त्वरित लिंक्स
History of India
1 views
वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान झाँसी और ग्वालियर क्षेत्र में रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे द्वारा संचालित सैन्य अभियानों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. झाँसी की रक्षा करते हुए जब ब्रिटिश सेनापति सर ह्यूरोज की सेना ने किले को घेर लिया, तब रानी लक्ष्मीबाई तात्या टोपे की सहायता से झाँसी से सुरक्षित निकलने में सफल रहीं और कालपी पहुँचकर तात्या टोपे के साथ मिलकर संयुक्त सैन्य मोर्चा संभाला था।
- 2. कालपी के युद्ध में पराजित होने के पश्चात रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने ग्वालियर की ओर प्रस्थान किया, जहाँ सिंधिया राजवंश के शासक जयाजीराव सिंधिया ने उनका स्वागत किया और ग्वालियर का किला उन्हें सौंप दिया था।
- 3. ग्वालियर पर अधिकार करने के पश्चात तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई को ब्रिटिश सेनापति जनरल ह्यूरोज की सेना के विरुद्ध लड़ना पड़ा, और 18 जून 1858 को ग्वालियर के युद्ध में अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं।
- 4. रानी लक्ष्मीबाई की शहादत के बाद तात्या टोपे ने मध्य भारत के जंगलों में अंग्रेजों के विरुद्ध छापामार युद्ध जारी रखा, किंतु उनके एक विश्वासघाती मित्र मान सिंह के धोखे के कारण वे पकड़े गए और अप्रैल 1859 में उन्हें शिवपुरी में फाँसी दे दी गई थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
वर्ष 1857 के विद्रोह के दौरान झाँसी और ग्वालियर का अभियान भारतीय इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक अध्याय है। झाँसी के पतन के बाद रानी लक्ष्मीबाई कालपी पहुँचीं, जहाँ तात्या टोपे ने उनके साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बनाया था। कालपी के युद्ध में हार के बाद दोनों ने ग्वालियर की ओर प्रस्थान किया। ग्वालियर के शासक जयाजीराव सिंधिया अंग्रेजों के पक्ष में थे और उन्होंने विद्रोहियों का समर्थन नहीं किया था, बल्कि वे आगरा भाग गए थे, जबकि उनकी सेना ने रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे का साथ दिया था। अतः कथन 2 गलत है। ब्रिटिश सेनापति सर ह्यूरोज ने ग्वालियर पर आक्रमण किया, जहाँ 18 जून 1858 को लड़ते हुए रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं। रानी की मृत्यु के बाद तात्या टोपे ने गुरिल्ला युद्ध जारी रखा, लेकिन मान सिंह के विश्वासघात के कारण वे पकड़े गए और 18 अप्रैल 1859 को शिवपुरी में उन्हें फाँसी दे दी गई। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देखें।
Related Questions
→
ब्रिटिश भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बंगाल प्रेसिडेंसी में लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा वर्ष 1793 में लागू किए गए 'स्थाई बंदोबस्त' के तहत जमींदारों को भूमि का स्थायी स्वामी बना दिया गया, किंतु 'सूर्यास्त कानून' (Sunset Law) के अंतर्गत यदि निर्धारित तिथि के सूर्यास्त से पहले जमींदार भू-राजस्व का भुगतान नहीं करते थे, तो उनकी जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी।
2. थॉमस मुनरो द्वारा मद्रास प्रेसीडेंसी में विस्तृत रूप से लागू की गई 'रयतवारी व्यवस्था' में सरकार और किसान (रयत) के बीच सीधा समझौता होता था, और इस प्रणाली में राज्य द्वारा भू-राजस्व की दर को हमेशा के लिए स्थायी (Permanent) कर दिया गया था ताकि भविष्य में कभी भी इसमें वृद्धि न की जा सके।
3. हॉल्ट मैकेंज़ी द्वारा प्रतिपादित और विलियम बेंटिंक के शासनकाल में विनियमित 'महालवारी व्यवस्था' के अंतर्गत भू-राजस्व के निर्धारण और भुगतान की सामूहिक जिम्मेदारी पूरे गाँव या महाल (गाँव के समूह) के निवासियों की होती थी, जिसे व्यक्तिगत रूप से प्रत्येक कृषक से वसूला जाता था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
→
भारतीय स्वतंत्रता और माउंटबेटन योजना (3 जून 1947) के प्रावधानों तथा उसके क्रियान्वयन के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. माउंटबेटन योजना के तहत बंगाल और पंजाब की प्रांतीय विधानसभाओं की बैठकों में यह निर्णय लिया गया कि दोनों प्रांतों का विभाजन किया जाए या नहीं, इसके लिए मुस्लिम बहुसंख्यक जिलों और गैर-मुस्लिम बहुसंख्यक जिलों के सदस्यों द्वारा अलग-अलग मतदान (Separate Voting) किया जाएगा।
2. इस योजना के अंतर्गत उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत (NWFP) और असम के सिलहट जिले में भारत या पाकिस्तान में से किसमें शामिल होना है, इसका निर्णय लेने के लिए जनमत संग्रह (Referendum) आयोजित किया गया था, जिसमें सिलहट ने पाकिस्तान के पक्ष में मतदान किया था।
3. रियासतों (Princely States) के भविष्य के संबंध में माउंटबेटन योजना में यह स्पष्ट प्रावधान किया गया था कि वे या तो भारत डोमिनियन या पाकिस्तान डोमिनियन में शामिल हो सकती हैं, अथवा वे अपनी स्वतंत्रता बनाए रखते हुए एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में भी रह सकती हैं।
4. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 को ब्रिटिश संसद द्वारा जुलाई 1947 में पारित किया गया, जिसके माध्यम से 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र डोमिनियंस के सृजन को वैधानिक मान्यता प्रदान की गई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 'नरम दल' और 'गरम दल' के वैचारिक संघर्ष, रणनीतियों तथा बंगाल विभाजन के उपरांत उत्पन्न राजनीतिक परिदृश्य के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के विभाजन के पीछे मुख्य वैचारिक मतभेद यह था कि गरम दल के नेता स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन को केवल बंगाल तक सीमित रखना चाहते थे, जबकि नरम दल के नेता इसे पूरे देश में प्रसारित करना चाहते थे।
2. लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और विपिन चंद्र पाल (जिन्हें 'लाल-बाल-पाल' त्रिपुटी कहा जाता है) ने प्रशासनिक सुधारों के लिए ब्रिटिश न्यायप्रियता में विश्वास रखने की नरमपंथियों की 'भिक्षुक वृत्ति' (Mendicancy) की तीखी आलोचना की और पूर्ण स्वराज या आक्रामक राजनीतिक संघर्ष पर बल दिया।
3. वर्ष 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पहली बार 'स्वराज' (Self-Government) को अपने राजनीतिक लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया था, जिसे लेकर नरमपंथियों और उग्रवादियों के बीच तीखी तनातनी हुई थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
→
महात्मा गांधी के भारत के प्रारंभिक सत्याग्रहों—चंपारण (1917) और खेड़ा (1918)—तथा असहयोग आंदोलन (1920-22) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. चंपारण सत्याग्रह के दौरान यूरोपीय बागान मालिकों द्वारा किसानों पर 'तीनकथा पद्धति' थोपी गई थी, जिसके तहत किसानों को अपनी कुल भूमि के 3/20वें हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य था, और इस समस्या के समाधान के लिए गठित 'चंपारण कृषि समिति' में गांधीजी को भी एक सदस्य के रूप में शामिल किया गया था।
2. वर्ष 1918 के खेड़ा सत्याग्रह में गांधीजी ने पाटीदार किसानों का नेतृत्व करते हुए सरकार से लगान में पूर्ण छूट की मांग की थी, और इसी आंदोलन के दौरान वल्लभभाई पटेल पहली बार गांधीजी के संपर्क में आए तथा उनके अत्यंत निष्ठावान अनुयायी बन गए।
3. फरवरी 1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के कारण महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को अचानक वापस ले लिया, जिससे क्षुब्ध होकर चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस के गया अधिवेशन (1922) के पश्चात कांग्रेस से अलग होकर 'स्वराज पार्टी' की स्थापना की थी।
4. असहयोग आंदोलन के दौरान ही कलकत्ता के विशेष अधिवेशन (सितंबर 1920) में पहली बार ब्रिटिश वस्त्रों और संस्थानों के बहिष्कार के प्रस्ताव पर भारी विरोध हुआ था, क्योंकि सीआर दास और विपिन चंद्र पाल जैसे नेताओं का मानना था कि नए विधानमंडलों के बहिष्कार से रचनात्मक राजनीति को नुकसान पहुंचेगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
मुगल साम्राज्य का क्षेत्रफल सर्वाधिक किसके काल में:
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.