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History of India
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19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों और उनके संस्थापकों तथा वैचारिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'ब्रह्म समाज' ने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद और पुरोहितवाद का कड़ा विरोध करते हुए एकेश्वरवाद और उपनिषदों की तार्किकता पर बल दिया, तथा वर्ष 1866 में केशव चंद्र सेन के नेतृत्व में ब्रह्म समाज के विभाजन के बाद 'साधारण ब्रह्म समाज' की स्थापना हुई जिसने बाल विवाह के विरुद्ध कानून बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  2. 2. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा वर्ष 1875 में स्थापित 'आर्य समाज' ने 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया और वेदों को अपौरुषेय मानते हुए मूर्तिपूजा, अवतारवाद, श्राद्ध और जन्म आधारित जाति व्यवस्था का कड़ा विरोध किया।
  3. 3. ज्योतिराव फुले ने वर्ष 1873 में 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य शूद्रों और अति-शूद्रों को वैचारिक रूप से ब्राह्मणवादी वर्चस्व और धार्मिक रूढ़ियों से मुक्त कराना था, तथा उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'गुलामगिरी' में इस विचारधारा का स्पष्ट दस्तावेज मिलता है।
  4. 4. प्रार्थना समाज की स्थापना आत्माराम पांडुरंग ने वर्ष 1867 में बॉम्बे में की थी, जिसे एम.जी. रानाडे और आर.जी. भंडारकर जैसे विद्वानों का सक्रिय सहयोग प्राप्त हुआ, और इसका मुख्य ध्यान अंतरजातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह और स्त्री शिक्षा जैसे सामाजिक सुधारों पर था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि केशव चंद्र सेन के नेतृत्व में विभाजन के बाद 'साधारण ब्रह्म समाज' की स्थापना आनंद मोहन बोस और शिवनाथ शास्त्री आदि द्वारा 1878 में की गई थी, जबकि केशव चंद्र सेन ने 'भारतीय ब्रह्म समाज' (Brahmo Samaj of India) की स्थापना की थी। राजा राममोहन राय के सुधारवादी प्रयासों और ब्रह्म समाज के इतिहास के बारे में अधिक जानने के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं। कथन 2, 3 और 4 बिल्कुल सही हैं; स्वामी दयानंद सरस्वती ने जन्म आधारित जाति व्यवस्था और मूर्तिपूजा का विरोध किया, ज्योतिराव फुले ने 'सत्यशोधक समाज' (1873) की स्थापना कर 'गुलामगिरी' लिखी, और प्रार्थना समाज (1867) ने पश्चिमी भारत में विधवा पुनर्विवाह व स्त्री शिक्षा पर जोर दिया।
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