त्वरित लिंक्स
General Science
25 views
नाभिकीय भौतिकी और रेडियोएक्टिवता के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. किसी रेडियोएक्टिव तत्व की अर्ध-आयु (Half-life) उस समयाराश के बराबर होती है जिसमें परमाणु नाभिकों की प्रारंभिक संख्या घटकर अपनी मूल संख्या की आधी रह जाती है, और यह अर्ध-आयु काल उस तत्व के रेडियोएक्टिव क्षय नियतांक (Decay Constant) के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
- 2. 'द्रव्यमान क्षति' (Mass Defect) किसी नाभिक के वास्तविक कुल द्रव्यमान और उसके व्यक्तिगत प्रोटॉनों व न्यूट्रॉनों के द्रव्यमानों के योग के बीच का अंतर है, और यही द्रव्यमान क्षति अल्बर्ट आइंस्टीन के संबंध $E=mc^2$ के अनुसार नाभिकीय बंधन ऊर्जा (Nuclear Binding Energy) में परिवर्तित होती है।
- 3. नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission) की प्रक्रिया में यूरेनियम-235 पर जब एक धीमा न्यूट्रॉन आघात करता है, तो यह अस्थिर यूरेनियम-236 बनाता है जो लगभग समान आकार के दो छोटे नाभिकों में टूट जाता है, तथा इस प्रक्रिया में प्रति विखंडन औसत रूप से 2 से 3 तीव्र न्यूट्रॉन उत्सर्जित होते हैं।
- 4. सूर्य और अन्य तारों में ऊर्जा का मुख्य स्रोत 'नाभिकीय संलयन' (Nuclear Fusion) है, जिसमें अत्यधिक उच्च तापमान और दाब पर चार हाइड्रोजन नाभिक मिलकर एक हीलियम नाभिक का निर्माण करते हैं, और इस संलयन प्रक्रिया के दौरान द्रव्यमान में होने वाली मामूली क्षति ऊर्जा के रूप में मुक्त होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
दिए गए सभी कथन आधुनिक एवं परमाणु भौतिकी के अंतर्गत रेडियोएक्टिवता, द्रव्यमान क्षति, नाभिकीय विखंडन और नाभिकीय संलयन के सिद्धांतों के अनुसार पूर्णतः सत्य हैं। प्रथम कथन के अनुसार, अर्ध-आयु ($T_{1/2} = \frac{\ln 2}{\lambda}$) क्षय नियतांक ($\lambda$) के व्युत्क्रमानुपाती होती है। द्वितीय कथन द्रव्यमान क्षति (Mass Defect) और बंधन ऊर्जा के संबंध को स्पष्ट करता है। तृतीय कथन में यूरेनियम-235 के विखंडन और न्यूट्रॉन उत्सर्जन की प्रक्रिया का सटीक वर्णन है। चतुर्थ कथन तारों में ऊर्जा उत्पादन के मुख्य स्रोत विकिपीडिया संदर्भ के अनुसार नाभिकीय संलयन को रेखांकित करता है।
Related Questions
→
मानव रक्त परिसंचरण तंत्र और प्लाज्मा प्रोटीन की कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रक्त प्लाज्मा में उपस्थित 'फाइब्रिनोजेन' (Fibrinogen) और 'प्रोथ्रोम्बिन' (Prothrombin) यकृत द्वारा संश्लेषित होने वाले प्रमुख प्लाज्मा प्रोटीन हैं, जो रक्त का थक्का जमने की प्रक्रिया में निष्क्रिय अवस्था में भाग लेते हैं।
2. 'एल्ब्यूमिन' (Albumin) रक्त प्लाज्मा का सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला प्रोटीन है, जो मुख्य रूप से रक्त के परासरण दाब (Colloid osmotic pressure) को बनाए रखने का कार्य करता है ताकि ऊतकों में द्रव का अत्यधिक रिसाव न हो।
3. 'सीरम' (Serum) और प्लाज्मा दोनों संरचनात्मक रूप से पूर्णतः समान होते हैं, अंतर केवल इतना होता है कि सीरम में थक्का जमाने वाले सभी प्रोटीन (जैसे फाइब्रिनोजेन) पूरी तरह से उपस्थित होते हैं जबकि प्लाज्मा से इन्हें निकाला जाता है।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
→
रासायनिक बंधन, समन्वय यौगिकों और अम्ल-क्षार सिद्धांतों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. फजान के नियमों (Fajans' rules) के अनुसार, आयनिक यौगिक में सहसंयोजक लक्षण तब अधिक होते हैं जब धनायन का आकार छोटा हो, ऋणायन का आकार बड़ा हो और धनायन पर आवेश का घनत्व उच्च हो।
2. कठोर-मृदु अम्ल-क्षार (HSAB) सिद्धांत के अनुसार, कठोर अम्ल (Hard acids) सामान्यतः छोटे आकार, उच्च धनात्मक आवेश और कम ध्रुवणनीयता वाले धनायन होते हैं जो कठोर क्षारों के साथ मजबूत और स्थिर संकुल बनाते हैं।
3. लुईस अम्ल संकल्पना के अंतर्गत, वे सभी स्पीशीज लुईस अम्ल के रूप में कार्य करती हैं जो एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म (Lone pair of electrons) दान करने की प्रवृत्ति रखती हैं, जैसे अमोनिया ($NH_3$) और जल ($H_2O।$)
4. समइलेक्ट्रॉनिक (Isoelectronic) स्पीशीज के बीच, नाभिकीय आवेश ($Z$) में वृद्धि होने पर ऋणायनों के आकार में कमी आती है जबकि धनायनों का आकार बढ़ता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
मानव शरीर में वृहद पोषक तत्वों और उनके जैव-रासायनिक उपापचय (Metabolism) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ग्लाइकोजेनोलिसिस (Glycogenolysis) वह प्रक्रिया है जिसमें यकृत और कंकाल पेशियों में संचित ग्लाइकोजन का ग्लूकोज-1-फास्फेट में अपघटन होता है, जिसे 'ग्लाइकोजन फास्फोराइलेज' एंजाइम उत्प्रेरित करता है।
2. ग्लूकोनियोजेनेसिस (Gluconeogenesis) के दौरान, गैर-कार्बोहाइड्रेट स्रोतों जैसे कि लैक्टेट, ग्लिसरोल और ग्लूकोजेनिक अमीनो अम्ल से ग्लूकोज का संश्लेषण होता है, जो मुख्य रूप से अग्न्याशय की बीटा कोशिकाओं में संपन्न होता है।
3. वसा अम्लों के बीटा-ऑक्सीडेशन (Beta-oxidation) की प्रक्रिया माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स में होती है, जिससे एसिटाइल-CoA के अणु बनते हैं जो सीधे क्रेब्स चक्र में प्रवेश करके एटीपी का उत्पादन करते हैं।
4. प्रोटीन कुपोषण के कारण होने वाले गंभीर विकार 'क्वाशियोकोर' (Kwashiorkor) में आहार में प्रोटीन और कुल कैलोरी दोनों की भीषण कमी होती है, जबकि 'मॅरास्मस' (Marasmus) में मुख्य रूप से केवल प्रोटीन की गंभीर कमी होती है और इसमें एडिमा (Edema) प्रमुख लक्षण के रूप में देखा जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
मानव शरीर में होने वाले विभिन्न संक्रामक रोगों, उनके रोगजनकों (Pathogens) और उनके संचरण या निदान के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 'टाइफाइड' (Typhoid) एक जीवाणु जनित प्रणालीगत संक्रमण है जो साल्मोनेला टाइफी (Salmonella typhi) के कारण होता है, और इसके संचरण का मुख्य माध्यम दूषित जल और भोजन है, जिसकी पुष्टि के लिए 'विडाल परीक्षण' (Widal test) किया जाता है।
2. 'काली खांसी' (Pertussis) या हूइंग कफ बोरदटेला परट्यूसिस (Bordetella pertussis) नामक जीवाणु के कारण होता है, जो श्वसन नली के उपकला ऊतक को संक्रमित करता है और इसके विरुद्ध बच्चों को 'डीपीटी' (DPT) का टीका दिया जाता है।
3. 'मलेरिया' एक प्रोटोजोआ जनित रोग है जो प्लाज्मोडियम की विभिन्न प्रजातियों के कारण होता है, और इसके परजीवी का जीवन चक्र पूरा होने के लिए मादा एनाफिलिस मच्छर के साथ-साथ मानव यकृत और लाल रक्त कणिकाओं (RBC) की आवश्यकता होती है, जहाँ हीमोज़ोइन (Hemozoin) नामक विषैला पदार्थ ठंड के साथ तेज बुखार के लिए उत्तरदायी होता है।
4. 'क्षय रोग' (Tuberculosis) माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक जीवाणु के कारण होने वाला एक विषाणु जनित रोग है, जो मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करता है और इसके निदान के लिए 'डिक परीक्षण' (Dick test) अनिवार्य रूप से किया जाता है।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
→
आनुवंशिकी और जैव विकास के सिद्धांतों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. हार्डी-वेनबर्ग साम्यावस्था (Hardy-Weinberg equilibrium) के अनुसार, एक बड़े यादृच्छिक रूप से संगमित होने वाली आबादी में एलील आवृत्तियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थिर रहती हैं, बशर्ते आबादी पर उत्परिवर्तन, प्राकृतिक चयन, जीन प्रवाह और आनुवंशिक अपवाह (Genetic drift) जैसी विकासीय शक्तियाँ प्रभावी न हों।
2. लैमार्क वाद का मूल सिद्धांत 'उपार्जित लक्षणों की वंशागति' (Inheritance of acquired characters) था, जिसके अनुसार जीवों द्वारा अपने जीवनकाल में अर्जित किए गए शारीरिक लक्षण अगली पीढ़ी को वंशागत हो जाते हैं, जिसका खंडन बीजद्रव्य सिद्धांत (Germplasm theory) द्वारा वीजमैन ने किया था।
3. आनुवंशिक अपवाह (Genetic drift) एक दिशाहीन और यादृच्छिक प्रक्रिया है जो मुख्य रूप से बड़ी आबादी में अपनी चरम प्रभावशीलता दिखाती है और जीन पूल की विविधता को स्थिर रखने में सहायक होती है।
4. सह-प्रभाविता (Codominance) और अपूर्ण प्रभाविता (Incomplete dominance) दोनों ही में मेंडेलियन आनुवंशिकी के प्रभाविता के नियम का अपवाद देखा जाता है, जहाँ सह-प्रभाविता में दोनों एलील स्वतंत्र रूप से अपनी अभिव्यक्ति $F_1$ पीढ़ी में देते हैं, जिसके बारे में विस्तृत जानकारी विकिपीडिया संदर्भ में दी गई है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.