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History of India
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प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में बौद्ध धर्म और जैन धर्म के दार्शनिक और संस्थागत विकास के निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. बौद्ध धर्म के प्रथम उपदेश (धर्मचक्रप्रवर्तन) के समय संघ की स्थापना सारनाथ में हुई थी, जबकि जैन धर्म में तीर्थंकर महावीर द्वारा जैन संघ की स्थापना पावापुरी में अपने अंतिम समय में की गई थी, जिसके प्रथम प्रमुख (थेर) सुधर्मन बने थे।
  2. 2. बौद्ध संघ की सदस्यता के लिए न्यूनतम आयु सीमा 15 वर्ष निर्धारित की गई थी, जबकि जैन संघ में प्रवेश के लिए ऐसा कोई आयु प्रतिबंध नहीं था और चातुर्यम धर्म (जो पार्श्वनाथ द्वारा दिया गया था) में महावीर ने 'ब्रह्मचर्य' को जोड़कर इसे पंचमहाव्रत बना दिया था।
  3. 3. बौद्ध धर्म के विपरीत जैन धर्म ने 'सद्वाद' (अनेकांतवाद या सप्तभंगीनय) के सिद्धांत को प्रतिपादित किया, जिसके अनुसार किसी भी वस्तु के सत्य का पूर्ण ज्ञान केवल केवलियों को ही हो सकता है, क्योंकि साधारण मनुष्य का ज्ञान सापेक्ष होता है।
  4. 4. बौद्ध संगीति और जैन संगीति दोनों के संदर्भ में, द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन वैशाली में कालाशोक के शासनकाल में हुआ था, जबकि प्रथम जैन संगीति पाटलिपुत्र में स्थूलभद्र की अध्यक्षता में हुई थी, जिसमें जैन ग्रंथों का संकलन कर '12 अंगों' का निर्माण किया गया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि बौद्ध संघ की स्थापना सारनाथ में प्रथम उपदेश के समय नहीं बल्कि धर्मचक्रप्रवर्तन के बाद भिक्षुओं के संगठन के रूप में हुई थी, और जैन संघ की स्थापना पावापुरी में नहीं बल्कि पावा (या राजगृह के निकट) में महावीर के जीवनकाल में ही 11 गणधरों के साथ की गई थी, जिसके अंतिम जीवित गणधर सुधर्मन बने थे। कथन 2, 3 और 4 सही हैं। जैन धर्म में अनेकांतवाद और स्याद्वाद का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है। बौद्ध धर्म के इतिहास के विषय में अधिक जानने के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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