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History of India
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19वीं शताब्दी के सुधार आंदोलनों के दौरान स्थापित 'प्रार्थना समाज' (Prarthana Samaj) और 'आत्मीय सभा' के वैचारिक तथा संस्थागत विकास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. वर्ष 1815 में राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'आत्मीय सभा' ने एकेश्वरवाद के प्रचार और मूर्तिपूजा के विरोध का समर्थन किया, जबकि वर्ष 1867 में केशव चंद्र सेन की प्रेरणा से बंबई में स्थापित 'प्रार्थना समाज' का मुख्य उद्देश्य अंतरजातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह और दलित उत्थान जैसे सामाजिक सुधारों पर विशेष बल देना था।
  2. 2. प्रार्थना समाज के प्रमुख संस्थापक नेताओं में आत्माराम पांडुरंग, न्यायमूर्त्ति महादेव गोविंद रानाडे और आर. जी. भंडारकर शामिल थे, जिन्होंने महाराष्ट्र में धार्मिक रूढ़िवादिता के विरुद्ध बौद्धिक चेतना जगाई और 'डेक्कन एजुकेशन सोसायटी' जैसी संस्थाओं की नींव रखने में भी योगदान दिया।
  3. 3. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'ब्रह्म समाज' और प्रार्थना समाज दोनों ने ही वेदों की अभ्रान्तता (Infallibility) के सिद्धांत को पूर्णतः स्वीकार किया था और वे वेदों को सर्वोच्च एवं अंतिम धार्मिक सत्ता मानते थे।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि राजा राममोहन राय ने 1815 में 'आत्मीय सभा' की स्थापना की थी जिसका उद्देश्य एकेश्वरवादी विचारों का प्रसार करना था, और केशव चंद्र सेन के महाराष्ट्र दौरे के प्रभाव से 1867 में आत्माराम पांडुरंग द्वारा 'प्रार्थना समाज' की स्थापना की गई जो मुख्य रूप से सामाजिक सुधारों (जैसे विधवा विवाह, अंतरजातीय विवाह और महिला शिक्षा) पर केंद्रित था। कथन 2 भी सही है क्योंकि न्यायमूर्त्ति महादेव गोविंद रानाडे और आर. जी. भंडारकर इसके प्रमुख स्तंभ थे और उन्होंने महाराष्ट्र के सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण में अहम भूमिका निभाई थी। कथन 3 गलत है क्योंकि राजा राममोहन राय और प्रार्थना समाज के नेता वेदों को अचूक या अपरिवर्तनीय नहीं मानते थे, जबकि इसके विपरीत स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज ने 'वेदों की अचूकता' का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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