त्वरित लिंक्स
History of India
13 views
भारत छोड़ो आंदोलन (1942) तथा सुभाष चंद्र बोस एवं आजाद हिंद फौज से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बंबई में कांग्रेस की भूमिगत गतिविधियों का संचालन करने वालों में उषा मेहता प्रमुख थीं, जिन्होंने गुप्त रूप से 'कांग्रेस रेडियो' (Congress Radio) का प्रसारण कर ब्रिटिश दमन की खबरों को देश-विदेश तक पहुँचाया था।
- 2. सुभाष चंद्र बोस ने 1941 में ब्रिटिश नजरबंदी से मुक्ति पाकर 'ग्रेट एस्केप' के तहत पेशावर और काबुल के रास्ते जर्मनी की यात्रा की, जहाँ उन्होंने बर्लिन में 'फ्री इंडिया सेंटर' की स्थापना की और 'फ्री इंडिया लीजन' का गठन किया।
- 3. सिंगापुर में रास बिहारी बोस द्वारा स्थापित 'इंडियन इंडिपेंडेंस लीग' और 'आजाद हिंद फौज' की कमान अक्टूबर 1943 में सुभाष चंद्र बोस को सौंपी गई, जिसके तुरंत बाद उन्होंने सिंगापुर में 'अस्थायी आजाद हिंद सरकार' (Arzi Hukumat-e-Azad Hind) की घोषणा की।
- 4. आजाद हिंद फौज के सैनिकों ने जापानी सेना के सहयोग से मार्च 1944 में असम के सिलचर और गुवाहाटी शहरों पर अधिकार कर लिया था, जहाँ उन्होंने स्वतंत्र भारत की पहली स्थानीय सरकार का गठन किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1, 2 और 3 सत्य हैं। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उषा मेहता ने बंबई से गुप्त 'कांग्रेस रेडियो' का संचालन किया था। सुभाष चंद्र बोस ने 1941 के 'ग्रेट एस्केप' के माध्यम से जर्मनी पहुंचकर 'फ्री इंडिया सेंटर' और 'फ्री इंडिया लीजन' की स्थापना की थी। अक्टूबर 1943 में सिंगापुर में उन्होंने 'अस्थायी आजाद हिंद सरकार' का गठन किया। किंतु कथन 4 असत्य है क्योंकि INA और जापानी सेना मार्च 1944 में असम के सिलचर या गुवाहाटी तक नहीं पहुँच पाई थी, बल्कि उन्होंने मणिपुर के मोइरांग क्षेत्र में तिरंगा फहराया था। इस विषय के विस्तृत अध्ययन के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Related Questions
→
विजयनगर साम्राज्य का राजकीय चिन्ह (Royal Seal) क्या था?
→
वर्ष 1857 के महान विद्रोह की विफलता और उसके नेतृत्व की कमियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 1857 के विद्रोह के समय अधिकांश देशी रियासतों के शासकों, बड़े जमींदारों और साहूकारों ने ब्रिटिश सत्ता के प्रति वफादारी दिखाई या प्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजों का सहयोग किया, जिससे विद्रोही सेनाओं को अखिल भारतीय स्तर पर कोई संगठित वित्तीय या राजनीतिक आश्रय नहीं मिल सका।
2. दिल्ली के मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को विद्रोहियों द्वारा भारत का औपचारिक सम्राट घोषित तो किया गया था, किंतु उनकी अत्यधिक वृद्धावस्था, सैन्य नेतृत्व की अक्षमता और आपसी गुटबाजी के कारण वे विभिन्न क्षेत्रों से आए विद्रोही सैनिकों के बीच आवश्यक सामरिक समन्वय स्थापित करने में पूरी तरह असफल रहे।
3. आधुनिक सैन्य उपकरणों, रेलवे, टेलीग्राफ और प्रशासनिक दक्षता से लैस ब्रिटिश सेना के मुकाबले भारतीय विद्रोहियों के पास न तो कोई केंद्रीयकृत योजना थी और न ही कोई एकीकृत सैन्य कमान, जिसके कारण वे लंबी अवधि के युद्ध में टिक नहीं सके।
4. विद्रोह के दौरान अधिकांश आधुनिक शिक्षित मध्यम वर्ग, व्यापारियों और पश्चिमी शिक्षा प्राप्त बुद्धिजीवियों ने क्रांतिकारियों की खुलकर आर्थिक और वैचारिक सहायता की, क्योंकि वे अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों से पूरी तरह संतुष्ट थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
मुगल काल में "सराफ" (Saraf) किन्हें कहा जाता था जो मुद्रा के विनिमय और बैंकिंग का कार्य करते थे?
→
ब्रिटिश भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों (स्थाई बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. स्थाई बंदोबस्त (Permanent Settlement) प्रणाली को लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लागू किया गया था, जिसके अंतर्गत जमींदारों को भूमि का वास्तविक स्वामी मान लिया गया और कुल लगaन का 10/11 भाग ब्रिटिश सरकार को तथा 1/1 भाग जमींदारों को अपने प्रशासनिक व्यय के लिए रखने की अनुमति दी गई।
2. रयतवारी व्यवस्था मुख्य रूप से मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसी में लागू की गई थी, जहाँ किसानों (रयतों) को भूमि का मालिक माना गया और सरकार के साथ उनका सीधा भू-राजस्व समझौता हुआ, जिसमें लगान की दरें पूरी तरह स्थाई थीं और कभी संशोधित नहीं की जाती थीं।
3. महालवारी व्यवस्था को उत्तर-पश्चिम प्रांत, मध्य भारत और पंजाब के कुछ हिस्सों में लागू किया गया था, जिसमें भू-राजस्व निर्धारण के लिए व्यक्तिगत किसानों के स्थान पर पूरे गाँव (महाल) को इकाई माना गया और सामूहिक रूप से गाँव के मुखिया या लंबरदार को राजस्व चुकाने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
4. इन तीनों भू-राजस्व प्रणालियों का दीर्घकालिक प्रभाव यह हुआ कि भारत का पारंपरिक कृषि ढांचा छिन्न-भिन्न हो गया, ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अत्यधिक कर का बोझ बढ़ा, और कृषि का तेजी से वाणिज्यीकरण होने के बावजूद किसानों की क्रय शक्ति में भारी गिरावट आई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'ब्रह्म समाज' ने एकेश्वरवाद और उपनिषदों की शिक्षाओं पर विशेष बल देते हुए मूर्तिपूजा, बहुदेववाद तथा सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं का पुरजोर विरोध किया, परंतु उन्होंने पाश्चात्य आधुनिक शिक्षा और विज्ञान के प्रसार का विरोध करते हुए केवल पारंपरिक संस्कृत शिक्षा का समर्थन किया था।
2. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा 1875 में स्थापित 'आर्य समाज' ने 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया और वेदों को 'अपौरुषेय' तथा ज्ञान का अचूक भंडार मानते हुए जन्मजात जाति व्यवस्था और बहुदेववाद को अस्वीकार किया।
3. वर्ष 1867 में बंबई में स्थापित 'प्रार्थना समाज' (जिसके प्रमुख नेताओं में आत्माराम पांडुरंग और महादेव गोविंद रानाडे शामिल थे) का मुख्य उद्देश्य धार्मिक सुधारों के साथ-साथ अंतरजातीय विवाह, स्त्री शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और दलितोद्धार जैसे सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाना था।
4. स्वामी विवेकानंद द्वारा 1897 में स्थापित 'रामकृष्ण मिशन' ने केवल धार्मिक और दार्शनिक पुनरुत्थान पर ध्यान केंद्रित किया, और इसने मानव सेवा को ही सबसे बड़ा धर्म मानते हुए आधुनिक सामाजिक सेवा, शिक्षा प्रसार और राहत कार्यों से पूरी तरह दूरी बनाए रखी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.