BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

History of India
1 views

वैदिक सभ्यता और वैदिक साहित्य के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. ऋग्वैदिक काल में लोहे का व्यापक प्रयोग होने लगा था, जिसे 'अयस' कहा जाता था, और इसी धातु के बल पर आर्यों ने संपूर्ण गंगा घाटी के घने जंगलों को साफ करके कृषि का बड़े पैमाने पर विस्तार किया था।
  2. 2. शतपथ ब्राह्मण में विदेह माधव और गौतम राहुगण की कथा का उल्लेख मिलता है, जिससे यह प्रमाणित होता है कि आर्यों का भौगोलिक विस्तार सरस्वती नदी घाटी से पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की गंडक (सदानिरा) नदी तक हो चुका था।
  3. 3. ऋग्वैदिक समाज में वर्ण व्यवस्था जन्म पर आधारित न होकर कर्म या व्यवसाय पर आधारित थी, जिसका स्पष्ट प्रमाण ऋग्वेद के दसवें मंडल के 'पुरुष सूक्त' में मिलता है जहाँ चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) की उत्पत्ति विराट पुरुष के अंगों से बताई गई है।
  4. 4. वैदिक कालीन राजनीति में 'सभा' और 'समिति' नामक दो महत्वपूर्ण संस्थाएं थीं, जिनमें 'सभा' मुख्य रूप से आम जनता की सामान्य सभा थी जिसमें महिलाएं भी भाग ले सकती थीं, जबकि 'समिति' कुलीन और वृद्ध लोगों की एक विशिष्ट परिषद थी जो राजा के निर्णयों पर नियंत्रण रखती थी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है क्योंकि ऋग्वैदिक काल में लोहे का ज्ञान नहीं था; लोहे की खोज उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000 ईसा पूर्व) के आसपास कर्नाटक के धारवाड़ और अंतरवेदी (दोआब) क्षेत्र में हुई थी। ऋग्वैदिक काल में 'अयस' शब्द का प्रयोग केवल तांबे या कांसे के लिए किया जाता था, न कि लोहे के लिए। कथन 2 बिल्कुल सही है; शतपथ ब्राह्मण में विदेह माधव की कथा का वर्णन है जिसमें उनके पुरोहित गौतम राहुगण के साथ अग्निमुख में आगे बढ़ते हुए गंडक (सदानिरा) नदी तक पहुँचने का उल्लेख मिलता है, जो आर्यों के पूर्व की ओर विस्तार को दर्शाता है। कथन 3 गलत है क्योंकि ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुष सूक्त में पहली बार चारों वर्णों की उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है, किंतु ऋग्वैदिक काल का प्रारंभिक समाज लचीला और कर्म आधारित था, जबकि पुरुष सूक्त की रचना ऋग्वेद के अंतिम काल में हुई जो धीरे-धीरे जन्म आधारित व्यवस्था की ओर बढ़ने का संकेत देती है। कथन 4 गलत है क्योंकि 'समिति' सामान्य जनता की राष्ट्रीय सभा थी जो राजा का चुनाव भी करती थी, जबकि 'सभा' कुछ कुलीन और वृद्ध लोगों की विशिष्ट संस्था थी। अतः केवल कथन 2 सही है।
Share:

Related Questions

दिल्ली सल्तनत के प्रशासनिक विकास, सैन्य सुधारों और राजस्व व्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. अलाउद्दीन खिलजी ने सल्तनत काल में पहली बार सैनिकों को नगद वेतन देने की परंपरा शुरू की और घोड़ों को दागने (दाग) तथा सैनिकों का हुलिया लिखने की प्रथा को सख्ती से लागू किया, जिसके लिए उसने 'दीवान-ए-आरिज' विभाग को पुनर्गठित किया था। 2. मुहम्मद बिन तुगलक ने दोआब क्षेत्र में कर वृद्धि के अपने निर्णय को वापस लेने के लिए 'दीवान-ए-कोही' नामक एक नए कृषि विभाग की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य बंजर भूमि को प्रत्यक्ष राजकीय नियंत्रण में लाकर कृषि का विस्तार करना था। 3. फिरोजशाह तुगलक ने सल्तनत काल में वंशानुगत जागीर और सैन्य पदों की प्रथा को पुनर्जीवित किया तथा 'हक-ए-शर्ब' (सिंचाई कर) नामक सिंचाई कर लगाया, किंतु उसने शरीयत के विरुद्ध समझे जाने वाले सभी प्रकार के 24 कष्टदायक करों (जैसे अबवाब) को समाप्त कर केवल चार कर—खराज, जकात, जिजिया और खुम्स—ही वैध रखे। 4. सिकंदर लोदी ने भू-राजस्व निर्धारण के लिए 'गज-ए-सिकंदरी' का पैमाना प्रचलन में लाया, जिसकी लंबाई 39 अंगुल (या लगभग 30 इंच) थी, और उसने कृषि योग्य भूमि की पैमाइश की इस नई इकाई को पूरे सल्तनत में अनिवार्य बनाया जिससे किसानों पर अत्यधिक आर्थिक बोझ कम हुआ। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? महात्मा गांधी के भारत आगमन और उनके शुरुआती सत्याग्रहों (चंपारण, खेड़ा और असहयोग आंदोलन) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. 9 जनवरी 1915 को दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद गांधीजी ने गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर एक वर्ष तक ब्रिटिश भारत का भ्रमण किया और राजनीति से तटस्थ रहे, जिसके बाद उन्होंने वर्ष 1916 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में चंपारण के किसानों की समस्याओं से अवगत होकर भाग लिया था। 2. चंपारण सत्याग्रह (1917) के दौरान राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर बिहार गए गांधीजी के साथ राजेंद्र प्रसाद, जे.बी. कृपलानी, महादेव देसाई और अनसूया साराभाई जैसे प्रमुख नेता भी उनके साथ जुड़े थे, जिन्होंने तिनकठिया प्रथा के विरुद्ध जाँच में सहयोग किया था। 3. खेड़ा सत्याग्रह (1918) के दौरान फसलें बर्बाद होने और 'संहिता नियमों' (Revenue Code) के तहत लगान माफी का हक होने के बावजूद ब्रिटिश प्रशासन द्वारा लगान वसूली न रोकने पर, गांधीजी ने किसानों से 'लगान न अदायगी' (No-Tax Campaign) का सफल आह्वान किया था। 4. असहयोग आंदोलन (1920-22) के दौरान चौरी-चौरा (गोरखपुर) में हुई हिंसक घटना के कारण महात्मा गांधी ने बारदोली में कांग्रेस की बैठक बुलाकर इस आंदोलन को अचानक स्थगित करने की घोषणा की थी, जिससे देश के कई प्रमुख नेताओं जैसे चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने इस निर्णय का स्वागत किया था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? गुप्तकालीन प्रशासन, आर्थिक व्यवस्था और भूमि अनुदान व्यवस्था के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. गुप्त काल में 'अग्रहार' और 'ब्रह्मदेय' वे भू-अनुदान थे जो मुख्य रूप से ब्राह्मणों और धार्मिक संस्थानों को दिए जाते थे, जिन्हें कर-मुक्त भूमि का अधिकार प्राप्त था और धीरे-धीरे इन क्षेत्रों में प्रशासनिक तथा न्यायिक अधिकारों का भी हस्तांतरण होने लगा था। 2. इस काल में सुदूर दक्षिण के साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारी वृद्धि हुई, जिसके कारण तांबे के सिक्कों (दिनार) का बड़े पैमाने पर प्रचलन हुआ, जबकि रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार के पतन के बाद सोने के सिक्कों का निर्गमन पूरी तरह बंद कर दिया गया था। 3. गुप्त राजवंश के शासक 'परमभागवत' की उपाधि धारण करते थे और वैष्णव धर्म उनके काल में राजधर्म के रूप में प्रतिष्ठित था, किंतु वे धार्मिक सहिष्णुता की नीति का पालन करते थे और उनके शासनकाल में बौद्ध तथा जैन धर्म को भी राजकीय संरक्षण व दान प्राप्त होता रहा था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से लेकर सूरत विभाजन (1907) तक की अवधि में नरम दल (Moderates) और गरम दल (Extremists) की विचारधारा, नीतियों और कार्यक्रमों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. नरमपंथियों का मुख्य विश्वास ब्रिटिश शासन की न्यायप्रियता में था और वे 'प्रार्थना, याचिका और विरोध' (Prayer, Petition and Protest) की संवैधानिक पद्धति में विश्वास करते थे, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने 1892 के भारतीय परिषद अधिनियम को अपनी सबसे बड़ी सफलता माना। 2. वर्ष 1905 के बंगाल विभाजन के पश्चात गरमपंथी नेताओं—लाल, बाल और पाल—ने इस आंदोलन को केवल बंगाल तक सीमित न रखकर इसे संपूर्ण देश में 'स्वदेशी' और 'बॉयकॉट' (बहिष्कार) के रूप में प्रसारित करने की मांग की, जबकि नरमपंथी इस आंदोलन को केवल बंगाल तक और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तक ही सीमित रखना चाहते थे। 3. कलकत्ता अधिवेशन (1906) में दादाभाई नौरोजी के अध्यक्ष बनने के कारण कांग्रेस के विभाजन को टाल दिया गया, जहाँ पहली बार कांग्रेस के मंच से 'स्वराज' (Swaraj) को राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया गया। 4. सूरत अधिवेशन (1907) में कांग्रेस के दोनों दलों के बीच अध्यक्ष पद के चयन को लेकर हुए विवाद के कारण कांग्रेस का विभाजन हो गया, जिसमें गरमपंथियों ने रास बिहारी घोष को अध्यक्ष बनाने का समर्थन किया जबकि नरमपंथियों ने लाला लाजपत राय को अध्यक्ष बनाने की मांग की थी। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान कानपुर में नाना साहब, तात्या टोपे और अजीमुल्ला खां द्वारा किए गए नेतृत्व और सैन्य संचालन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व संभालते हुए नाना साहब ने स्वयं को पेशवा बाजीराव द्वितीय का दत्तक पुत्र घोषित किया और ब्रिटिश सत्ता को समाप्त कर पेशवा के अधीन मराठा शासन को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। 2. अजीमुल्ला खां, जो नाना साहब के मुख्य सलाहकार और रणनीतिकार थे, ने विद्रोह के दौरान कूटनीतिक संपर्कों को मजबूत करने के लिए लंदन की यात्रा की थी और बाद में कानपुर के संघर्ष में अंग्रेजों के विरुद्ध महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 3. तात्या टोपे ने कानपुर की पराजय के बाद ग्वालियर में सिंधिया की सेना को अपने पक्ष में मिलाया और रानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर केंद्रीय भारत में ब्रिटिश सेनापति जनरल ह्यूरोज़ के विरुद्ध अत्यंत प्रभावी सैन्य अभियानों का संचालन किया। 4. कानपुर में ब्रिटिश सेना के समर्पण के पश्चात घटी 'सतीचौरा घाट कांड' की घटना के तुरंत बाद नाना साहब ने अंग्रेजों के साथ स्थायी संधि कर ली और उन्हें सुरक्षित इलाहाबाद भेजने की व्यवस्था की, जिसके बाद वे कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आए। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.