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History of India
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वर्धन राजवंश एवं दक्षिण भारत के राजवंशों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. हर्षवर्धन के शासनकाल में चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत आया था, जिसने कन्नौज में आयोजित भव्य धर्मसभा की अध्यक्षता की थी, और हर्षवर्धन ने 'शीलदित्य' की उपाधि धारण करने के साथ-साथ 'नागानंद', 'रत्ननावली' और 'प्रियदर्शिका' जैसे संस्कृत नाटकों की रचना की थी।
- 2. बादामी के चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा नदी کے तट पर हर्षवर्धन को पराजित किया था, जिसका सजीव वर्णन कालिदास की प्रसिद्ध रचना 'हर्षचरित' में मिलता है।
- 3. पल्लव वंश के शासक नरसिंहवर्मन प्रथम ने वातापी पर अधिकार कर लिया था और 'वातापीकोंड' की उपाधि धारण की थी, तथा इसी के शासनकाल में ह्वेनसांग ने पल्लव की राजधानी कांची की यात्रा की थी।
- 4.
चोल शासक राजराजा प्रथम ने तंजावुर में प्रसिद्ध 'राजराजेश्वर' (बृहदेश्वर) मंदिर का निर्माण करवाया था, जो द्रविड़ वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है और पूरी तरह से भगवान विष्णु को समर्पित है。 उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि हर्षवर्धन के शासनकाल में ह्वेनसांग भारत आया था, कन्नौज की सभा हुई थी और उसने नागानंद, रत्नावली व प्रियदर्शिका की रचना की थी तथा 'शीलदित्य' उपाधि ली थी। कथन 2 गलत है क्योंकि पुलकेशिन द्वितीय द्वारा हर्षवर्धन की पराजय का उल्लेख कालिदास के 'हर्षचरित' में नहीं, बल्कि बाणभट्ट द्वारा रचित 'हर्षचरित' (और पुलकेशिन के दरबारी कवि रवि कीर्ति की अहोल प्रशस्ति) में मिलता है (कालिदास गुप्त काल के थे)। कथन 3 सही है, पल्लव शासक नरसिंहवर्मन प्रथम ने चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय को हराकर 'वातापीकोंड' की उपाधि ली थी और उसके समय ह्वेनसांग कांची आया था। कथन 4 गलत है क्योंकि तंजावुर का बृहदेश्वर (राजराजेश्वर) मंदिर भगवान शिव को समर्पित है, न कि विष्णु को। इस ऐतिहासिक कालखंड के बारे में अधिक जानने के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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दिल्ली सल्तनत के विभिन्न राजवंशों के प्रशासनिक ढांचे, सैन्य सुधारों और राजस्व प्रणालियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अलाउद्दीन खिलजी द्वारा स्थापित 'दीवान-ए-मुस्तकखराज' नामक विभाग का मुख्य उद्देश्य भू-राजस्व के बकाया, भ्रष्टाचार और घपलों की जाँच करना था, जबकि मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा स्थापित 'दीवान-ए-कोही' कृषि के विकास के लिए प्रत्यक्ष रूप से किसानों को वित्तीय सहायता और बीज उपलब्ध कराने हेतु बनाया गया था।
2. इल्तुतमिश द्वारा प्रारंभ की गई 'इक्ता व्यवस्था' को फिरोजशाह तुगलक ने वंशानुगत बना दिया और सैनिकों को नकद वेतन देने के स्थान पर 'वज्ह' (इक्ता की आय) देने की प्रथा को पूरी तरह समाप्त कर दिया, जिससे सल्तनत में जागीरदारी प्रथा का पतन हो गया।
3. लोदी वंश के सुल्तानों के काल में अफगान सरदारों के साथ संबंधों का आधार तुर्क-मंगोल तानाशाही निरंकुशता के विपरीत 'समानता के सिद्धांत' पर आधारित था, जिसमें सुल्तान को 'प्रथम में समकक्ष' (First among equals) माना जाता था और बहलोल लोदी ने अफगान अमीरों को संतुष्ट करने के लिए 'मंसूर-ए-अली' जैसी उच्च उपाधियाँ प्रदान की थीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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