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History of India
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19वीं शताब्दी के दौरान भारत में हुए सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों और उनके वैचारिक तथा संस्थागत विकास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'ब्रह्म समाज' ने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद और पैतृक पुरोहितवाद का कड़ा विरोध करते हुए एकेश्वरवाद पर बल दिया, तथा देवेंद्रनाथ ठाकुर के नेतृत्व में इसे और अधिक संगठित रूप प्रदान करते हुए 'तत्वबोधिनी सभा' का इसमें विलय कर दिया गया।
- 2. प्रार्थना समाज (1867) की स्थापना आत्माराम पांडुरंग ने बॉम्बे में की थी, जिसे महादेव गोविंद रानाडे और आर.जी. भंडारकर जैसे विद्वानों का समर्थन प्राप्त हुआ, और इसने मुख्य रूप से अंतर-जातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह तथा महिला शिक्षा को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित किया।
- 3. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा 1875 में स्थापित 'आर्य समाज' ने 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया तथा पाखंड खंडनी पताका के माध्यम से रूढ़िवादी हिंदू मान्यताओं का खंडन करते हुए 'शुद्धि आंदोलन' की शुरुआत की, जिससे धर्मान्तरित हिंदुओं की स्वधर्म में वापसी का मार्ग प्रशस्त हुआ।
- 4. साधारण ब्रह्म समाज की स्थापना 1878 में आनंदमोहन बोस, शिवनाथ शास्त्री और द्विजनाथ गांगुली द्वारा केशव चंद्र सेन की अल्पायु पुत्री के कूचबिहार के राजा के साथ विवाह जैसे मुद्दों और ब्रह्म समाज में बढ़ती निरंकुशता के विरोधस्वरूप की गई थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
19वीं शताब्दी का सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय था। कथन 1 गलत है क्योंकि देवेंद्रनाथ ठाकुर की 'तत्वबोधिनी सभा' (स्थापित 1839) ने ब्रह्म समाज के विचारों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका अवश्य निभाई और बाद में देवेंद्रनाथ ठाकुर स्वयं ब्रह्म समाज से जुड़े, लेकिन तत्वबोधिनी सभा का ब्रह्म समाज में पूर्ण विलय जैसी कोई आधिकारिक घटना नहीं हुई थी, बल्कि दोनों स्वतंत्र अस्तित्व के साथ कार्य करते रहे। इसके अलावा, राजा राममोहन राय की मृत्यु के बाद ब्रह्म समाज में वैचारिक मतभेद भी उभरे थे। कथन 2, 3 और 4 पूरी तरह सही हैं। प्रार्थना समाज की स्थापना बंबई में आत्माराम पांडुरंग ने एम.जी. रानाडे के सहयोग से की थी। स्वामी दयानंद सरस्वती ने वेदों को सर्वोच्च प्रामाणिक माना और शुद्धि आंदोलन चलाया। केशव चंद्र सेन की रूढ़िवादी नीतियों (जैसे अल्पायु विवाह) के विरोध में आनंदमोहन बोस और शिवनाथ शास्त्री ने 'साधारण ब्रह्म समाज' की स्थापना की थी। अधिक जानकारी के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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वर्ष 1857 के विद्रोह के उपरांत ब्रिटिश क्राउन द्वारा लाए गए 'भारत सरकार अधिनियम 1858' और क्वीन विक्टोरिया की ऐतिहासिक घोषणा के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस अधिनियम के तहत भारत का शासन सीधे ब्रिटिश महारानी के नियंत्रण में आ गया, और 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' तथा 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' की दोहरी शासन प्रणाली को समाप्त कर समस्त शक्तियाँ 'भारत के राज्य सचिव' (Secretary of State for India) और उसकी सहायता के लिए गठित पंद्रह सदस्यीय 'इंडियन काउंसिल' को सौंप दी गईं।
2. इलाहाबाद में आयोजित एक भव्य दरबार में लॉर्ड कैनिंग द्वारा पढ़ी गई क्वीन विक्टोरिया की घोषणा में यह स्पष्ट किया गया कि ब्रिटिश सरकार अब भारतीय रियाسतों को हड़पने की अपनी पुरानी विस्तारवादी नीतियों (जैसे 'व्यपगत सिद्धांत' या Doctrine of Lapse) को त्यागती है और देसी राजाओं के दत्तक पुत्र लेने के अधिकारों को मान्यता देती है।
3. घोषणा पत्र में यह आश्वासन दिया गया कि भारत के लोगों की प्राचीन धार्मिक और सामाजिक परंपराओं में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा, तथा नस्ल, वंश या धर्म के भेदभाव के बिना सभी योग्य भारतीयों को उनकी पात्रता के आधार पर उच्च सरकारी सेवाओं में निष्पक्ष रूप से नियुक्त किया जाएगा।
4. विद्रोह के दौरान अवध के तालुकदारों और बड़े भूस्वामियों द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध अत्यधिक मुखर प्रतिरोध किए जाने के कारण, ब्रिटिश सरकार ने दंडात्मक कार्रवाई करते हुए अवध की समस्त भूमि को हमेशा के लिए जब्त कर लिया और वहाँ कभी भी जमींदारी या तालुकदारी व्यवस्था बहाल नहीं की।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1905 के बंगाल विभाजन और तदुपरांत आरंभ हुए स्वदेशी आंदोलन के वैचारिक एवं रणनीतिक आयामों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बंगाल विभाजन के निर्णय की घोषणा सर्वप्रथम जुलाई 1905 में की गई थी, और इसके विरोध में 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल में ऐतिहासिक बैठक हुई, जहाँ औपचारिक रूप से 'स्वदेशी आंदोलन' का प्रस्ताव पारित किया गया तथा ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान किया गया।
2. 16 अक्टूबर 1905 को जिस दिन बंगाल विभाजन प्रभावी हुआ, उस दिन को पूरे बंगाल में 'शोक दिवस' के रूप में मनाया गया, लोगों ने उपवास रखा, एक-दूसरे की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधे और रवींद्रनाथ ठाकुर के आह्वान पर प्रसिद्ध गीत 'मारार सोनार बांग्ला' गाया गया जो बाद में बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना।
3. स्वदेशी आंदोलन के दौरान बंगाल के पारंपरिक मेलों, विशेषकर पुण्यो और चरक मेलों का उपयोग राजनीतिक प्रचार और जन-जागरण के माध्यम के रूप में किया गया, तथा अश्विनी कुमार दत्त द्वारा गठित 'स्वदेश बांधव समिति' ने इस आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान दिल्ली में विद्रोही सिपाहियों द्वारा मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को भारत का सम्राट घोषित किए जाने और उनके नेतृत्व की वास्तविक राजनीतिक व सैन्य वास्तविकताओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मेरठ के विद्रोही सिपाहियों द्वारा दिल्ली पहुँचने पर बहादुर शाह जफर ने तुरंत उत्साहपूर्वक इस विद्रोह का नेतृत्व स्वीकार कर लिया था और वे स्वयं विद्रोही सेना के सक्रिय व सर्वोच्च सैन्य रणनीतिकार के रूप में युद्ध के मैदान में डटे रहे थे।
2. सम्राट बहादुर शाह जफर की आयु अत्यधिक होने और उनकी अनचाही संलिप्तता के कारण दिल्ली का वास्तविक सैन्य नियंत्रण 'कोर्ट ऑफ सोल्जर्स' (सैनिकों की अदालत) के हाथों में था, जिसमें विभिन्न रेजीममेंट्स से आए निर्वाचित सिपाही प्रशासनिक और सैन्य निर्णय लेते थे।
3. बख्त खान के नेतृत्व में बरेली से आए विद्रोही सैनिकों ने दिल्ली आकर मुगल दरबार और सैन्य व्यवस्था को पुनर्गठित करने का प्रयास किया, किंतु ब्रिटिश सेना द्वारा सितंबर 1857 में दिल्ली पर पुनः अधिकार कर लिए जाने के बाद जफर को हुमायूं के मकबरे से गिरफ्तार कर रंगून निर्वासित कर दिया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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अकबर के काल में "चाचर" भूमि किसे कहा जाता था?
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारंभिक चरण (नरम दल काल) और उसके उपरांत उत्पन्न हुए उग्रवादी (गरम दल) राष्ट्रवाद के वैचारिक संघर्ष एवं कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. नरमपंथी नेताओं (जैसे दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और गोपाल कृष्ण गोखले) की राजनीतिक विचारधारा 'राजनीतिक भिक्षावृत्ति' (Political Mendicancy) पर आधारित थी, जो ब्रिटिश न्यायप्रियता में अटूट विश्वास रखते थे और 'प्रार्थना, याचिका और विरोध' (Prayer, Petition and Protest) की त्रिविध पद्धति का समर्थन करते थे।
2. वर्ष 1905 के बंगाल विभाजन के पश्चात उग्रवादी नेताओं (लाल-बाल-पाल और अरबिंदो घोष) ने कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों में 'स्वदेशी', 'बहिष्कार', 'राष्ट्रीय शिक्षा' और 'स्वराज' के प्रस्तावों को शामिल करने का पुरजोर दबाव बनाया, जिसे नरमपंथियों ने बिना किसी वैचारिक मतभेद के तुरंत स्वीकार कर लिया था।
3. वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का विभाजन अनिवार्य हो गया, जिसका तात्कालिक कारण उग्रवादियों द्वारा रास बिहारी घोष को कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में चुने जाने का तीव्र विरोध करना था, क्योंकि उग्रवादी दल लाला लाजपत राय या बाल गंगाधर तिलक को अध्यक्ष बनाना चाहता था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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