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History of India
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गुप्तकालीन प्रशासन, राजस्व प्रणाली तथा आर्थिक जीवन के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. गुप्त काल में भूमि की माप और उसके वर्गीकरण के लिए 'क्षेत्र' (कृषि योग्य भूमि), 'वापस' या 'वाप्र' (माप की इकाई), और 'अखिल' (बिना जोती गई या परती भूमि) जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता था।
- 2. गुप्त सम्राटों के शासनकाल में राजा को मिलने वाला भू-राजस्व (कर) सामान्यतः उपज का 1/6 से 1/4 भाग होता था, जिसे 'भाग' या 'भोग' कहा जाता था, जबकि संकटकालीन स्थिति में 'हिरण्य' (नकद कर) और 'उद्रंग' (स्थाई कर) वसूले जाते थे।
- 3. गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था में आंतरिक और बाह्य व्यापार दोनों का उल्लेख मिलता है, जहाँ पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के बाद भारतीय व्यापारियों ने दक्षिण-पूर्व एशिया (सुवर्णद्वीप) के साथ समुद्री व्यापार को अधिक बढ़ावा दिया, जिससे ताम्रलिप्ती और भृगुकच्छ (बरूच) प्रमुख बंदरगाह के रूप में उभरे।
- 4. गुप्त साम्राज्य में पुलिस और आंतरिक सुरक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों को 'महादंडनायक' कहा जाता था, तथा न्याय प्रशासन अत्यंत कठोर था जिसमें गुप्तचर विभाग के अधिकारियों को 'दूताभिसारिका' कहा जाता था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
गुप्त काल को भारतीय इतिहास का 'स्वर्ण युग' कहा जाता है, जिसके प्रशासनिक, सामाजिक और आर्थिक पहलुओं की जानकारी हमें विभिन्न अभिलेखों,स्मृतियों और साहित्यिक स्रोतों से मिलती है। गुप्त प्रशासन में भूमि की माप के लिए 'वाप्र', 'निवर्तलन' आदि इकाइयों का प्रयोग होता था। भू-राजस्व उपज का 1/6 भाग होता था, जिसे 'भाग' कहा जाता था। 'हिरण्य' नकद कर था और 'उद्रंग' एक प्रकार का उपकर था। पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के बाद भारतीय व्यापारियों ने दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ व्यापार बढ़ाया, जिसमें ताम्रलिप्ती एक प्रमुख बंदरगाह था। हालांकि, कथन 4 गलत है क्योंकि गुप्तचर विभाग के अधिकारियों को 'महादण्डनायक' या 'दूताभिसारिका' नहीं बल्कि 'चाट' और 'भाट' कहा जाता था, जबकि 'महादण्डनायक' मुख्य न्यायाधीश या सैन्य अधिकारी होता था। इस काल के बारे में अधिक जानने के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Related Questions
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सविनय अवज्ञा आंदोलन के द्वितीय चरण और गोलमेज सम्मेलनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वर्ष 1932 में जब सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः प्रारंभ हुआ, तब ब्रिटिश सरकार ने दमनकारी नीतियों के तहत 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' को गैर-कानूनी घोषित कर दिया और इसके सभी प्रमुख नेताओं को तुरंत गिरफ्तार कर लिया।
2. लंदन में आयोजित तृतीय गोलमेज सम्मेलन (1932) में कांग्रेस ने भाग लिया था और इसमें महात्मा गांधी ने कांग्रेस के एकमात्र आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में शिरकत की थी।
3. कम्युनल अवार्ड (सांप्रदायिक पंचांग) के तहत दलितों के लिए पृथक् निर्वाचन मंडल की घोषणा के विरोध में महात्मा गांधी ने यरवदा जेल में आमरण अनशन किया था, जिसके परिणामस्वरूपी डॉ. बी.आर. अंबेडकर और गांधीजी के समर्थकों के बीच पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर हुए।
4. सविनय अवज्ञा आंदोलन के इस दूसरे चरण में महिलाओं, व्यापारियों और विभिन्न स्थानीय समूहों ने भारी संख्या में भाग लिया, किंतु यह आंदोलन मई 1934 तक आते-आते पूरी तरह समाप्त हो गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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मराठा शासन में "दफ्तर" का प्रमुख अधिकारी क्या कहलाता था?
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19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों तथा उनके वैचारिक एवं संस्थागत विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'आत्मीय सभा' (1815) और बाद में ब्रह्म समाज का मुख्य उद्देश्य एकेश्वरवाद का प्रचार करना, मूर्तिपूजा का खंडन करना तथा ईसाई मिशनरियों की आक्रामक आलोचना के उत्तर में हिंदू धर्म की तार्किक रक्षा करना था।
2. वर्ष 1867 में केशव चंद्र सेन की प्रेरणा से बंबई में स्थापित 'प्रार्थना समाज' ने अंतर-जातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह, स्त्री शिक्षा और दलितोद्धार जैसे सामाजिक सुधारों पर विशेष बल दिया, तथा इसके प्रमुख नेताओं में महादेव गोविंद रानाडे और आर.जी. भंडारकर शामिल थे।
3. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा रचित 'सत्यार्थ प्रकाश' में आर्य समाज के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया है, जिसमें उन्होंने न केवल इस्लाम और ईसाई धर्म की कटु आलोचना की, बल्कि पौराणिक हिंदू धर्म, बहुदेववाद, अवतारवाद और जन्म आधारित जाति व्यवस्था को भी पूरी तरह अस्वीकार कर दिया।
4. यंग बंगाल आंदोलन के प्रणेता हेनरी एलियन विवियन डेरोज़ियो ने अपने शिष्यों को पारंपरिक मान्यताओं और अंधविश्वासों के प्रति निष्ठावान रहने की शिक्षा दी, तथा ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की नीतियों की खुलकर प्रशंसा करते हुए किसी भी प्रकार की सामाजिक आलोचना से परहेज किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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सविनय अवज्ञा आंदोलन के दूसरे चरण (1932-34) और गांधी-इरविन समझौते के पश्चात उत्पन्न राजनीतिक परिदृश्य के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. गांधी-इरविन समझौते (5 मार्च 1931) के तहत कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित कर दिया और कराची अधिवेशन (1931) में इस समझौते का अनुमोदन किया गया, जहाँ महात्मा गांधी को दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में नामित किया गया था।
2. लंदन में आयोजित द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर गंभीर मतभेद होने के कारण गांधीजी निराश होकर भारत लौटे और जनवरी 1932 में कांग्रेस ने पुनः सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का निर्णय लिया, जिसे वायसराय लॉर्ड विलिंगटन की दमनकारी नीतियों के कारण तुरंत कुचल दिया गया।
3. दूसरे चरण के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान ब्रिटिश सरकार ने दमन चक्र तेज करते हुए कांग्रेस को अवैध घोषित कर दिया तथा वायसराय लॉर्ड विलिंगटन ने महात्मा गांधी के साथ किसी भी प्रकार की बातचीत करने से स्पष्ट इनकार कर दिया था।
4. मई 1934 में पटना में ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की बैठक में औपचारिक रूप से सविनय अवज्ञा आंदोलन को पूरी तरह से समाप्त करने का निर्णय लिया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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बंगाल विभाजन (1905) और इसके विरोध में चलाए गए 'स्वदेशी आंदोलन' के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. लॉर्ड कर्ज़न द्वारा 20 जुलाई 1905 को बंगाल विभाजन के निर्णय की घोषणा के पश्चात, 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल में आयोजित ऐतिहासिक बैठक में 'स्वदेशी आंदोलन' की औपचारिक घोषणा की गई और प्रसिद्ध 'बहिष्कार प्रस्ताव' पारित किया गया।
2. बंगाल विभाजन औपचारिक रूप से 16 अक्टूबर 1905 को लागू किया गया, जिसे पूरे बंगाल में 'शोक दिवस' के रूप में मनाया गया और इस दिन लोगों ने एक-दूसरे के हाथों में राखियाँ बाँधकर भाईचारे और एकजुटता का संदेश दिया, जिसकी प्रेरणा रबींद्रनाथ ठाकुर के आह्वान पर मिली थी।
3. स्वदेशी आंदोलन के दौरान आर्थिक बहिष्कार के साथ-साथ रचनात्मक कार्यों (Constructive Programme) पर भी बल दिया गया, जिसके तहत कलकत्ता में आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय द्वारा 'बंगाल केमिकल एंड फार्मास्युटिकल वर्क्स' जैसी स्वदेशी वस्त्रों और उद्योगों की स्थापना की गई।
4. स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव केवल बंगाल तक सीमित रहा और मद्रास प्रेसीडेंसी में वी. ओ. चिदंबरम पिलई (VO Chidambaram Pillai) तथा आंध्र प्रदेश के डेल्टा क्षेत्रों (वंदे मातरम् आंदोलन) में इसका कोई संगठनात्मक प्रभाव देखने को नहीं मिला।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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