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General Science
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मानव शरीर के रक्त परिसंचरण तंत्र और रक्त समूहों (Blood Groups) की वंशागति तथा प्रतिरक्षात्मक विशेषताओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. ABO रक्त समूह प्रणाली मल्टीपल एलीलिज़्म (Multiple allelism) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें एलील $I^A$ और $I^B$ लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर शर्करा के विशेष बहुलक (Polymers) के उत्पादन को नियंत्रित करते हैं और ये दोनों एलील सह-प्रभाविता (Co-dominance) प्रदर्शित करते हैं, जबकि $i$ एलील किसी भी शर्करा का निर्माण नहीं करता है।
- 2. 'बॉम्बे रक्त समूह' (Bombay phenotype) से ग्रस्त व्यक्तियों में H-एंटीजन का पूर्ण अभाव होता है, क्योंकि उनके पास FUT1 जीन का कार्यात्मक रूप नहीं होता है, जिसके परिणामस्वरूप उनका रक्त सीरम 'O' रक्त समूह वाले व्यक्तियों की तरह एंटी-A और एंटी-B के साथ-साथ एंटी-H एंटीबॉडी भी रखता है, जिससे उन्हें केवल बॉम्बे फेनोटाइप वाले व्यक्ति से ही रक्त आधान (Blood transfusion) की आवश्यकता होती है।
- 3. एरिथ्रोब्लास्टोसिस फिटेलिस (Erythroblastosis fetalis) की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब Rh-धनात्मक (Rh+) माता का गर्भ Rh-ऋणात्मक (Rh-) भ्रूण के साथ होता है, जिसमें प्रसव के दौरान भ्रूण के Rh+ लाल रक्त कोशिकाएं माता के परिसंचरण में प्रवेश करके प्राथमिक प्रतिरक्षा अनुक्रिया को प्रेरित करती हैं और पहली संतान को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि ABO रक्त समूह प्रणाली मल्टीपल एलीलिज़्म का एक उत्कृष्ट उदाहरण है जहाँ $I^A$ और $I^B$ सह-प्रभाविता दिखाते हैं और $i$ अप्रभावी होता है। कथन 2 सही है क्योंकि बॉम्बे फिनोटाइप वाले व्यक्तियों में H-एंटीजन नहीं होता है और वे एंटी-H एंटीबॉडी रखते हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि एरिथ्रोब्लास्टोसिस फिटेलिस तब होता है जब Rh-ऋणात्मक माता और Rh-धनात्मक भ्रूण होता है, और यह आमतौर पर पहली संतान को प्रभावित नहीं करता बल्कि दूसरी या बाद की संतानों में गंभीर समस्या पैदा करता है जब माता के शरीर में एंटी-Rh एंटीबॉडी बन चुके होते हैं। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देखें।
Related Questions
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यांत्रिकी में कार्य, ऊर्जा और संवेग के अंतर्संबंधों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. किसी वस्तु पर नियत बल द्वारा किया गया कार्य उस बल और बल की दिशा में वस्तु के विस्थापन के अदिश गुणनफल के बराबर होता है, और यह कार्य धनात्मक, ऋणात्मक या शून्य हो सकता है, जो बल और विस्थापन के बीच के कोण पर निर्भर करता है।
2. गतिज ऊर्जा और रेखीय संवेग के बीच संबंध के अनुसार, यदि किसी वस्तु का रेखीय संवेग दोगुना कर दिया जाए, तो उसकी गतिज ऊर्जा चार गुनी हो जाती है, बशर्ते वस्तु का द्रव्यमान नियत रहे।
3. संरक्षी बलों (Conservative forces) द्वारा किया गया कार्य पथ पर निर्भर करता है, और एक बंद पथ के अनुदिश संरक्षी बल द्वारा किया गया कुल कार्य हमेशा ऋणात्मक होता है।
4. कार्य-ऊर्जा प्रमेय (Work-Energy Theorem) के अनुसार, किसी वस्तु पर सभी बलों द्वारा किया गया कुल कार्य उसकी गतिज ऊर्जा में परिवर्तन के ठीक बराबर होता है, चाहे वे बल संरक्षी हों या असंरक्षी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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विलयन के अणुसंख्यक गुणधर्मों (Colligative Properties) और उत्प्रेरण (Catalysis) के सिद्धांतों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. किसी विलायक में अवाष्पशील विलेय मिलाने पर उसके वाष्प दाब में आपेक्षिक अवनमन (Relative Lowering of Vapour Pressure) विलेय के मोल अंश के बराबर होता है, और यह राऊल्ट के नियम द्वारा निर्धारित होता है तथा विलेय के संघुणन या वियोजन से प्रभावित नहीं होता है।
2. 'वांट-हॉफ गुणांक' ($i$) का मान वैद्युत अपघट्यों के वियोजन की स्थिति में एक से अधिक ($i > 1$) होता है, जबकि संगुणन की स्थिति में इसका मान एक से कम ($i < 1$) होता है, जो परासरण दाब और हिमांक अवनमन जैसे अणुसंख्यक गुणधर्मों के सैद्धांतिक और प्रयोगात्मक मान के अंतर को स्पष्ट करता है।
3. 'विषमांगी उत्प्रेरण' (Heterogeneous Catalysis) में उत्प्रेरक और अभिकारक भिन्न-भिन्न भौतिक अवस्थाओं में होते हैं, जिसमें उत्प्रेरक की सतह पर अभिकारकों का अधिशोषक (Adsorption) और सक्रिय संकुल का निर्माण मुख्य चरण होता है, जिसका एक उत्कृष्ट उदाहरण हेबर विधि द्वारा अमोनिया उत्पादन में सूक्ष्म विभाजित लोहे का उपयोग है।
4. 'एंजाइम उत्प्रेरण' की सक्रियण ऊर्जा (Activation Energy) का मान अनप्रेरित अभिक्रिया की तुलना में बहुत अधिक होता है, जिसके कारण एंजाइम अभिक्रिया की दर को अत्यंत मंद कर देते हैं और यह अत्यधिक विशिष्ट प्रकृति के होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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अनुदैर्ध्य तरंगों (Longitudinal Waves) और अनुप्रस्थ तरंगों (Transverse Waves) की प्रकृति तथा ध्वनि तरंगों के संचरण के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वायु में ध्वनि तरंगों का संचरण एक रुद्धोष्म (Adiabatic) प्रक्रिया है, जिसकी गणना सर्वप्रथम लाप्लास ने न्यूटन के इस त्रुटिपूर्ण सूत्र में संशोधन करके की थी कि यह प्रक्रिया समतापीय (Isothermal) होती है।
2. किसी गैस में ध्वनि की चाल गैस के घनत्व के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती होती है, जबकि दाब में परिवर्तन करने पर गैस में ध्वनि की चाल पर सीधा प्रभाव पड़ता है क्योंकि दाब और घनत्व का अनुपात नियत रहता है।
3. अनुप्रस्थ तरंगों का निर्माण केवल उन्हीं माध्यमों में संभव है जिनमें अपरूपण प्रतिरोधी (Shear Resistance) गुण विद्यमान हो, और यही कारण है कि अनुप्रस्थ तरंगें गैसों के भीतर संचरित नहीं हो सकती हैं क्योंकि गैसों में अपरूपण प्रत्यास्थता (Shear Modulus) शून्य होती है।
4. जब ध्वनि तरंग एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करती है, तो उसकी आवृत्ति और तरंगदैर्ध्य दोनों अपरिवर्तित रहते हैं, जबकि माध्यम के घनत्व और प्रत्यास्थता में भिन्नता के कारण उसकी चाल और आयाम में परिवर्तन हो जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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जीन नियमन और आनुवंशिक कूट (Genetic Code) की कार्यप्रणाली के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ऑपेरॉन मॉडल (Operon Model), जिसे जैकब और मोनोड द्वारा प्रतिपादित किया गया था, के अनुसार 'लैक ऑपेरॉन' (Lac Operon) एक दमनकारी (Inducible) प्रणाली है, जिसमें लैक्टोज की अनुपस्थिति में रिप्रेशर प्रोटीन ऑपरेटर जीन से जुड़कर संरचनात्मक जीनों के अनुलेखन को रोक देता है।
2. आनुवंशिक कूट (Genetic Code) की त्रिक प्रकृति (Triplet nature) होती है और यह 'अस्पष्ट' (Ambiguous) होता है, जिसका अर्थ है कि एक विशिष्ट कोडॉन एक से अधिक विभिन्न अमीनो अम्लों को कोड कर सकता है।
3. यूकेरियोटिक जीवों में 'स्प्लिसिंग' (Splicing) प्रक्रिया के दौरान हेटेरोजीनस न्यूक्लियर आरएनए (hnRNA) से अकोडिंग क्षेत्रों (इंट्रॉन्स) को हटा दिया जाता है और कोडिंग क्षेत्रों (एक्सॉन्स) को एक साथ जोड़ा जाता है, जो अनुलेखन के पश्चात होने वाला संशोधन (Post-transcriptional modification) है।
4. आनुवंशिक कूट में 'AUG' कोडॉन दोहरा कार्य करता है, यह मेथियानिन अमीनो अम्ल को कोड करने के साथ-साथ प्रोटीन संश्लेषण के लिए 'प्रारंभक कोडॉन' (Initiator codon) के रूप में भी कार्य करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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रासायनिक बंधन और अम्ल-क्षार सिद्धांत (Acids and Bases) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. लुईस अम्ल (Lewis acid) वे रासायनिक स्पीशीज होती हैं जो इलेक्ट्रॉन युग्म को ग्रहण करने की क्षमता रखती हैं (इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्राही), जबकि लुईस क्षार वे होते हैं जो इलेक्ट्रॉन युग्म दान कर सकते हैं।
2. ब्रॉन्स्टेड-लोरी (Bronsted-Lowry) अवधारणा के अनुसार, एक अम्ल वह पदार्थ है जो प्रोटॉन ($H^+$) का त्याग कर सकता है, और इसके द्वारा प्रोटॉन त्यागने के बाद बनने वाली स्पीशीज को उसका 'संयुग्मी अम्ल' (Conjugate acid) कहा जाता है।
3. आयनिक बंधन (Ionic bond) के निर्माण के दौरान जालक ऊर्जा (Lattice energy) जितनी अधिक ऋणात्मक होती है, बनने वाले आयनिक यौगिक का स्थायित्व उतना ही अधिक होता है।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
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