BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

History of India
20 views

19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उभरे सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों और उनके संस्थापकों तथा संगठनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. केशव चंद्र सेन के ब्रह्म समाज से अलग होने के पश्चात वर्ष 1866 में उनके द्वारा 'भारतीय ब्रह्म समाज' (Bharatiya Brahmo Samaj) की स्थापना की गई थी, जबकि मूल ब्रह्म समाज का नेतृत्व देवेंद्रनाथ टैगोर के पास 'आदि ब्रह्म समाज' के रूप में रहा।
  2. 2. वर्ष 1867 में बंबई में आत्माराम पांडुरंग द्वारा स्थापित 'प्रार्थना समाज' ने धार्मिक सुधारों की तुलना में सामाजिक सुधारों (विशेषकर अंतर-जातीय विवाह और स्त्री शिक्षा) पर अधिक बल दिया, जिससे महादेव गोविंद रानाडे और आर.जी. भंडारकर जैसे विद्वान जुड़े थे।
  3. 3. स्वामी विवेकानंद ने वर्ष 1897 में 'रामकृष्ण मिशन' की स्थापना की थी, जिसका मुख्य उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठानों का प्रसार करना था, तथा इसने वेदों की अचूकता और रूढ़िवादी हिंदू संस्कारों को पुनर्जीवित करने पर ही अपना संपूर्ण ध्यान केंद्रित किया।
  4. 4. सत्यशोधक समाज की स्थापना ज्योतिराव फुले द्वारा 1873 में की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य शूद्रों और अति-शूद्रों को ब्राह्मणवादी वर्चस्व और रूढ़िवादिता से मुक्त कराना तथा उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1, 2 और 4 सही हैं। केशव चंद्र सेन के उदारवादी और आधुनिक विचारों तथा बाल विवाह के मुद्दे पर मतभेदों के कारण 1866 में ब्रह्म समाज में विभाजन हो गया था, जिसके परिणामस्वरूप केशव चंद्र सेन ने 'भारतीय ब्रह्म समाज' की स्थापना की और देवेंद्रनाथ टैगोर ने 'आदि ब्रह्म समाज' का नेतृत्व किया। प्रार्थना समाज (1867) की स्थापना आत्माराम पांडुरंग ने की थी और इसमें एम.जी. रानाडे के जुड़ने से सामाजिक सुधारों को गति मिली। ज्योतिराव फुले ने 1873 में 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की। कथन 3 गलत है क्योंकि स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन का उद्देश्य केवल धार्मिक कर्मकांडों का प्रसार करना नहीं था, बल्कि यह मानव सेवा, वेदांत के व्यावहारिक स्वरूप और सामाजिक कल्याण के कार्यों पर केंद्रित था। इस आंदोलन के ऐतिहासिक और वैचारिक विकास के बारे में अधिक जानने के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Share:

Related Questions

→ गुप्तकालीन प्रशासन, आर्थिक व्यवस्था और समाज के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. गुप्त काल में 'भूमि अनुदान' (Land Grants) की प्रथा अपने चरमोत्कर्ष पर थी, जिसमें राजाओं द्वारा ब्राह्मणों और अधिकारियों को दिए जाने वाले भू-दान को 'अग्रहार' या 'ब्रह्मदेय' कहा जाता था, और इन अनुदानों के साथ भूमि पर कृषकों के अधिकारों का हस्तांतरण भी हो जाता था जिससे सामंती व्यवस्था के बीज पड़े। 2. गुप्त सम्राटों ने इतिहास में सबसे बड़ी मात्रा में शुद्ध स्वर्ण मुद्राएं (जिन्हें 'दीनघ' या 'दीनार' कहा जाता था) जारी की थीं, किंतु कुषाणों की तुलना में गुप्त स्वर्ण मुद्राओं में सोने की शुद्धता (धात्विक मान) का स्तर निरंतर गिरता चला गया और अंतिम गुप्त शासकों के सिक्कों में तांबे की मिलावट सबसे अधिक हो गई थी। 3. गुप्तकालीन राजस्व प्रणाली में 'उद्रङ्ग' एक प्रकार का कर था जो स्थायी कृषकों से लिया जाने वाला भू-कर था, जबकि 'उपरिकर' एक अस्थायी कृषकों या बटाईदारों पर लगाया जाने वाला अतिरिक्त कर था। 4. गुप्त काल में रेशम बुनकरों की एक शक्तिशाली श्रेणी (गिल्ड) का उल्लेख मंदसौर शिलालेख में मिलता है, जो लाट क्षेत्र से आकर मालवा में बस गई थी और अपनी शिल्पकला के साथ-साथ सूर्य मंदिर के निर्माण में वित्तीय सहयोग देने के लिए विख्यात थी। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → औरंगजेब के समय में किस हिंदू राजा ने "शिवाजी महाराज" और मुगलों के बीच "पुरंदर की संधि" करवाई थी? → 19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के संदर्भ में, सत्यशोधक समाज, देव समाज और धर्म सभा जैसी संस्थाओं के वैचारिक दृष्टिकोण एवं संस्थापकों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. ज्योतिराव फुले द्वारा वर्ष 1873 में स्थापित 'सत्यशोधक समाज' का मुख्य उद्देश्य शूद्रों और अतिशूद्रों को ब्राह्मणवादी वर्चस्व, धार्मिक पाखंडों और पुरोहिती शोषण से मुक्त कराना था, तथा इस संगठन ने अपनी मुखपत्र 'गुलामगिरी' के माध्यम से समाज के वंचित वर्गों में अधिकारों की चेतना जगाई। 2. वर्ष 1887 में लाहौर में शिव नारायण अग्निहोत्री द्वारा स्थापित 'देव समाज' का मूल बल आत्मा की अमरता, गुरु की सर्वोच्चता और उच्च नैतिक आचरण पर था, तथा इसने मांसाहार, मद्यपान और रिश्वतखोरी जैसी बुराइयों का कड़ा विरोध किया। 3. राधाकांत देव द्वारा वर्ष 1830 में स्थापित 'धर्म सभा' एक रूढ़िवादी संस्था थी, जिसने राजा राममोहन राय द्वारा ब्रह्म समाज के माध्यम से सती प्रथा के उन्मूलन के लिए चलाए गए सुधारों का समर्थन किया था, किंतु आधुनिक पश्चिमी शिक्षा के प्रसार का पुरजोर विरोध किया था। 4. गोपाल गणेश आगरकर और महादेव गोविंद रानाडे द्वारा स्थापित 'डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी' ने महाराष्ट्र में शिक्षा के प्रसार और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में कार्य किया, तथा आगरकर ने 'सुधारक' पत्र के माध्यम से सामाजिक रूढ़िवादिता और धार्मिक अंधविश्वासों पर तीखे प्रहार किए। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → किस मराठा सरदार ने 1794 ई. में अपनी मृत्यु तक उत्तर भारत में मराठा प्रभाव को बनाए रखा और मुग़ल सम्राट को संरक्षण दिया? → वर्ष 1857 के विद्रोह की असफलता और इसके नेतृत्व की संरचनात्मक कमियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इस ऐतिहासिक विद्रोह के पास अखिल भारतीय स्तर पर कोई सर्वमान्य, दूरदर्शी और केन्द्रीकृत राजनीतिक नेतृत्व का अभाव था, जिसके कारण विभिन्न क्षेत्रों के नेता अपने संकीर्ण व स्थानीय हितों से ऊपर उठकर अंग्रेजों के विरुद्ध एक एकीकृत दीर्घकालिक राष्ट्रीय रणनीति तैयार करने में असफल रहे। 2. दिल्ली के प्रतीकात्मक सम्राट बनाए गए बहादुर शाह ज़फ़र के पास न तो कोई वास्तविक सैन्य अधिकार था और न ही विद्रोही सैनिकों के मध्य अनुशासन बनाए रखने की क्षमता, जिससे यह नेतृत्व केवल नाममात्र का साबित हुआ। 3. आधुनिक शिक्षित मध्यम वर्ग, व्यापारियों और पश्चिमी शिक्षा से लाभान्वित भारतीय बुद्धिजीवियों ने इस विद्रोह का पुरजोर समर्थन किया और इसे ब्रिटिश साम्राज्यवादी नीतियों के विरुद्ध एक आधुनिक लोकतांत्रिक जन-क्रांति में परिवर्तित कर दिया। 4. अधिकांश बड़े भारतीय नरेशों और रियासतों (जैसे सिंधिया, होलकर और हैदराबाद के निजाम) ने विद्रोहियों का साथ देने के बजाय ब्रिटिश सत्ता के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी, जिससे अंग्रेजों को इस बगावत को कुचलने में भारी सामरिक सहायता मिली। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.