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Geography
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भारत में सिंचाई पद्धतियों, जल उपयोग दक्षता (Water Use Efficiency) और प्रमुख कृषि-जलवायु क्षेत्रों में फसलों के पैटर्न के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणाली) पारंपरिक बाढ़ सिंचाई (Flood Irrigation) की तुलना में जल उपयोग दक्षता को काफी हद तक बढ़ा देती है और इससे भूजल स्तर के अवक्षय को नियंत्रित करने में सीधी मदद मिलती है।
  2. 2. भारत में 'शून्य जुताई' (No-Till Farming) तकनीक का मुख्य लाभ यह है कि यह मृदा के कार्बनिक पदार्थों के क्षरण को रोकती है, नमी बनाए रखती है और पारंपरिक जुताई की तुलना में ऊर्जा तथा श्रम लागत को कम करती है।
  3. 3. सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाने में भारत के सभी राज्य समान रूप से प्रगति पर हैं, और उत्तर भारत के मैदानी राज्य सबसे उन्नत ड्रिप सिंचाई नेटवर्क वाले क्षेत्र माने जाते हैं।
  4. 4. फसल विविधीकरण (Crop Diversification) के तहत जल-गहन फसलों (जैसे धान और गन्ना) के स्थान पर दलहन और तिलहन जैसी कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों को बढ़ावा देना अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में स्थायी कृषि के लिए अनिवार्य माना जाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियाँ वाष्पीकरण और रिसाव के नुकसान को कम करके जल उपयोग दक्षता को 50-90% तक बढ़ा देती हैं। कथन 2 सही है क्योंकि शून्य जुताई (No-Till) मृदा की संरचना को संरक्षित करती है, केंचुओं और सूक्ष्मजीवों के आवास को सुरक्षित रखती है तथा नमी संरक्षण में सहायक है। कथन 3 गलत है क्योंकि सूक्ष्म सिंचाई को अपनाने में दक्षिण और पश्चिमी भारतीय राज्य (जैसे महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और गुजरात) उत्तर भारत के मैदानी राज्यों की तुलना में काफी आगे हैं। कथन 4 सही है क्योंकि जल-संकट वाले अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में धान और गन्ने जैसी अधिक पानी माँगने वाली फसलों के बजाय दलहन-तिलहन उगाने से भूजल पर दबाव कम होता है। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देखें।
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