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History of India
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान लखनऊ और अवध क्षेत्र में बेगम हजरत महल और मौलवी अहमदुल्लाह शाह की क्रांतिकारी भूमिका तथा उनके संघर्ष के ऐतिहासिक संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. अवध में विद्रोह की शुरुआत 30 जून 1857 को चिनहट के युद्ध में ब्रिटिश रेजिडेंट हेनरी लॉरेंस की पराजय के साथ हुई, जहाँ स्थानीय जनता और सैनिकों ने बेगम हजरत महल के नेतृत्व में ब्रिटिश सत्ता को खुली चुनौती दी थी।
  2. 2. बेगम हजरत महल ने अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरजिस कादिर को अवध का नवाब घोषित कर प्रशासनिक और सैन्य संचालन अपने हाथों में लिया, तथा लखनऊ की रेजिडेंसी की लंबी घेराबंदी के दौरान ब्रिटिश सेनाओं को घोर कठिनाइयों में डाला।
  3. 3. फैजाबाद से अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करने वाले मौलवी अहमदुल्लाह शाह, जिन्हें 'डंका शाह' के नाम से भी जाना जाता था, ने ब्रिटिश सेना के विरुद्ध जिहाद का आह्वान किया और कैंपबेल तथा आउट्राम की संयुक्त सेनाओं को कड़ा मुकाबला दिया था।
  4. 4. लखनऊ के अंतिम पतन के उपरांत बेगम हजरत महल ने ब्रिटिश सेनाओं के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और आजीवन ब्रिटिश पेंशन स्वीकार कर कलकत्ता में निवास किया, जबकि मौलवी अहमदुल्लाह शाह को पुवायाँ के राजा के विश्वासघात के बाद अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान लखनऊ और अवध क्षेत्र में विकिपीडिया संदर्भ बेगम हजरत महल और मौलवी अहमदुल्लाह शाह की भूमिका अत्यंत निर्णायक थी। कथन 1, 2 और 3 पूर्णतः सत्य हैं क्योंकि अवध में चिनहट के युद्ध में हेनरी लॉरेंस की पराजय हुई, बेगम हजरत महल ने अपने पुत्र बिरजिस कादिर को नवाब घोषित कर संघर्ष का नेतृत्व किया, और मौलवी अहमदुल्लाह शाह ('डंका शाह') ने अंग्रेजों के खिलाफ कड़ा मुकाबला किया। किंतु कथन 4 असत्य है क्योंकि बेगम हजरत महल ने ब्रिटिश सेना के सामने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया, बल्कि वे नेपाल चली गईं और वहीं उनकी मृत्यु हुई; जबकि मौलवी अहमदुल्लाह शाह को धोखे से मारा गया था, न कि उन्हें फांसी दी गई थी।
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