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History of India
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मध्यकालीन भारत के भक्ति और सूफी आंदोलनों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. चिश्ती संप्रदाय के संतों ने सुल्तानों और शासकों द्वारा दिए जाने वाले राजकीय अनुदानों (मदद-ए-माश) और जागीरों को स्वीकार करने से स्पष्ट इंकार कर दिया था, तथा वे सादा जीवन व्यतीत करते हुए 'समां' (संगीत गोष्ठियों) को ईश्वर प्राप्ति का माध्यम मानते थे।
- 2. वारकरी संप्रदाय (जो मुख्य रूप से महाराष्ट्र में फला-फूला) ने कर्मकांड, संस्कृत भाषा की अनिवार्यता और जटिल अनुष्ठानों का विरोध करते हुए मराठी भाषा में भक्ति पदों (अभंगों) के माध्यम से लोक-कल्याण का संदेश दिया, और इस संप्रदाय के प्रमुख संतों में ज्ञानेश्वर, नामदेव और तुकाराम शामिल थे।
- 3. विशिष्टाद्वैतवाद के प्रवर्तक आचार्य रामानुजाचार्य ने यह प्रतिपादित किया कि जीव और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है तथा जगत पूरी तरह से एक मिथ्या (माया) है, जिसके कारण मोक्ष की प्राप्ति केवल और केवल ज्ञान मार्ग (ज्ञान योग) के माध्यम से ही संभव है।
- 4. उत्तर भारत में रामभक्ति शाखा के प्रमुख संत तुलसीदास ने अकबर के समकालीन होते हुए भी उसके दरबार से कोई प्रत्यक्ष संबंध या राजकीय सहायता स्वीकार नहीं की, तथा उन्होंने 'रामचरितमानस' की रचना अवधी भाषा में करके साधारण जनमानस तक धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों को पहुँचाया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
इस प्रश्न के कथन 1, 2 और 4 सही हैं, जबकि कथन 3 असत्य है। रामानुजाचार्य ने 'विशिष्टाद्वैतवाद' का प्रतिपादन किया था, जिसके अनुसार जीव, जगत और ईश्वर (ब्रह्म) वास्तविक हैं और वे ब्रह्म से जुड़े हुए हैं; उन्होंने अद्वैतवाद की तरह जगत को 'मिथ्या' नहीं माना और मोक्ष के लिए ज्ञान के स्थान पर 'भक्ति' तथा ईश्वर की कृपा को सर्वोपरि बताया। इसके विपरीत, जगत को मिथ्या मानने और ज्ञान मार्ग पर जोर देने का कार्य आदि शंकराचार्य ने 'अद्वैतवाद' के अंतर्गत किया था। चिश्ती संप्रदाय के संतों ने राजकीय सहायता और दरबार से दूरी बनाए रखी, वारकरी संप्रदाय ने भक्ति और अभंगों पर जोर दिया, तथा तुलसीदास ने अवधी में रामचरितमानस की रचना की। इस काल के धार्मिक और दार्शनिक विकास के बारे में अधिक जानने के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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भारतीय स्वतंत्रता, माउंटबेटन योजना और देश के विभाजन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 3 जून 1947 को प्रस्तुत माउंटबेटन योजना में भारत के विभाजन के साथ-साथ बंगाल और पंजाब की विधानसभाओं को अपनी-अपनी प्रांतीय विधानसभाओं के हिंदू और मुस्लिम बहुसंख्यक जिलों के सदस्यों की अलग-अलग बैठकें आयोजित कर यह निर्णय लेने का अधिकार दिया गया था कि क्या इन प्रांतों का विभाजन किया जाना चाहिए।
2. ब्रिटिश संसद में भारतीय स्वतंत्रता विधेयक (Indian Independence Bill) जुलाई 1947 में प्रस्तुत किया गया था, जिसे बिना किसी संशोधन के पारित कर दिया गया और 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश सम्राट की स्वीकृति मिलने के बाद यह 'भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947' बन गया।
3. माउंटबेटन योजना के तहत उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) और असम के सिलहट जिले में भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय लेने के लिए जनमत संग्रह (Referendum) का आयोजन किया गया था, जिसमें खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व वाले 'खुदाई खिदमतगार' संगठन ने सक्रिय रूप से भाग लेकर पाकिस्तान में शामिल होने के पक्ष में मतदान किया था।
4. पंजाब और बंगाल की सीमाओं के निर्धारण के लिए सर सिरिल रेडक्लिफ की अध्यक्षता में दो अलग-अलग 'सीमा आयोगों' (Boundary Commissions) का गठन किया गया था, जिसमें प्रत्येक आयोग में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के दो-दो प्रतिनिधि शामिल थे, ताकि निष्पक्ष रूप से सीमा रेखा खींची जा सके।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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महात्मा गांधी के भारत आगमन के पश्चात उनके शुरुआती सत्याग्रहों (चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. चंपारण सत्याग्रह (1917) में यूरोपीय बागान मालिकों द्वारा तिनकथिया प्रणाली के तहत किसानों को अपनी कुल भूमि के 20/3 भाग पर नील की खेती करने के लिए बाध्य किया जाता था, और इस आंदोलन के दौरान ही रविन्द्रनाथ टैगोर ने गांधीजी को 'महात्मा' की उपाधि से सम्मानित किया था।
2. खेड़ा सत्याग्रह (1918) के दौरान फसल के पूर्णतः नष्ट हो जाने पर भी बॉम्बे सरकार द्वारा लगान माफ नहीं किया गया था, और गांधीजी के नेतृत्व में किसानों ने लगान अदायगी के बहिष्कार का सफल संघर्ष किया, जहाँ सरदार वल्लभभाई पटेल गांधीजी के एक प्रमुख और समर्पित अनुयायी के रूप में उभरे।
3. अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918) मिल मालिकों और मजदूरों के बीच 'प्लॉग बोनस' (Plague Bonus) को समाप्त करने के विरोध में की गई थी, जिसमें गांधीजी ने पहली बार भारत में किसी औद्योगिक विवाद के समाधान के लिए 'भूख हड़ताल' (Hunger Strike) का सफल प्रयोग किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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बौद्ध धर्म और जैन धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों तथा उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बौद्ध धर्म के 'प्रतीत्यसमुत्पाद' (कारण-कार्य सिद्धांत) के अनुसार संसार की प्रत्येक वस्तु किसी न किसी कारण से उत्पन्न हुई है और यह शून्यवाद के अत्यधिक निकट है, जबकि जैन धर्म का 'स्यादवाद' (अनेकांतवाद) यह प्रतिपादित करता है कि ज्ञान सापेक्ष होता है और किसी भी वस्तु के सत्य का पूर्ण निर्धारण एकांगी दृष्टिकोण से नहीं किया जा सकता।
2. बौद्ध संघ में प्रविष्ट होने के लिए 'प्रव्रज्या' संस्कार अनिवार्य था, जिसके उपरांत नवदीक्षित भिक्षु को दस शिक्षापदों का पालन करना होता था, जबकि जैन संघ में महावीर स्वामी ने गृहस्थ जीवन त्यागने वाले व्यक्तियों के लिए संलेखना (संतारा) विधि के अलावा पांच महाव्रतों का कठोरता से पालन करना अनिवार्य किया था।
3. बौद्ध धर्म के हीनयान संप्रदाय ने बुद्ध को भगवान मानकर उनकी मूर्तियों की पूजा शुरू की और बोधगया में महाबोधि मंदिर का निर्माण कराया, जबकि महायान संप्रदाय बुद्ध को एक महापुरुष और मार्गदर्शक मानकर उनके मूल उपदेशों (अष्टम मार्ग) पर टिके रहने का समर्थन करता रहा।
4. जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के अनुयायी मोक्ष प्राप्ति के लिए नग्न रहने (वस्त्र त्यागने) को अनिवार्य मानते हैं, जबकि दिगंबर संप्रदाय के अनुयायी श्वेत वस्त्र धारण करने की अनुमति देते हैं और स्त्री मुक्ति को संभव मानते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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