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History of India
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प्राचीन भारतीय इतिहास में बौद्ध धर्म और जैन धर्म के संप्रदायों, दार्शनिक मान्यताओं तथा उनके ऐतिहासिक विकास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. जैन धर्म के 'स्यादवाद' (अनेकांतवाद) के अनुसार ज्ञान सापेक्ष और बहुआयामी होता है तथा किसी भी वस्तु के गुण अनंतिम होते हैं, जबकि बौद्ध धर्म के 'प्रतीतसमुत्पाद' सिद्धांत के अनुसार संसार की प्रत्येक वस्तु कारणों और प्रभावों की श्रृंखला से बंधी हुई है और क्षणिक है।
  2. 2. बौद्ध धर्म के पतन और उसके विभिन्न संप्रदायों के विकास के क्रम में महायान शाखा में बुद्ध को भगवान मानकर उनकी पूजा की जाने लगी, जबकि थेरवाद (हीनयान) संप्रदाय ने बुद्ध के उपदेशों को उनके मूल रूप में बनाए रखा और व्यक्तिगत साधना पर बल दिया।
  3. 3. जैन संघ के विभाजन के परिणामस्वरूप श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों का उदय हुआ, जिनमें दिगंबर साधु जैन दर्शन के कठोर नियमों का पालन करते हुए पूर्ण नग्नता धारण करते हैं, जबकि श्वेतांबर साधु श्वेत वस्त्र पहनते हैं और इस बात पर विश्वास करते हैं कि स्त्रियाँ भी मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं।
  4. 4. बौद्ध धर्म की प्रथम संगीति वैशाली में काकावर्ण (कालाशोका) के संरक्षण में हुई थी, जिसकी अध्यक्षता महाकस्सप ने की थी, तथा इसी संगीति में बुद्ध के उपदेशों को 'सुत्तपिटक' और 'विनयपिटक' के रूप में संकलित किया गया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1, 2 और 3 पूरी तरह से सत्य हैं। जैन धर्म का 'अनेकांतवाद' और 'स्यादवाद' ज्ञान की सापेक्षता को स्पष्ट करता है, जबकि बौद्ध धर्म का 'प्रतीतसमुत्पाद' (हेतुवाद) क्षणिकवाद का समर्थन करता है। महायान संप्रदाय में मूर्तिपूजा और बोधिसत्व की अवधारणा को प्रमुखता मिली, और जैन धर्म के श्वेतांबर तथा दिगंबर संप्रदायों में स्त्री मोक्ष एवं वस्त्र धारण को लेकर स्पष्ट भेद है। कथन 4 असत्य है क्योंकि बौद्ध धर्म की **प्रथम संगीति** राजगृह की सप्तपर्णी गुफा में हरियंक वंश के सम्राट **अजातशत्रु** के संरक्षण में हुई थी, न कि वैशाली में (वैशाली में द्वितीय संगीति हुई थी)। विकिपीडिया संदर्भ
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