किया।
  2. 2. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित 'आर्य समाज' ने 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया और मध्यकालीन पुराणों तथा पौराणिक अनुष्ठानों को खारिज करते हुए मूर्तिपूजा का खंडन किया।
  3. 3. ज्योतिराव फुले ने 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना कर ब्राह्मणवादी वर्चस्व, सामाजिक असमानता और धार्मिक पाखंडों के विरुद्ध आवाज उठाई तथा शूद्रों एवं अति-शूद्रों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है क्योंकि राजा राममोहन राय और उनके ब्रह्म समाज ने किसी भी ग्रंथ (यहाँ तक कि वेदों या उपनिषदों) को अचूक या स्वतःसिद्ध (infallible) नहीं माना, जबकि आर्य समाज ने वेदों की अचूकता का समर्थन किया था। कथन 2 सही है; स्वामी दयानंद सरस्वती ने वेदों को ज्ञान का एकमात्र स्रोत मानते हुए 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया और मूर्तिपूजा तथा कर्मकांडों का विरोध किया। कथन 3 सही है; ज्योतिराव फुले ने 1873 में 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की जिसका उद्देश्य शूद्रों और अस्पृश्यों को ब्राह्मणवादी आधिपत्य से मुक्त कराना था। विस्तृत जानकारी के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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