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History of India
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वैदिक सभ्यता और वैदिक साहित्य के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. ऋग्वैदिक काल में 'दुहितृ' शब्द का प्रयोग उस पुत्री के लिए किया जाता था जो गायों का दुग्ध दोहन करती थी, तथा इस समाज में सभा और समिति नामक संस्थाओं में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी का उल्लेख मिलता है।
- 2. उत्तर वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था का आधार मुख्य रूप से जन्म पर आधारित हो गया था, तथा शतपथ ब्राह्मण में कृषि की विभिन्न प्रक्रियाओं (जैसे जुताई, बुआई, कटाई और मड़ाई) का विस्तृत कर्मकांडीय वर्णन मिलता है।
- 3. ऋग्वैदिक नदियों में 'क्रूमू' और 'कुभा' नदियाँ आधुनिक अफगानिस्तान के क्षेत्र में स्थित थीं, जबकि 'परुष्णी' नदी के तट पर दस राजाओं का प्रसिद्ध युद्ध (दाशराज युद्ध) लड़ा गया था।
- 4. वैदिक साहित्य के अंतर्गत आरण्यकों को 'रहस्य पुस्तक' भी कहा जाता है, जिनकी रचना मुख्य रूप से वनों में एकांत में चिंतन करने वाले मुनियों और तपस्वियों द्वारा की गई थी, और ये उपनिषदों के दार्शनिक विचारों के आधार हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
दिए गए सभी कथन पूर्णतः सत्य हैं। ऋग्वैदिक काल में 'दुहितृ' का शाब्दिक अर्थ गाय दूहने वाली होता था। इस काल में सभा और समिति राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण थीं, जिनमें महिलाओं (जैसे अपला, घोषा) को भाग लेने की स्वतंत्रता थी। उत्तर वैदिक काल तक आते-आते वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित हो गई थी और शतपथ ब्राह्मण में कृषि कर्मों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। ऋग्वैदिककालीन नदियाँ जैसे कुभा (काबुल), क्रूमू (कुर्रम) और परुष्णी (रावी) का ऐतिहासिक भूगोल स्पष्ट है। इसके अलावा, विकिपीडिया संदर्भ के अनुसार आरण्यक वैदिक साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं जिन्हें जंगल की पुस्तकें कहा जाता है।
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मध्यकालीन भारत के इतिहास में भक्ति और सूफी आंदोलनों के प्रसार, उनके दार्शनिक आधार और प्रमुख संतों के वैचारिक दृष्टिकोण के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. दक्षिण भारत के अलवार (विष्णु भक्त) और नयनार (शिव भक्त) संतों ने भक्ति आंदोलन की नींव रखी थी, जिन्होंने अपनी लोक-भाषा (तमिल) के प्रयोग के माध्यम से जातिगत भेदभाव का कड़ा विरोध करते हुए भक्ति को जन-सामान्य तक पहुँचाया था, तथा उनके पदों का संकलन 'नालयिर दिव्य प्रबंधम' में किया गया है।
2. उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन को प्रसारित करने वाले रामानंद ने जातिगत और वर्गीय सीमाओं को अस्वीकार करते हुए राम की भक्ति का उपदेश दिया, तथा उनके शिष्यों में रैदास (जूता बनाने वाले), सेना (नाई) और कबीर (जुलाहा) जैसे समाज के विभिन्न वर्गों से आने वाले संत सम्मिलित थे।
3. सूफी मत के संदर्भ में, भारत में चिश्ती सिलसिला की स्थापना ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने अजमेर में की थी, जिन्होंने राज्य के संरक्षण और शाही दरबार से निकटता को आध्यात्मिक उन्नति के लिए अनिवार्य माना तथा शाहजहाँ के काल में दारा शिकोह इसी सिलसिले से जुड़े थे।
4. महान दार्शनिक शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित 'अद्वैत वेदांत' के विपरीत, वल्लभाचार्य ने 'शुद्धैद्वैत' का सिद्धांत दिया, जिसके अंतर्गत भगवान कृष्ण की भक्ति पर बल देते हुए 'पुष्टिमार्ग' की स्थापना की गई थी, जो विशुद्ध रूप से भक्ति और भगवत्कृपा पर आधारित था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में वर्धन राजवंश एवं दक्षिण भारत के राजवंशों (चोल, पल्लव, चालुक्य) की राजनीतिक, प्रशासनिक तथा सांस्कृतिक प्रणालियों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पल्लव राजा नरसिंहवर्मन प्रथम (महामल्ल) ने वातापी के चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय को पराजित करके 'वातापीकोंड' की उपाधि धारण की थी तथा महाबलीपुरम (मामलपुरम) में एकश्म रथ मंदिरों (रथ मंदिरों) का निर्माण करवाया था।
2. बादामी के चालुक्य राजवंश के शासक पुलकेशिन द्वितीय के 'ऐहोले शिलालेख' (जिसे रवि कीर्ति ने संस्कृत में लिखा है) में नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्धन पर उसकी ऐतिहासिक विजय का विस्तृत उल्लेख मिलता है, जिससे वर्धन-चालुक्य संघर्ष की पुष्टि होती है।
3. चोल साम्राज्य की स्थानीय स्वशासन प्रणाली (विशेषकर उत्तरमेरूर शिलालेखों में वर्णित सभा और वारियम व्यवस्था) अत्यंत उन्नत थी, जिसके तहत ग्राम प्रशासन के विभिन्न कार्यों के लिए लॉटरी पद्धति (कुरावै) द्वारा सदस्यों का चयन किया जाता था।
4. हर्ष के शासनकाल में कन्नौज की सभा और प्रयाग (महासम्मेलन) का बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय के प्रचार-प्रसार के लिए आयोजन किया गया था, जिसमें चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भाग लिया था, किंतु हर्ष के सिक्कों पर केवल बौद्ध प्रतीकों का ही अंकन मिलता है और शैव तथा सूर्य पूजा का कोई साक्ष्य नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रथम चरण, गांधी-इरविन समझौते और कराची अधिवेशन (1931) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मार्च 1931 में संपन्न गांधी-इरविन समझौते के तहत ब्रिटिश सरकार ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान हिंसा के आरोपियों को छोड़कर सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने और जब्त की गई संपत्ति को वापस करने की शर्त स्वीकार की थी, किंतु भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी की सजा को माफ करने की गांधीजी की मांग को औपचारिक रूप से अस्वीकार कर दिया गया था।
2. मार्च 1931 में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कराची अधिवेशन की अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की थी, इसी अधिवेशन में कांग्रेस ने गांधी-इरविन समझौते का समर्थन किया और पहली बार 'मौलिक अधिकार तथा राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम' पर ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया।
3. गांधी-इरविन समझौते की शर्तों के अनुसार कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को तत्काल प्रभाव से स्थगित कर दिया और महात्मा गांधी ने कांग्रेस के एकमात्र आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में लंदन में आयोजित प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने की स्वीकृति दी थी।
4. कराची अधिवेशन में ही युवा राष्ट्रवादियों के भारी विरोध के बावजूद महात्मा गांधी ने कहा था कि "गांधी मर सकता है, परंतु गांधीवाद हमेशा जीवित रहेगा," और उन्होंने पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव को त्यागकर डोमिनियन स्टेटस के लक्ष्य को स्वीकार कर लिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्धन राजवंश एवं दक्षिण भारत के राजवंशों (चोल, पल्लव, चालुक्य) की राजनीतिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पल्लव शासक महेंद्रवमन् प्रथम ने अपने प्रारंभिक जीवन में जैन धर्म का अनुयायी होने के बाद, तमिल संत अप्पर (थिरुनुवुक्करासर) के प्रभाव से शैव धर्म अपना लिया था, तथा महाबलीपुरम में प्रसिद्ध एकश्म 'रथ मंदिरों' (मंडप और रथ) के निर्माण की शुरुआत उसी के काल में हुई थी।
2. बादामी के चालुक्य वंश के महान शासक पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्धन की उत्तर भारत की विजय यात्रा को रोककर उसे पराजित किया था, और इस ऐतिहासिक घटना का विस्तृत उल्लेख हमें एहोल शिलालेख में मिलता है, जिसकी रचना रविचर्ति ने की थी।
3. चोल राजवंश की सुदृढ़ स्थानीय स्वशासन प्रणाली, विशेष रूप से 'उत्तरमेरूर शिलालेख' (Uttiramerur Inscriptions), में ग्राम सभाओं (कुडम) के गठन, सदस्यों की योग्यता, अयोग्यता और पर्ची प्रणाली (कुरावोलै पद्धति) के माध्यम से चुनाव प्रक्रिया का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है।
4. वर्धन वंश के शासक हर्षवर्धन के शासनकाल में चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत आया था, जिसने कन्नौज की भव्य धर्मसभा और प्रयागराज की महामोक्ष परिषद का अपनी यात्रा वृत्तांत 'सी-यु-की' में सजीव वर्णन किया है, तथा हर्षवर्धन ने स्वयं 'रत्नावली', 'प्रियदर्शिका' और 'नागानंद' जैसे नाटकों की रचना की थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. डलहौजी द्वारा लागू 'व्यपगत सिद्धांत' (Doctrine of Lapse) के अंतर्गत सतारा, नागपुर और झाँसी जैसी रियासतों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय किया गया, जिससे पारंपरिक भारतीय शासक वर्ग और शाही परिवारों में गहरी असुरक्षा और आक्रोश पैदा हुआ।
2. ब्रिटिश सरकार द्वारा 1850 में पारित 'लेक्स लोकी अधिनियम' (Lex Loci Act या धार्मिक असुविधा अधिनियम) ने हिंदू धर्म से ईसाई धर्म में परिवर्तित होने वाले व्यक्तियों को उनके पैतृक संपत्ति के अधिकारों से वंचित कर दिया, जिससे पारंपरिक भारतीय समाज में भारी धार्मिक असंतोष फैला।
3. ब्रिटिश आर्थिक नीतियों और मुक्त व्यापार के एकतरफा प्रवाह के कारण पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प और सूती वस्त्र उद्योग तबाह हो गए, जिससे ग्रामीण कर्जदारी में भारी वृद्धि हुई और कारीगरों तथा किसानों का यह आक्रोश 1857 के विद्रोह के रूप में प्रकट हुआ।
4. सेना के भीतर लागू किए जाने वाले नियमों, जैसे वर्ष 1856 का 'सामान्य सेवा उपनयन अधिनियम' (General Service Enlistment Act) जिसके तहत नए भारतीय सैनिकों को समुद्र पार ब्रिटिश सीमाओं से बाहर भी सेवा देने के लिए बाध्य किया गया, ने उच्च जातीय हिंदू सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को गंभीर रूप से आहत किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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