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History of India
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सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान आयोजित गोलमेज सम्मेलनों और 'गांधी-इरविन समझौते' के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. प्रथम गोलमेज सम्मेलन (नवंबर 1930 - जनवरी 1931) में कांग्रेस ने भाग नहीं लिया था, किंतु इस सम्मेलन में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड ने भारत को 'डोमिनियन स्टेटस' (औपनिवेशिक स्वराज्य) प्रदान करने की औपचारिक घोषणा कर दी थी।
  2. 2. 5 मार्च 1931 को हस्ताक्षरित 'गांधी-इरविन समझौता' (दिल्ली समझौता) के तहत सरकार ने उन सभी राजनीतिक कैदियों को तुरंत रिहा करने पर सहमति व्यक्त की थी, जिन पर हिंसा का प्रत्यक्ष आरोप था या जो हत्या के मामलों में सजा काट रहे थे।
  3. 3. द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (सितंबर-दिसंबर 1931) में महात्मा गांधी ने कांग्रेस के एकमात्र आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया था, किंतु यह सम्मेलन मुख्य रूप से सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के विवाद के कारण बिना किसी ठोस निर्णय के समाप्त हो गया।
  4. 4. वर्ष 1932 में लंदन में आयोजित तृतीय गोलमेज सम्मेलन के बहिष्कार के बाद, महात्मा गांधी और कांग्रेस की केंद्रीय कार्य समिति के सदस्यों को बिना मुकदमा चलाए पुनः गिरफ्तार कर लिया गया तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन को नए सिरे से तेज कर दिया गया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि प्रथम गोलमेज सम्मेलन में ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने डोमिनियन स्टेटस की औपचारिक घोषणा नहीं की थी, बल्कि ब्रिटिश सरकार ने भारत के लिए उत्तरदायी शासन और संघ व्यवस्था के सिद्धांतों पर विचार किया था। कथन 2 असत्य है क्योंकि गांधी-इरविन समझौते के तहत केवल उन्हीं राजनीतिक कैदियों को रिहा करने की बात थी जिन पर हिंसा का आरोप *नहीं* था; हत्या या हिंसा में शामिल कैदियों को इस समझौते के दायरे से बाहर रखा गया था। कथन 3 सत्य है, क्योंकि गांधीजी ने कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया था और यह सम्मेलन सांप्रदायिक मुद्दों पर असफल रहा था। कथन 4 सत्य है, क्योंकि तृतीय गोलमेज सम्मेलन (1932) का कांग्रेस ने पूर्ण बहिष्कार किया था और भारत लौटने पर गांधीजी व अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर सविनय अवज्ञा आंदोलन का दूसरा चरण शुरू हुआ था। इस विषय के विस्तृत अध्ययन के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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