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History of India
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19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में स्थापित 'प्रार्थना समाज' और 'आर्य समाज' के वैचारिक दृष्टिकोण, सामाजिक सुधार एजेंडे तथा धार्मिक सुधारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. प्रार्थना समाज की स्थापना वर्ष 1867 में केशव चंद्र सेन की प्रेरणा से बंबई में आत्माराम पांडुरंग द्वारा की गई थी, जिसका मुख्य ध्यान अंतर-जाति विवाह, अंतर-जाति भोज, विधवा पुनर्विवाह और दलित जातियों के उत्थान जैसे सामाजिक सुधारों पर था।
  2. 2. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा 1875 में स्थापित 'आर्य समाज' ने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, अवतारवाद और जन्म आधारित जाति व्यवस्था का पुरजोर खंडन किया तथा 'वेदों की ओर लौटो' का नारा देते हुए वेदों की अचूकता और सर्वोच्चता को स्थापित किया।
  3. 3. प्रार्थना समाज के प्रमुख नेता और न्यायविद् महादेव गोविंद रानाडे ने समाज सुधार कार्यों को गति देने के लिए 'डेक्कन एजुकेशन सोसायटी' की स्थापना की, जबकि आर्य समाज ने पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली का पूर्ण बहिष्कार करते हुए केवल गुरुकुल पद्धति पर आधारित शिक्षा को ही एकमात्र विकल्प माना।
  4. 4. आर्य समाज ने हिंदू समाज से अलग हुए या इस्लाम व ईसाई धर्म अपना चुके व्यक्तियों की पुनः हिन्दू धर्म में वापसी के लिए 'शुद्धि आंदोलन' की शुरुआत की थी, जिसे प्रार्थना समाज के सदस्यों का भी वैचारिक समर्थन प्राप्त था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि प्रार्थना समाज की स्थापना बंबई में 1867 में आत्माराम पांडुरंग ने केशव चंद्र सेन की प्रेरणा से की थी और इसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक सुधार था। कथन 2 सही है क्योंकि स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित विकिपीडिया संदर्भ के अनुसार आर्य समाज ने वेदों को सर्वोच्च माना और मूर्तिपूजा व जन्म आधारित जाति व्यवस्था का विरोध किया। कथन 3 गलत है क्योंकि 'डेक्कन एजुकेशन सोसायटी' की स्थापना मुख्य रूप से एम.जी. रानाडे, जी.जी. ಅಗरकर और बालगंगाधर तिलक आदि द्वारा की गई थी, और आर्य समाज ने पाश्चात्य शिक्षा का पूरी तरह बहिष्कार नहीं किया बल्कि एंग्लो-वैदिक कॉलेज (DAV) और गुरुकुल दोनों माध्यमों को अपनाया। कथन 4 सही है क्योंकि आर्य समाज द्वारा हिंदू धर्म त्याग चुके लोगों की वापसी के लिए 'शुद्धि आंदोलन' चलाया गया था।
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